संपादकीय : मित्रता बनाम हित

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Published By Deepak Mishra
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वैश्विक राजनीति के इस संक्रमण काल में, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, चीन की बढ़ती सक्रियता, आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रतिस्पर्धा ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति बदल दी है। ऐसे माहौल में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की वार्ता को बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह भारत की उम्मीदों को बढ़ाने वाली है।

ट्रंप द्वारा प्रस्तुत इम्पैक्ट यानी “इंटरनेशनल मोबिलाइजेशन पार्टनरशिप फॉर एक्सलरेटिंग कनेक्टिविटी एंड ट्रेड” की अवधारणा वस्तुतः उस नई वैश्विक व्यवस्था की ओर संकेत करती है, जिसमें व्यापार, बुनियादी ढांचा, डिजिटल कनेक्टिविटी और आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन-केंद्रित मॉडल से अलग कर बहुध्रुवीय ढांचे में विकसित करने की कोशिश है। भारत और ग्लोबल साउथ के लिए इसका अर्थ है कि उन्हें केवल बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी नवाचार के केंद्र के रूप में भी देखा जाएगा। यह पहल व्यवहार में उतरती है, तो भारत को निवेश, विनिर्माण, बंदरगाह, डिजिटल अवसंरचना और निर्यात के क्षेत्र में महत्वपूर्ण लाभ मिल सकता है।

ट्रंप का यह कहना कि युद्ध की स्थिति में अमेरिका भारत के साथ खड़ा होगा, महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। इसके पीछे चीन का बढ़ता प्रभाव, इंडो-पैसिफिक की रणनीति और पाकिस्तान-चीन सैन्य सहयोग जैसे कारक भी हो सकते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को मिले चीनी समर्थन ने वाशिंगटन को यह एहसास भी कराया है कि दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन बनाए रखने के लिए भारत की भूमिका अपरिहार्य है, लेकिन याद रखना चाहिए कि अमेरिकी विदेश नीति स्थायी मित्रता नहीं, स्थायी हितों पर आधारित होती है।

अमेरिका भारत को चीन के संतुलन के रूप में देखता है, जबकि पाकिस्तान को क्षेत्रीय स्थिरता और कुछ सामरिक उद्देश्यों के लिए उपयोगी मानता है। इसलिए किसी एक बयान को सुरक्षा गारंटी मान लेना उचित नहीं होगा। जहां तक एच-1बी वीजा और भारतीय प्रतिभाओं की बात है, ट्रंप का सकारात्मक रुख उत्साहजनक है, लेकिन अमेरिकी आव्रजन नीति अंततः घरेलू राजनीति से प्रभावित होती है। इसलिए तत्काल किसी बड़े बदलाव की अपेक्षा जल्दबाजी होगी। 

प्रधानमंत्री का कहना कि देशों के बीच भरोसा और विश्वास कम हो रहा है, आज की विश्व राजनीति का सबसे सटीक आकलन है। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संघर्ष, व्यापारिक प्रतिबंध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और बदलते सैन्य गठबंधनों ने देशों के बीच संदेह बढ़ाया है। भरोसा केवल घोषणाओं से नहीं बढ़ता, इसके लिए नियमों का सम्मान, समझौतों का पालन और दीर्घकालिक नीति-स्थिरता आवश्यक होती है। भारत इसी कारण “रणनीतिक स्वायत्तता” पर जोर देता है।

मोदी की प्रशंसा करते हुए ट्रंप का यह कहना कि “जब तक मोदी हैं, व्हाइट हाउस उनके साथ है” व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों संदेश देता है। निष्कर्षतः यह भारत के प्रति सम्मान का संकेत है। भारत को ट्रंप के बयानों का स्वागत अवश्य करना चाहिए, लेकिन अपनी नीति को घोषणाओं पर नहीं, ठोस समझौतों और वास्तविक क्रियान्वयन पर आधारित रखनी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में मित्रता बहुत महत्वपूर्ण होती है, किंतु राष्ट्रीय हित उससे भी अधिक अहम होते हैं। यही वह संतुलन है, जिसने आज भारत को आज वैश्विक मंच पर एक विश्वसनीय और स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित किया है।