पक्षियों के पैर ही बन जाते हैं हुनरमंद हाथ
विचार कीजिए, क्या पक्षियों के पैर केवल चलने और पकड़ने के लिए होते हैं? तोते, ऑस्प्रे, बाज़, कठफोड़वा और जलमोर ने अपने पैरों को ‘हुनरमंद हाथों’ में तब्दील कर लिया है। वैज्ञानिक तथ्यों और कुदरत की अद्भुत रचनात्मकता से भरपूर हैं तमाम पक्षी। कई परिंदे के पंजे केवल अंग नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता, संतुलन और उत्तरजीविता के अद्भुत औजार बन जाते हैं। पेड़ों की टहनियों पर बैठे रंग-बिरंगे तोते जब अपने पंजों में किसी फल या बीज को थामकर बड़े आराम से उसे चोंच तक ले आते हैं, तो यह दृश्य सहज ही विस्मित कर देता है।
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क्षणभर को लगता है मानो प्रकृति ने उन्हें हाथों के अभाव में हाथों जैसी दक्षता ही प्रदान कर दी हो। आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों ने भी यह सिद्ध किया है कि अनेक पक्षियों के पैर केवल चलने, तैरने या शाखाओं को पकड़ने भर के साधन नहीं हैं, बल्कि वे अत्यंत विकसित, बहुउद्देशीय और कुशल औज़ार की तरह कार्य करते हैं-लगभग मनुष्य के हाथों की भांति।
पंजों में छिपी कुदरत की इंजीनियरिंग
तोतों के पैरों की शारीरिक संरचना जीव-जगत की सबसे अनूठी रचनाओं में गिनी जाती है। वैज्ञानिक इस विशिष्ट बनावट को जायगोडैक्टिल कहते हैं, जिसमें पक्षी की दो उंगलियां आगे और दो पीछे की ओर होती हैं। यही संरचना उन्हें डालियों पर फौलादी पकड़ देती है। वे किसी वस्तु को केवल पकड़ते ही नहीं, बल्कि उसे घुमाते, नियंत्रित करते और बड़ी सफाई से उसका उपयोग भी करते हैं। जब कोई तोता बीज या फल को पंजों में जकड़कर उसे घुमाते हुए चोंच से छीलता है, तो उसकी सूक्ष्म सटीकता किसी कुशल कारीगर की याद दिलाती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक तोतों को उन चुनिंदा पक्षियों में शीर्ष पर रखते हैं, जिनके पैर केवल शरीर का सहारा देने वाले नहीं, बल्कि सक्रिय कार्यशील अंग बन चुके हैं।
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प्रकृति के इस विशाल परिवेश में केवल तोते ही नहीं हैं जिन्होंने अपने पैरों को ‘हाथ’ के रूप में रूपांतरित कर लिया है। जलीय पक्षियों में जेकाना या जल मोर के पैर प्रकृति की एक विलक्षण रचना हैं। इस पक्षी की उंगलियां और नाखून इसके शरीर के कुल अनुपात में असाधारण रूप से लंबे होते हैं, जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने इसके पैरों की जगह चौड़े हाथ लगा दिए हों।
इन्हीं लंबे पंजों के कारण इसका वजन कमल के पत्तों पर समान रूप से बंट जाता है, जिससे यह पानी की सतह पर तैरती वनस्पतियों पर बिना डूबे ऐसे सहजता से दौड़ता है, मानो किसी ठोस धरती पर चल रहा हो। इसी तरह, जब कठफोड़वा किसी पेड़ के तने पर लंबवत खड़ा होकर अपनी मजबूत चोंच से लकड़ी पर लगातार प्रहार करता है, तब उसके पैर किसी कुशल पर्वतारोही के हाथों की तरह तने को जकड़े रहते हैं, यदि यह पकड़ न हो, तो हर चोट के साथ लगने वाले तेज झटके से उसका संतुलन बिगड़ सकता है।
मस्तिष्क और शरीर का न्यूरो-कॉर्डिनेशन
पक्षियों के पैरों की यह विविधता केवल बाहरी शारीरिक बनावट का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे मस्तिष्क और शरीर का अत्यंत सूक्ष्म न्यूरो-मस्क्युलर समन्वय कार्य करता है। आधुनिक विज्ञान बताता है कि जब कोई पक्षी विशेष परिस्थितियों-जैसे उड़ते हुए गतिशील शिकार को पकड़ना या पंजों में फल थामकर उसे छीलना, के अनुसार अपने व्यवहार को ढालता है, तब न्यूरोप्लास्टिसिटी के सिद्धांत के तहत उसके मस्तिष्क का संबंधित भाग असाधारण रूप से सक्रिय और पुनर्गठित हो जाता है। यह न्यूरो-कोऑर्डिनेशन ही पक्षियों को इतनी जटिल और सटीक गतिविधियाँ करने में सक्षम बनाता है। उनका छोटा-सा मस्तिष्क भी शरीर से ऐसे अद्भुत काम लेता है, जो किसी विकसित जैविक मशीन से कम नहीं लगते। संक्षेप में कहें तो, तोतों के जायगोडैक्टिल पंजे, ऑस्प्रे का प्रतिवर्ती शिकंजा, बाज़ की फौलादी पकड़, कठफोड़वा का संतुलन और जलमोर (जेकाना) के फैले हुए पैर हमें यह सीख देते हैं कि प्रकृति में कोई भी अंग सीमित नहीं होता। परिस्थितियां और अस्तित्व का संघर्ष ही उसे नए रूप, नई क्षमताएं और नए अर्थ देते हैं। उड़ान और उत्तरजीविता के इस कठिन सफर में पक्षियों ने अपने पैरों को जिस तरह बहुउद्देशीय ‘हाथों’ में रूपांतरित कर लिया है, वह क्रमिक विकास, बेहतरीन अनुकूलन और प्रकृति की अगाध बुद्धिमत्ता की एक विस्मयकारी और जीवंत गाथा है।
शिकारी पक्षियों का अद्भुत कौशल
पक्षी-जगत में पैरों को हाथों की तरह इस्तेमाल करने का एक और हैरतअंगेज उदाहरण ऑस्प्रे यानी मछलीमार उकाब है। यह शिकारी पक्षी आकाश से सीधे पानी में गोता लगाकर मछली पकड़ता है। इसकी बाहरी उंगली प्रतिवर्ती होती है अर्थात आवश्यकता पड़ने पर पीछे की ओर घूम सकती है और शिकार करते समय उसके पैर भी तोते की तरह जायगोडैक्टिल संरचना बना लेते हैं। इसके पंजों के नीचे विशेष कांटेदार सतह होती है, जो फिसलन भरी मछली पर ऐसी मजबूत पकड़ बनाती है कि उसका छूट पाना लगभग असंभव हो जाता है। इतना ही नहीं, उड़ते समय यह मछली को इस प्रकार सीधा पकड़ता है कि हवा का दबाव (प्रतिरोध) न्यूनतम रहे। यह कौशल किसी प्रशिक्षित वैमानिक की सूझबूझ से कम प्रतीत नहीं होता।
बाज़, चील और उल्लू जैसे शिकारी पक्षियों के लिए भी उनके पैर ही उनके सबसे बड़े हथियार और हाथ हैं। ये पक्षी अपने शिकार पर चोंच से नहीं, बल्कि पंजों की घातक शक्ति से प्रहार करते हैं। एक बाज़ के पंजों की पकड़ मनुष्य के हाथों की तुलना में कई गुना अधिक शक्तिशाली होती है। शिकार को दबोचने के बाद वे उसे पंजों से कसकर दबाए रखते हैं और चोंच से खाने की सुविधा के अनुसार अलग-अलग कोणों पर मोड़ते हैं। उनके पंजों का यह नियंत्रण बिल्कुल वैसा ही लगता है जैसे कोई मनुष्य अपने हाथों से किसी वस्तु को मजबूती से थामे हुए हो।
