राम कथा के चितेरे राधेश्याम कथावाचक

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Published By Anjali Singh
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जब आंख खोली तो ऊपर एक छप्पर था और एक कुंआ था। यह पिता की संपत्ति थी। गरीब ब्राह्मण थे, तो अपने पिता के साथ भजन गाया करते थे। मेहनताना के तौर पर अगर एक चवन्नी मिल जाती, तो उस दिन घर का चूल्हा जल जाता। यह कहानी बरेली के बिहारीपुर में जन्में प्रसिद्ध कथा वाचक रहे पंडित राधेश्याम की है, जिन्होंने देश को आम बोलचाल की भाषा में रामायण दी और आगे चलकर यह रामायण ‘राधेश्याम रामायण’ के तौर पर मशहूर हुई।

लोगों को सरल भाषा में रामायण उपलब्ध कराने वाले पंडित राधेश्याम का जन्म वर्ष 1880 में हुआ था। उन्होंने सिर्फ कक्षा तीन तक पढ़ाई की थी। गरीबी के कारण कथावाचक पिता बांके लाल ने साफ कह दिया था कि वह आगे पढ़ाने में सक्षम नहीं हैं। इस तीसरी कक्षा उत्तीर्ण व्यक्ति ने 17 साल की उम्र में वर्ष 1907 में बोल-चाल की भाषा में रामायण की रचना की। इस रामायण का ‘क्रेज’ इतना था कि उनके जीवन काल में ही दो करोड़ प्रतियां बिक चुकी थीं। उनका निधन 26 अगस्त 1963 को बरेली में उनके ही आवास पर हुआ था। इससे 10 साल पहले उनकी पत्नी का निधन हो चुका था। 

कथावाचक द्वारा रचित यह अत्यंत लोकप्रिय व भावात्मक रामायण है। यह आम बोलचाल की भाषा हिन्दी-उर्दू शैली व मधुर गायन शैली के लिए प्रसिद्ध् है। उन्होंने राम कथा को 25 भागों में गाया है। यह वंदना से लेकर राम राज्याभिषेक तक का वर्णन है। यह रामायण भजनों और राम लीलाओं में गाई जाती है। राधेश्याम की पौत्री शारदा भार्गव का कहना है कि हाईटेक युग में इसके डिजिटल संस्करण की जरूरत है, ताकि इसकी पहुंच और बढ़ सके। इसके लिए सरकार और प्रशासन स्तर पर पहल किए जाने की जरूरत है। वह इसके लिए तैयार हैं। उन्होंने बताया कि राधेश्याम के जीवन काल में यह रामायण दो रुपये में बिकती थी, जो अब बाजार में 500 रुपये में उपलब्ध है।

राधेश्याम ने अपने वक्त में नेपाल के तत्कालीन महाराजा के यहां राम कथा सुनाई थी। इसके अलावा महाराजा बीकानेर के यहां भी कथा सुनाई। इस पर यहां के महाराजा ने उन्हें लिखित तौर पर खिताब दिया था, जिसमें लिखा था-“समय पर भेजते संतों को श्रीराम, वाल्मीकि तुलसी हुए, तुलसी हुए राधेश्याम।” यह फ्रेम किया हुआ खिताब आज भी राधेश्याम भवन में संरक्षित है। इसी तरह, उन्होंने महाराजा अलवर के यहां कथा कही थी। पाकिस्तान के लाहौर व रावलपिंडी में भी कथा सुनाई थी। लाहौर में इनके नाम से सड़क भी बनाई गई है। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पिता मोती लाल नेहरू के आमंत्रण पर उन्होंने आनंद भवन में चालीस दिन रुककर कथा सुनाई थी।

बरेली में राधेश्याम की सात फिट ऊंची मूर्ति, जिसमें चार फिट अलग से स्टैंड शामिल हैं, इस अनावरण के लिए तैयार है। इसके अनावरण के लिए मुख्यमंत्री के बरेली में होने वाले अगले कार्यक्रम का इंतजार किया जा रहा है। मूर्ति जिस ऑडिटोरियम में रखी है, उसे ‘पंडित राधेश्याम कथा वाचक स्मृति भवन’ नाम दिया गया है।

राधेश्याम कथावाचक ने अपने जीवनकाल में कई लेखन किया था। लगभग स्वयं की लिखी 57 पुस्तकें व 175 से अधिक पुस्तकों का संपादन व प्रकाशन किया। पंडित राधेश्याम रंगमंच शैली के हिंदी नाटककारों में प्रमुख नाम है। उन्होंने लोक-नाट्य-शैली के आधार पर खड़ी बोली में रामायण की कथा को 25 खंडों में पद्यबद्ध किया। इस कृति ने ‘राधेश्याम रामायण’ के नाम से विशेष प्रसिद्धि प्राप्त की। कथा वाचक पंडित राधेश्याम ने आम लोगों के लिए रामायण की रचना करने से पहले वाल्मीकिकृत व तुलसीदास कृत रामायण रामचरित मानस का गहन अध्ययन किया और उसे आम भाषा में पेश किया ताकि रामायण की लाइन पढ़ते ही उसके भाव सीधे हृदय में उतर जाए।

- रमेश चंद्र, वरिष्ठ पत्रकार