विदेशों में है बिहार योग पद्धति की धूम
अपनी अंतरात्मा में स्वयं को अनुभव करने से बड़ा कोई सुख नहीं है। सदियों से योग मनुष्य के भीतर शांति, संतुलन और आत्मबोध जागृत करने का माध्यम रहा है। आज जब मनुष्य बाहरी उपलब्धियों और भौतिक संसाधनों में मानसिक शांति खोजने का प्रयास कर रहा है, तब योग का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। बीसवीं सदी में योग को आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवित करने वाले जिन महापुरुषों का नाम सर्वाधिक सम्मान से लिया जाता है, उनमें परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।- कुमार कृष्णन, वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र
वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र
योगी, आध्यात्मिक गुरु, चिकित्सक तथा वेदांत के प्रकांड विद्वान स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने योग को आश्रमों और साधकों की सीमाओं से निकालकर सामान्य जनजीवन तक पहुंचाया। वर्ष 1963 में मुंगेर में स्थापित बिहार योग विद्यालय उनके इसी दूरदर्शी प्रयास का परिणाम था। यह संस्थान आगे चलकर वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र बना और आज भी विश्वभर में योग के प्रामाणिक स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। स्वामी सत्यानंद के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कहते हैं, “स्वामी सत्यानंद ने योग को नया जीवन और नया जन्म दिया। उन्होंने योग का पुनरुद्धार किया, अन्यथा यह धीरे-धीरे लुप्त हो गया होता। इसलिए वे आधुनिक युग के पतंजलि हैं।” स्वामी सत्यानंद ने अपने गुरु स्वामी शिवानंद द्वारा प्रतिपादित ‘संश्लेषण योग’ की अवधारणा को आधार बनाकर वेदांत, योग और तंत्र के व्यावहारिक पहलुओं का समन्वय किया। इसी से बिहार योग अथवा सत्यानंद योग प्रणाली का विकास हुआ। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें योग की विभिन्न शाखाओं को एक समग्र और व्यवस्थित पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस योग प्रणाली की नींव हठ योग, राज योग, ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग पर आधारित है, जो क्रमशः शरीर, मन, बुद्धि, भावनाओं और कर्मक्षमता का विकास करते हैं। इसके अतिरिक्त मंत्र योग, नाद योग, क्रिया योग, कुंडलिनी योग तथा लय योग जैसी अनेक शाखाओं को भी इसमें समाहित किया गया है। इस प्रकार साधक का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होता है।
पतंजलि के योगसूत्रों की आधुनिक व्याख्या
स्वामी सत्यानंद सरस्वती की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने प्राचीन योग और तांत्रिक परंपराओं में सुरक्षित अनेक दुर्लभ एवं गूढ़ साधनाओं को व्यवस्थित रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने अभ्यासों के क्रम, स्तर और प्रगतिशील अवस्थाओं को स्पष्ट करते हुए उन्हें सरल और सुरक्षित बनाया। परिणामस्वरूप योग पहली बार आम लोगों के लिए व्यावहारिक और सुलभ बन सका। उन्होंने यह अनुभव किया कि आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच सरल, किंतु नियमित अभ्यास ही लोगों के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। इसी दृष्टिकोण ने योग को व्यापक जनसमूह तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वामी सत्यानंद ने ऋ षि पतंजलि के योगसूत्रों की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत की और योग को केवल आध्यात्मिक साधना ही नहीं, बल्कि जीवन-विकास के विज्ञान के रूप में स्थापित किया। उन्होंने योग पर छाए रहस्यवाद के आवरण को हटाकर इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया। 1970 के दशक में उन्होंने योग के प्रभावों पर वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित किया। उनके मार्गदर्शन में अनेक शोध परियोजनाएं प्रारंभ हुईं, जिनसे यह समझ विकसित हुई कि योग शरीर, मन और भावनाओं को किस प्रकार प्रभावित करता है तथा मनुष्य की सुप्त क्षमताओं को कैसे जागृत कर सकता है। इन अध्ययनों ने यह भी स्पष्ट किया कि योग केवल स्वास्थ्य संवर्धन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने वाला विज्ञान है।
मानव चेतना के विकास का माध्यम
अस्थमा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर तथा गर्भावस्था जैसी अनेक परिस्थितियों में योग के चिकित्सीय उपयोगों पर किए गए अध्ययनों ने चिकित्सा जगत का ध्यान आकर्षित किया। यही कारण है कि आज विश्व के अनेक अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में योग को सहायक चिकित्सा पद्धति के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। स्वामी सत्यानंद की सबसे महत्वपूर्ण देनों में से एक है ‘योग निद्रा’। तंत्रशास्त्र की प्राचीन न्यास पद्धति को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित कर उन्होंने योग निद्रा का स्वरूप प्रदान किया। आज यह तकनीक तनाव, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप तथा गंभीर रोगों के उपचार में सहायक सिद्ध हो रही है। आधुनिक शोधों से भी प्रमाणित हुआ है कि योग निद्रा मस्तिष्क की तरंगों को संतुलित कर मानसिक एवं भावनात्मक तनाव को कम करती है। स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार, “योग निद्रा आज विश्वभर में प्रचलित अभ्यास बन चुकी है। अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमंत्री भी इसका अभ्यास कर रहे हैं। जैसे घर की सफाई प्रतिदिन आवश्यक है, वैसे ही मन की सफाई भी जरूरी है और योग निद्रा इसमें अत्यंत सहायक है।” इसी प्रकार स्वामी सत्यानंद ने पवनमुक्तासन श्रृंखला का विकास किया, जिसने योग को चिकित्सा और फिजियोथेरेपी के क्षेत्र में नई पहचान दिलाई। गठिया, जोड़ों के दर्द और पाचन संबंधी विकारों में इन अभ्यासों के उल्लेखनीय लाभ देखे गए हैं। उनके प्रयासों का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने योग को मानव चेतना के विकास का माध्यम माना और इसे समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने का कार्य किया। अमेरिका, स्वीडन और भारत सहित कई देशों में कैदियों और बंदियों के पुनर्वास कार्यक्रमों में भी बिहार योग पद्धति का सफल उपयोग किया गया।
56 से अधिक देशों में प्रचलित योग परंपरा
आज बिहार योग या सत्यानंद योग परंपरा विश्व के 56 से अधिक देशों में प्रचलित है। विशेष रूप से फ्रांस में इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। वहां के विद्यालयों, महाविद्यालयों और यहां तक कि किंडरगार्टन स्तर पर भी बिहार योग की शिक्षाएं अपनाई जा रही हैं। मुंगेर से प्रशिक्षित योग शिक्षक बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लगभग छह दशकों तक स्वामी सत्यानंद ने योग की ऐसी समग्र प्रणाली विकसित की, जो शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन को एक साथ विकसित करती है। बाह्य योग के रूप में हठ योग, राज योग और क्रिया योग का प्रशिक्षण दिया जाता है, जबकि आश्रम जीवन की प्रेरणा से कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग के आंतरिक पक्षों का विकास होता है। यह समन्वित संरचना साधक को मस्तिष्क, हृदय और कर्म—तीनों स्तरों पर संतुलित बनाती है। यही योग का वास्तविक उद्देश्य है, जहां व्यक्ति अपने भीतर सामंजस्य स्थापित कर जीवन की उच्चतर संभावनाओं को साकार कर सके।
संतुलित जीवनशैली का विज्ञान
स्वामी सत्यानंद सरस्वती की पुस्तक ‘आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध’ आज भी विश्वभर के अनेक योग संस्थानों में मानक पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती है। इसका अनुवाद अनेक भाषाओं में हो चुका है और यह योग साधकों के लिए एक प्रामाणिक मार्गदर्शिका मानी जाती है। उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने योग को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया है। उनकी पुस्तक ‘धारणा दर्शन’ में तंत्र और उपनिषदों से संकलित अनेक एकाग्रता अभ्यासों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने ‘योग कैप्सूल’ की अवधारणा भी विकसित की, जिसमें 10 से 20 मिनट में किए जाने वाले सरल अभ्यासों को सम्मिलित किया गया है। इनका उद्देश्य आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी लोगों को योग से जोड़ना है। स्वामी निरंजनानंद का स्पष्ट मत है कि योग को केवल शारीरिक व्यायाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह मानसिक एकाग्रता, भावनात्मक स्थिरता और संतुलित जीवनशैली का विज्ञान है। उनका मानना है कि योग के बढ़ते व्यावसायीकरण के बीच उसके मूल उद्देश्य और आध्यात्मिक सार को संरक्षित रखना आवश्यक है। सत्यानंद योग परंपरा ने विश्व को योग के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया है। यह केवल योग और आध्यात्मिक अनुभवों की व्याख्या नहीं करती, बल्कि उन्हें जीवन में उतारने की कला भी सिखाती है। आज परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ‘भारत योग यात्रा’ के माध्यम से इसी योग प्रसाद को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। वास्तव में स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने प्राचीन योग विज्ञान को आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप रूपांतरित कर मानवता को एक अमूल्य विरासत प्रदान की है। योग के वैश्विक विस्तार और उसके वैज्ञानिक स्वरूप की स्थापना में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
