अलर्ट : 15 वर्षों में 21 मीटर गिर गया भू-जल स्तर, पानी के बर्बादी के प्रति चेत नहीं रहे लखनऊ के लोग
-बंद करो अंधाधुंध दोहन, अब भूजल खतरनाक स्तर पर चुका है पहुंच -पानी के नमूनों में बढ़ी फ्लोराइड और नाइट्रेट की मात्रा -हर साल करीब 1.39 मीटर आ रही भू-जल स्तर में गिरावट - भूगर्भ विभाग ने जारी की है रिपार्ट
लखनऊ, अमृत विचार : लगातार चल रहे जागरूकता अभियानों के बावजूद लखनऊ के लोग पानी के बर्बादी के प्रति चेत नहीं रहे हैं। सबमर्सिबल बोरिंगों से प्रतिदिन लगभग 100 करोड़ लीटर भू-जल का दोहन किया जा रहा है। इससे भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है। बीते 15 वर्षों में भू-जल स्तर करीब 21 मीटर नीचे खिसक गया है। प्रतिवर्ष 1.39 मीटर की गिरावट आ रही है। पानी में नाइट्रेट पांच गुना और फ्लोराइड भी से अधिक पाया गया है। ये चिंताजनक जानकारी केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की एक रिपोर्ट में सामने आई है।
राजधानी के कई इलाकों में भू-जल स्तर 25 से 30 मीटर के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। जो 100 करोड़ लीटर पानी प्रतिदिन पानी का दोहन किया जा रहा है, उसमें 350 करोड़ज लकल विभाग 750 ट्यूबबेल पंपों के जरिए शहर में आपूर्ति कर रहा है। इसके अलावा निजी कॉलोनियों, बहुमंजिला इमारतों, निजी प्रतिष्ठानों, सरकारी कार्यालय परिसरों व घर-घर लगे सबमर्सिबल बोरिंग से बेहिसाब रोजाना तीन गुना भू-जल निकाला जा रहा है।
इसके अलावा बुलंद बाग और राजेन्द्र नगर में पानी की नमूनों की जांच में नाइट्रेट का स्तर सामान्य से पांच गुना अधिक मिला है, जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय, तालकटोरा, विकास नगर व तुलसी पार्क से लिए गए पानी के नमूनों में फ्लोराइड मानक से कहीं अधिक मिला है। ये पानी पीने से कई गंभीर बीमारियां होने का खतरा है।
घटते भू-जल स्तर का मुख्य कारण
-उप्र ग्राउंड वाटर डिपार्टमेंट का गठन तो हुआ लेकिन गाइडलाइन जारी नहीं
जलकल विभाग के अनुसार शहर के अभी 52 फीसदी हिस्से में ही वाटर लाइन पड़ी है। जिससे शहर की आधी आबादी को ही पाइपलाइन से पेयजल की आपूर्ति हो पा रही है। हर घर में सबमर्सिबल के चलते भू-जल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। पुरानी बोरिंग तो छोड़िये जिम्मेदार विभाग नई सबमर्सिबल बोरिंग पर भी लगाम नहीं कस पा रहे हैं। 2019 के बाद केंद्रीय भूजल बोर्ड की तर्ज पर उप्र ग्राउंड वाटर डिपार्टमेंट का गठन तो हुआ है लेकिन सबमर्सिबल पर नियंत्रण के लिए कोई गाइडलाइन जारी नहीं हुई है।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम कागजों तक सीमित
वर्षा जल संचयन के लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण की योजनाओं में दो हजार वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल के भूखंडों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य है। इसके बावजूद यह नियम कागजों तक ही सीमित है। योजना में इस नियम का अनुपालन नहीं हो रहा है। इसके अलावा आवास विकास की योजना में तो इस संबंध में कोई नियम ही लागू नहीं है। बड़े-बड़े अपार्टमेंटों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की सुविधा नहीं है। ऐसे में अनियोजित कालोनियों की तो बात ही छोड़ दीजिए, यहां तो किसी से नियम का पालन कराने की उम्मीद कैसे की जाए।
भू-जल स्तर इसलिए गिर रहा है कि हम पानी तो जमीन से निकाल रहे हैं लेकिन भर नहीं रहे हैं। पहले गड्ढे और तालाब हुआ करते थे अब सड़क के किनारे भी टाइल्स लग गए हैं। कंक्रीट के जंगलों ने प्राकृतिक रीचार्ज खत्म कर दिए हैं। आर्टीफिशियल रिचार्ज के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग कागजों पर तो है लेकिन धरातल पर नहीं। -प्रोफेसर ध्रुवसेन सिंह, भू-विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
