इतिहास को इतिहास ही रहने दिया जाय!
इतिहास में उन्हीं को याद रखा जाता है, जो विजयी होते हैं। सिकंदर, चंद्रगुप्त मौर्य, मुस्लिम शासक या अंग्रेज सभी को उनकी विजयों के कारण इतिहास में प्रमुख स्थान मिला। हालांकि कुछ पराजित या आंशिक रूप से सफल व्यक्तित्व भी इतिहास में सम्मान पाते हैं, जैसे पोरस, छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप। किंतु भावनाओं के आधार पर इतिहास का मूल्यांकन करना उचित नहीं माना जा सकता। इतिहास को नई दृष्टि से देखने का प्रयास स्वागतयोग्य है, परंतु इसका अर्थ इतिहास को मनचाहे ढंग से पुनर्लेखित करना नहीं होना चाहिए।
महाराणा प्रताप निस्संदेह भारतीय इतिहास के सम्मानित पात्र हैं, किंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि वे मेवाड़ के शासक थे, समूचे राजपूताना के नहीं। उस समय विभिन्न राजपूत राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा और संघर्ष भी मौजूद थे। उनके पिता उदय सिंह को अकबर के हाथों चित्तौड़ गंवाना पड़ा था और उनसे पहले राणा सांगा भी बाबर से पराजित हुए थे। ऐसे में अकबर की इच्छा थी कि महाराणा प्रताप भी अन्य राजपूत शासकों की तरह उसकी अधीनता स्वीकार कर लें, लेकिन प्रताप ने ऐसा नहीं किया और परिणामस्वरूप संघर्ष अपरिहार्य हो गया।
1576 में हल्दीघाटी के निकट रक्त तलाई में हुए युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह कर रहे थे। युद्ध के बाद महाराणा प्रताप को रणक्षेत्र छोड़ना पड़ा। हालांकि वे न तो पकड़े गए और न ही मारे गए। झाला बीदा के बलिदान के कारण वे सुरक्षित निकलने में सफल रहे और बाद के वर्षों में छापामार युद्ध जारी रखते रहे। किंतु इससे यह निष्कर्ष निकालना कठिन है कि हल्दीघाटी का युद्ध उन्होंने जीत लिया था।
इधर कुछ शोधों और व्याख्याओं के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है कि हल्दीघाटी में विजय महाराणा प्रताप की हुई थी। तर्क दिया जाता है कि मुगल सेना प्रताप को जीवित या मृत पकड़ नहीं सकी तथा युद्ध के बाद मानसिंह को अकबर की नाराजगी झेलनी पड़ी। किंतु ये तथ्य अपने आप में निर्णायक प्रमाण नहीं बनते। किसी शासक का बच निकलना और अपेक्षित परिणाम न मिलने पर सम्राट का असंतुष्ट होना, युद्ध की विजय-पराजय का अंतिम आधार नहीं माना जा सकता।
इसी प्रकार महाराणा प्रताप के नाम पर भूमि-पट्टों का जारी होना भी उनके प्रभाव और अस्तित्व का प्रमाण हो सकता है, लेकिन इससे युद्ध में उनकी विजय स्वतः सिद्ध नहीं होती। इतिहास का मूल्यांकन तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए, न कि भावनाओं या पूर्वाग्रहों के आधार पर। इतिहास बदलने से अधिक आवश्यक है इतिहास से सीख लेना, ताकि भविष्य में वही गलतियां दोहराई न जाएं।
