संस्मरण : ज्ञान और कौशल
ज्ञान, कौशल और जीवन मूल्यों को आत्मसात करने की प्रक्रिया को समेकित रूप से शिक्षा कहा जा सकता है। एक शिक्षित व्यक्ति के लिए अपनी योग्यता के अनुरूप कार्य प्राप्त करना भी एक बड़ी चुनौती होती है। वर्ष 2004 के अक्टूबर माह में मैंने शिक्षा विभाग में अध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं प्रारंभ कीं। शिक्षण कार्य के पहले दिन मन में अनेक जिज्ञासाएं और उत्सुकताएं थीं। यह संकल्प था कि विद्यार्थियों को बेहतर से बेहतर शिक्षा दूंगा और विषय को इस प्रकार समझाऊंगा कि वे उसे सहजता से ग्रहण कर सकें।
विद्यालय में जॉइनिंग के पहले ही दिन संस्था प्रधान ने मुझे तीन कक्षाएं पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी। गांधी स्मारक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में मेरा पहला दिन विद्यार्थियों और स्टाफ के साथ उत्साहपूर्ण वातावरण में बीता। नई-नई पुस्तकों का अध्ययन कर विभिन्न विषयों को बच्चों को पढ़ाना मुझे हमेशा अच्छा लगता रहा, क्योंकि इससे विद्यार्थियों के साथ-साथ मेरा स्वयं का स्वाध्याय भी होता था। स्कूली जीवन में अनुशासन और संस्कारों का विशेष महत्व रहा।
विद्यार्थी जीवन के अनेक संस्मरण आज भी याद आते हैं तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। कक्षा सात में मैंने साइकिल चलाना सीखा, जबकि घर में पिताजी के पास राजदूत मोटरसाइकिल थी। कई बार गिरने और घुटने छिलने के बाद भी सीखने का संतोष अलग ही था। मोटरसाइकिल चलाना मैंने नौकरी में आने के बाद सीखा। वह समय इंटरनेट की आभासी दुनिया से बिल्कुल अलग था। लोगों के पास एक-दूसरे के लिए पर्याप्त समय होता था।
कैरम, शतरंज, लूडो, चोर-सिपाही, गिल्ली-डंडा और कंचे जैसे खेल बच्चों के जीवन का हिस्सा थे। मुझे बचपन से कंचा और शतरंज खेलने का विशेष शौक रहा है। आज भी अवसर मिलने पर परिवार के साथ शतरंज खेल लेता हूं। खेल के दौरान पुराने संस्मरण याद आते हैं और अनायास ही हंसी छूट पड़ती है।
डॉ. सौरभ दीक्षित, जीवन, ज्ञान और कौशल, प्रधानाचार्य, गांधी स्मारक माध्यमिक विद्यालय
