विकसित भारत के लिए सतत प्रभावी कदम जरूरी
दून विश्वविद्यालय
बारह वर्ष पूर्व शुरू हुआ ‘सबका साथ सबका विकास’ गवर्नेंस नीति का असर धीरे-धीरे दिखने लगा है। भारत आज विश्व की महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, यूरोपियन यूनियन सहित दुनिया के कई बड़े देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौता विश्व में भारत की बढ़ती साख और विश्वसनीयता को प्रदर्शित करती है। जी-20 समिट की अध्यक्षता, ब्रिक्स समिट की प्रेसिडेंसी और जी-7 समिट के लिए वर्षों से लगातार मिलता आमंत्रण भारत की बढ़ती वैश्विक साख की गवाही है। वर्ष 2014 में भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में 10 वें स्थान पर थी, जिसमें पिछले एक दशक के नीतिगत निर्णयों और संस्थागत बदलावों के कारण आर्थिक विकास की गति में तेज प्रगति हुई, फलस्वरूप वर्ष 2025 में जापान को पीछे छोड़कर भारत चौथी बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा।
भारत की निरंतर बढ़ती आर्थिक प्रगति के प्रमुख घटकों में ढांचागत विकास व नीतिगत निर्णयों से मजबूत हुई घरेलू संरचना का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसमें मुख्य रूप से ‘सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास और सबका प्रयास के मंत्र’ से प्रेरित जनकल्याण की नीतियां का असर धरातल पर साफ तौर पर दिखता है। प्रधानमंत्री जनधन योजना, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी), मुद्रा बैंक, स्टार्टअप, कौशल विकास, मेक इन इंडिया, दिवाला शोधन अक्षमता संहिता, यूपीआई, जीएसटी, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना आदि योजनाओं से जन कल्याण और विकास का मंत्र फलीभूत हो रहा है। पूंजीगत व्यय में लगातार हो रही वृद्धि से देश में रोज़गार सृजन और ढांचागत अवसरंचना सुदृढ़ हुई है, जिसमें सड़क, रेल, वायु और जल परिवहन का तीव्र गति से विस्तार हो रहा है, इस विस्तार से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी।
इन सुधारों का ही नतीजा है कि 2014 में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में भारत विश्व में 142 वें स्थान पर था और 2020 में वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट के अनुसार 63 वें स्थान पर पहुंचा। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में 2015 के 81 वें स्थान से 2025 में 38 वें स्थान पर पहुंचा यह शिक्षा और शोध में नवाचार को दर्शाता है। एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों) को विस्तार देने हेतु उन्हें पुनः परिभाषित किया गया है, जिसके फलस्वरूप बड़ी संख्या में इन उद्योगों का विस्तार हो रहा है।
पिछले बारह वर्षों में लिए गए नीतिगत सुधारों का असर अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है और इसलिए वैश्विक अस्थिरता के बावजूद आर्थिक विकास दर विश्व के अन्य देशों के मुकाबले तेज गति से बढ़ रही है। इस गति के आगे भी जारी रहने का पूर्वानुमान भी कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के द्वारा किया गया है। पिछले वर्ष 2025 के सुधारों में मुख्य रूप से आयकर स्लैब में बदलाव से वेतनभोगी वर्ग को आयकर में राहत मिलने से उनकी क्रय क्षमता बढ़ी है, जिसने उपभोक्ता बाजार को गतिशील बनाया। जीएसटी 2.0 के कारण उपभोक्ता बाजार में वस्तुओं के दाम में गिरावट आने से बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं ऑटोमोबाइल उत्पादों की मांग बढ़ी है। एमएसएमई में निवेश सीमा के विस्तार से कुटीर व लघु उद्योगों के विकास के अवसर बढ़े हैं।
श्रम संहिताओं के सुधार से श्रमिकों की जीवनशैली में बदलाव आएगा, दशकों से लंबित चार श्रम संहिताओं के अमल में आने से कार्यस्थल पर उत्पादकता में वृद्धि होगी व समाज में इसका सकारात्मक प्रभाव बढ़ेगा। इन संहिताओं में मुख्य रूप से वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता 2020 तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 शामिल हैं। इसके अलावा ग्रामीण विकास को गतिशील बनाने व ग्रामीण क्षेत्र से रोजगार की तलाश में पलायन की गति को रोकने की दृष्टि से ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’,वीबी जी-राम-जी योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कार्यों के अतिरिक्त युवाओं को 125 दिन का गारंटीड रोजगार उपलब्ध होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी।
आर्थिक विकास को गति देने के लिए कृषि, उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों के विकास हेतु अनगिनत योजनाएं संचालित हैं। साथ ही शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण हेतु राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 व आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीब नागरिकों को निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होने से उनकी कार्यक्षमता व जीवन प्रत्याशा में वृद्धि होगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अमल में आने से युवाओं में कौशल विकास, आत्मनिर्भरता तथा आत्मसम्मान का भाव विकसित होगा। आर्थिक आत्मनिर्भरता भारत के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है। कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक और आधारभूत संरचना के विकास में पिछले 12 वर्षों में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सकल घरेलू उत्पाद के साथ-साथ मानव विकास सूचकांक एवं खुशहाली सूचकांक में सुधार आवश्यक है और इसके लिए गुणवत्तायुक्त शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और सुदृढ़ीकरण के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में प्रभावी कदम उठाने होंगे। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
