उत्तराखंड की स्वच्छ पहचान पर ट्रैफिक का साया
एक समय था, जब उत्तराखंड का नाम लेते ही देवदार के जंगलों, हिमालय की चोटियों और स्वच्छ हवा की छवि मन में उभर आती थी। मैदानी क्षेत्रों के प्रदूषण से परेशान लोग यहां आकर राहत महसूस करते थे, लेकिन अब यह तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। राज्य के प्रमुख शहरों और पर्यटन स्थलों पर बढ़ता ट्रैफिक जाम न केवल लोगों की परेशानी बढ़ा रहा है, बल्कि उत्तराखंड की स्वच्छ हवा पर भी दबाव डाल रहा है।
देहरादून इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पिछले डेढ़ दशक में शहर का तेजी से विस्तार हुआ है। जनसंख्या और निजी वाहनों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण यहां लंबा जाम अब आम दृश्य बन चुका है। ट्रैफिक जाम केवल समय की बर्बादी नहीं है। जब वाहन धीमी गति से चलते हैं या लंबे समय तक एक स्थान पर खड़े रहते हैं, तो वे सामान्य स्थिति की तुलना में अधिक प्रदूषण फैलाते हैं।
पेट्रोल और डीजल वाहनों से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड तथा पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कण हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। ये कण फेफड़ों तक पहुंचकर अस्थमा, एलर्जी, ब्रोंकाइटिस और हृदय रोगों का खतरा बढ़ाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जाम के दौरान बढ़ने वाला “आइडलिंग इफेक्ट” भी प्रदूषण में महत्वपूर्ण योगदान देता है। डीजल वाहनों से निकलने वाला ब्लैक कार्बन स्वास्थ्य और जलवायु- दोनों के लिए खतरनाक माना जाता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, देहरादून में कई बार वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 200 से 300 के बीच या उससे ऊपर दर्ज किया गया है, जो “खराब” से “बहुत खराब” श्रेणी में आता है। सर्दियों और पर्यटन सीजन में यह स्थिति और गंभीर हो जाती है। यह चुनौती केवल देहरादून तक सीमित नहीं है। ऋ षिकेश, हरिद्वार, हल्द्वानी, नैनीताल और मसूरी भी बढ़ते ट्रैफिक दबाव का सामना कर रहे हैं।
गर्मियों में मसूरी मार्ग और चारधाम यात्रा के दौरान घंटों तक लगने वाले जाम पर्यावरण पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं। राज्य में वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों की सड़कें और भौगोलिक परिस्थितियां इस समस्या को और जटिल बनाती हैं। घाटियों में हवा का सीमित प्रवाह प्रदूषकों को लंबे समय तक रोके रख सकता है।
पर्यावरणविदों का मानना है कि शहरी विकास शहरों की वहन क्षमता से अधिक तेजी से हुआ है। सड़कों का विस्तार वाहनों की बढ़ती संख्या के अनुरूप नहीं हो पाया, जबकि हरित क्षेत्र भी लगातार सिमटते गए हैं। हालांकि जंगलों की आग, निर्माण कार्य, डीजल जनरेटर और बाहरी प्रदूषण भी कारण हैं, लेकिन ट्रैफिक जाम तेजी से एक प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है।
समाधान के लिए सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, पार्किंग और ट्रैफिक प्रबंधन में सुधार, पर्यटन स्थलों पर शटल सेवाओं को बढ़ावा देना, हरित क्षेत्रों का विस्तार, इलेक्ट्रिक वाहनों और साइकिल-अनुकूल अवसंरचना को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। साथ ही वायु गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क का विस्तार भी होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तराखंड को विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना होगा। स्वच्छ हवा केवल पर्यावरणीय संसाधन नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक और सामाजिक पूंजी भी है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो उत्तराखंड की वही पहचान संकट में पड़ सकती है, जिसके कारण लोग यहां खिंचे चले आते हैं। (ये लेखिका के निजी विचार हैं)
