संपादकीय : जमीन का आधार
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यूनीक प्रॉपर्टी आईडी व्यवस्था लागू करने की मंजूरी राज्य की भूमि और संपत्ति प्रबंधन प्रणाली में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। यदि यह योजना अपने घोषित स्वरूप में लागू होती है, तो यह राजस्व प्रशासन में तकनीकी सुधार के साथ भूमि स्वामित्व, पंजीकरण, कराधान और शहरी नियोजन की पूरी व्यवस्था को डिजिटल युग में ले जाएगी। जिस देश में अधिकांश दीवानी मुकदमे भूमि विवादों से जुड़े हों और जहां संपत्ति की वास्तविक स्थिति जानने के लिए नागरिकों को कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हों, वहां ऐसी पहल का महत्व स्वतः स्पष्ट हो जाता है। यूनीक प्रॉपर्टी आईडी का मूल विचार कि प्रत्येक भूमि पार्सल अथवा संपत्ति को एक विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान की जाए, सराहनीय है। यह संख्या भू-अभिलेख, जीआईएस मैपिंग, पंजीकरण, राजस्व रिकॉर्ड, नगर निकायों के कर अभिलेख, बिजली-पानी कनेक्शन और अन्य सरकारी सूचनाओं से जुड़ने का बड़ा लाभ यह होगा कि किसी संपत्ति की पहचान व्यक्ति के नाम से नहीं, बल्कि उसके भू-स्थान और आधिकारिक रिकॉर्ड से होगी। इससे स्वामित्व संबंधी भ्रम और रिकॉर्ड में विसंगतियां कम हो सकती हैं। विवादित और फर्जी संपत्तियों की खरीद-फरोख्त पर रोक संभव है।
वर्तमान व्यवस्था में एक ही भूमि के कई दस्तावेज तैयार कर लेना, मृत व्यक्ति के नाम की संपत्ति बेचना, सरकारी भूमि को निजी दिखाना या मुकदमेबाजी में फंसी संपत्ति का सौदा करना आसान नहीं रहेगा। यूनीक प्रॉपर्टी आईडी को न्यायालयों, राजस्व विभाग और पंजीकरण विभाग के डेटाबेस से प्रभावी रूप से जोड़ने और पंजीकरण अधिनियम में प्रस्तावित नई धाराएं 22 ए, 22 बी और 35 ए के समावेशन से उन संपत्तियों के पंजीकरण रुकेगा जो विवादित हैं, सरकारी नियंत्रण में हैं, न्यायिक प्रक्रिया में हैं या जिनके स्वामित्व पर गंभीर प्रश्न हैं, तो ऐसी संपत्तियों की पहचान पहले हो जाने पर उनके पंजीकरण पर रोक लगाई जा सकेगी।
तय है कि केवल डिजिटल पहचान से अवैध कब्जे समाप्त नहीं हो जाएंगे। भारत में भूमि विवाद केवल अभिलेखों की समस्या नहीं, बल्कि प्रभावशाली कब्जाधारियों, प्रशासनिक शिथिलता और लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं से भी जुड़े हैं। जीआईएस आधारित भू-अभिलेखों की विश्वसनीयता भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि प्रारंभिक सर्वेक्षण और डिजिटलीकरण में त्रुटियां रह गईं, तो वही गलतियां डिजिटल रूप में स्थायी हो सकती हैं। फिर भी इस पहल के लाभ व्यापक हैं। आम नागरिक को संपत्ति का सत्यापन कराने, नक्शा देखने, स्वामित्व जांचने और कर भुगतान के लिए अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। राजस्व विभाग को कर संग्रह में पारदर्शिता मिलेगी, नगर निकायों को संपत्ति कर का वास्तविक आधार प्राप्त होगा और निवेशकों के लिए भूमि लेन-देन अधिक सुरक्षित बन सकेगा।
सरकार को यह ख्याल रखना होगा कि यह केवल एक नई संख्या जारी करने तक सीमित न रहे, बल्कि भूमि प्रशासन के सभी विभागों को वास्तव में एकीकृत कर दे। यदि ऐसा हुआ, तो यह न केवल संपत्ति प्रबंधन की व्यवस्था बदलेगी, बल्कि भूमि विवादों, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जटिलताओं को कम करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी। डिजिटल शासन का वास्तविक अर्थ तभी है, जब तकनीक नागरिकों के लिए सुविधा और राज्य के लिए पारदर्शिता दोनों सुनिश्चित करे।
