पिता: मौन से संवाद तक 

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Published By Anjali Singh
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डिजिटल युग में पिता की भूमिका पहले से कहीं अधिक जटिल हो गई है। वह संबंध, तकनीक और सामाजिक अपेक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता दिखाई देता है। बच्चों के साथ समय बिताने की इच्छा, कामकाजी जीवन का दबाव और लगातार एक दूसरे से जुड़े रहने वाली दुनिया ने उसके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, लेकिन उसकी यह छवि एक लंबी सामाजिक यात्रा का परिणाम है। भारतीय परिवारों में पिता केवल एक संबोधन नहीं,  भरोसे,  सुरक्षा और जिम्मेदारी का आधार माना जाता रहा है। समय के साथ समाज और परिवार बदले, तो उसके दायित्वों के साथ रिश्तों को जीने का ढंग भी बदलता गया।

साठ और सत्तर के दशक का पिता एक अलग ही दुनिया का मनुष्य था। उसकी उपस्थिति भर से घर में अनुशासन बना रहता था। बच्चे उससे खुलकर बातें कम करते थे, लेकिन उसके होने से एक गहरा भरोसा जुड़ा रहता था। वह अपने संघर्षों,  थकान और चिंताओं को परिवार पर प्रकट नहीं होने देता था। 

सीमित साधनों के बीच बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को सुरक्षित बनाना ही उसके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य होता था। उस दौर में पुरुषों को स्नेह की खुली अभिव्यक्ति नहीं सिखाई जाती थी। इसलिए प्रेम अनुशासन और जिम्मेदारियों का बाना पहनकर चलता रहा। इस तरह के मौन की अपनी पीड़ा भी थी। पिता परिवार का केंद्र था,  फिर भी अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की स्वतंत्रता उसके पास नहीं थी। समाज उससे हर परिस्थिति में मजबूत बने रहने की अपेक्षा करता था। वह स्वयं भी किसी का बेटा था। उसके भीतर भी कोमलता और स्नेह था, लेकिन उन्हें व्यक्त करने की भाषा उसे विरासत में नहीं मिली थी। कई बार उसका अपनापन बच्चों तक पहुंचने से पहले ही कठोरता में बदल जाता रहा था।

अस्सी और नब्बे के दशक में शिक्षा,  शहरी जीवन और बदलती पारिवारिक संरचनाओं ने रिश्तों की भाषा बदलनी शुरू की। पिता बच्चों के जीवन में अधिक सक्रिय रूप से शामिल होने लगा। वह उनके स्कूल, पढ़ाई, खेल और मनोभावों के प्रति सजग हुआ। घर के भीतर भी उसकी भूमिका का दायरा बढ़ा। बच्चों की बीमारी में उनके पास बैठना,  उनकी समस्याएं सुनना और बेटियों के साथ सहज संवाद स्थापित करना अधिक सामान्य होता गया।

फिर भी यह परिवर्तन सहज नहीं था। यह पीढ़ी दो संस्कारों के बीच खड़ी थी। एक ओर अनुशासन की पुरानी परंपरा थी,  दूसरी ओर संवाद और साझेदारी का नया आग्रह। आज पिता पालन-पोषण को साझा जिम्मेदारी की तरह देखने लगा है और बच्चों के जीवन में अधिक सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है, लेकिन इस समय की अपनी विडंबनाएं हैं। कई बार पिता घर में मौजूद होते हुए भी स्क्रीन में इतना उलझ जाता है कि बच्चे उसके ध्यान का इंतजार करते रह जाते हैं। बच्चा अपनी कॉपी लेकर पास बैठा है और पिता “बस दो मिनट” कहकर मोबाइल पर झुका और समय का पता न चला। 

आज का पिता केवल परिवार की जिम्मेदारियों से नहीं, स्वयं की अपेक्षाओं से भी जूझ रहा है। नौकरी, प्रतिस्पर्धा और निरंतर सफल दिखाई देने की संस्कृति ने उसके भीतर एक स्थायी थकान पैदा कर दी है। उससे एक साथ सफल पेशेवर, जिम्मेदार अभिभावक और संवेदनशील परिवारजन होने की अपेक्षा की जाती है। फिर भी वर्तमान समय ने एक महत्वपूर्ण परिवर्तन संभव किया है। पिता अब बच्चों के जीवन में केवल संरक्षक की भूमिका नहीं निभाना चाहता, वह उनके अनुभवों और भावनाओं का सहभागी भी बनना चाहता है। समय के साथ पिता का स्वरूप बदला है, लेकिन उसकी मूल आकांक्षा नहीं बदली। वह हर दौर में अपने बच्चों के लिए एक सुरक्षित और बेहतर दुनिया बनाना चाहता रहा है। आने वाले समय में शायद वही पिता सबसे अधिक याद रखे जाएंगे, जिन्होंने बच्चों को केवल सुविधाएं नहीं, अपना समय और सुनने वाला मन दिया। क्योंकि स्मृतियों में वस्तुएं नहीं,  मनुष्य रहते हैं। बच्चों को किसी आदर्श पिता की छवि से अधिक उस पिता की आवश्यकता होती है, जिसकी आत्मीय उपस्थिति उनके जीवन और स्मृतियों दोनों में बनी रहे।

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कल्पना मनोरमा नोएडा

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