बच्चे की सहजता और योग की अवस्था में साम्यता

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Published By Deepak Mishra
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श्री श्री रवि शंकर, आध्यात्मिक गुरु

 

अक्सर लोग आध्यात्मिक पथ पर तब आते हैं, जब जीवन उन्हें चोट देता है, जब वे निराशा, तनाव या भीतर के खालीपन से गुजर रहे होते हैं। यह राह केवल संघर्ष से उपजी हो, यह आवश्यक नहीं। दरअसल, हर बच्चा जन्म से ही उस आध्यात्मिक ज्ञान के साथ आता है, जिसे योगी वर्षों की साधना करके खोजता है। बच्चे का श्वास लेना, उसकी मुस्कान और यहां तक कि उसका रोना भी एक गहरी शुद्धता से भरा होता है। वह हर पल को पूरी सजगता से जीता है। उसे किसी विधि की आवश्यकता नहीं, कोई क्रिया नहीं करनी होती। वह अपने स्वाभाविक रूप में ही एक योगी होता है।  जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, समाज, शिक्षा, अपेक्षाएं और अहंकार की परतें हमारे भीतर की सहजता को ढक देती हैं। हम भूल जाते हैं कि सरलता में ही पूर्णता है। एक योगी की यात्रा का उद्देश्य भी यही होता है, अपने उसी ‘भीतर के बच्चे’ तक लौटना, जो शुद्ध प्रेम, सहजता और सत्यता में जीता था।

योग सीखने के लिए एक तीन वर्ष के बच्चे को ध्यान से देखिए। उसका श्वास लेने का तरीका, उसकी मुस्कुराहट, उसकी प्रतिक्रियाएं, हर चीज में एक सजीव जुड़ाव होता है, स्वयं से, दूसरों से और पूरे अस्तित्व से। वह न भूत में जीता है, न भविष्य में। केवल ‘अब’ में जीता है। यही योग है। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो अधिकांश बच्चों में वह सहजता और स्वाभाविकता होती है, जो जीवन की भागदौड़ में हम खो बैठते हैं। वे द्वेष नहीं पालते, अपशब्द नहीं कहते, किसी को दुःखी करने की मंशा नहीं रखते। उनके क्रोध में भी निर्दोषता होती है और प्रेम में भी संपूर्णता। बच्चों में वह सहज निस्पृहता होती है, जिसे कई साधक त्याग का नाम देते हैं। कोई तपस्वी कह सकता है, “मैंने संसार का त्याग कर दिया है।”

लेकिन एक बच्चा तो बिना कुछ कहे ही त्याग में जीता है, क्योंकि उसके भीतर ‘चाह’ नहीं होती। उससे पूछिए, “क्या चाहिए?” वह अक्सर मुस्कुराकर कहेगा, “कुछ नहीं।” यह वही अवस्था है, जिसमें जब हम होते हैं, तो कर्म आनंद की अभिव्यक्ति बन जाते हैं। इच्छाएं पीछे छूट जाती हैं। यही अवस्था योग की है। प्रेम और शब्द दोनों की अपनी शक्ति होती है। यदि एक कठोर शब्द किसी व्यक्ति को आहत कर सकता है, तो एक कोमल शब्द उसे भीतर तक छू सकता है। यह समझ एक बच्चा सहजता से जीता है। वह जो कहता है, बिना छल व बनावट कहता है। वह जो करता है, उसमें पूर्ण उपस्थिति होती है। 

एक बार एक भक्त ने स्वामी से पूछा, “दिव्य नाम कहने, गाने या जप करने का क्या फायदा है? मैं तो ‘गधा’ या कुछ और भी कह सकता हूं।” स्वामी ने उस दिन कुछ नहीं कहा। अगले दिन, उन्होंने उस भक्त को बुलाया और डांटना शुरू कर दिया। यह कहते हुए, “तुम्हारा पिता गधा है!” और वे उसे ऐसे ही डांटते रहे। तुरंत भक्त का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और उसने चिल्लाया, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसी बातें कहने की!” उसका रक्तचाप बढ़ गया। तब स्वामी ने शांत भाव से कहा, “जब मैंने तुम्हारे पिता को गधा कहा, तो उस एक शब्द ने तुम पर इतना प्रभाव डाला, तो तुम्हें क्यों लगता है कि अच्छे शब्द कोई प्रभाव नहीं डालेंगे?”

इसलिए शब्दों का अपार महत्व है। मान लीजिए, गलती से आपके मुंह से कुछ बुरी कामनाएं निकल जाती हैं, तो क्या करें? बस कहें, ठीक है वह रद्द हो गया” और उस व्यक्ति के लिए एक प्रार्थना करें। योग हमें शब्दों से अधिक उपस्थिति से पहचानना सिखाता है। आप कितनी भी किताबें पढ़ लें, कितनी ही भाषाएं जान लें, लेकिन यदि आपके व्यवहार में प्रेम नहीं झलकता, तो वह ज्ञान अधूरा है। इसलिए जब हम कहते हैं कि योग एक साधना है, तो उसका अर्थ केवल आसन या ध्यान नहीं होता। यह वह प्रक्रिया है, जिसमें हम अपने भीतर के उस सहज, निर्मल और प्रेममय बच्चे से दोबारा जुड़ते हैं। वास्तविक ज्ञान हमारी उपस्थिति को शुद्ध करने के बारे में है, केवल हमारे शब्दों को व्यवस्थित करने के बारे में नहीं। यही हमें भीतर से खुश करता है।

योग वह यात्रा नहीं है, जो हिमालय में शुरू होती है। वह तो उस अवस्था को पुनः याद करना है, जिसमें हम बचपन में जीते थे, जब हम हर किसी को अपना मानते थे, जब कोई दिखावा नहीं था, कोई छल नहीं था। अगर योग को समझना हो, तो किसी सिद्ध गुरु से पहले एक बच्चे की तरफ देखिए। वह न उपदेश देगा, न किताब खोलेगा, लेकिन उसकी मासूम मुस्कान, उसकी नजर और उसका मौन- आपको वह सिखा जाएगा, जो शब्द नहीं सिखा सकते। बचपन कोई उम्र नहीं, एक अवस्था है। योग उस अवस्था की वापसी का सबसे सुंदर मार्ग है।

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