नई सड़क परियोजनाओं में अनिवार्य हो फुटपाथ
देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो केवल कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि हमारी विकास की सोच पर भी गहरा सवाल खड़ा करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फुटपाथ पर सुरक्षित चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और सड़कों पर पैदल चलने वालों का अधिकार मोटर वाहनों से अधिक महत्वपूर्ण है। अदालत की यह टिप्पणी कि इंसान ने पहिए आने से बहुत पहले चलना सीख लिया था, केवल एक ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि हमारी शहरी और ग्रामीण विकास नीतियों पर गंभीर टिप्पणी भी है।
यह फैसला एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें एक पिता ने अपने पांच वर्षीय बेटे को खो दिया था। अदालत ने मामले को केवल मुआवजे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पैदल चलने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 से जोड़ते हुए उसे मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में देश का विकास लगभग पूरी तरह मोटर वाहनों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है।
शहरों में फ्लाईओवर बने, चौड़ी सड़कें बनीं और एक्सप्रेस-वे तैयार हुए, लेकिन पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित फुटपाथों की जरूरत को लगातार नजरअंदाज किया गया, जबकि देश की बड़ी आबादी आज भी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए पैदल चलती है। गरीब, मजदूर, बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे, दिव्यांग और छोटे कस्बों के निवासी सबसे अधिक पैदल यात्रा करते हैं, लेकिन सड़कें मानो केवल वाहनों के लिए आरक्षित कर दी गई हैं। अदालत का यह कहना पूरी तरह सही है कि शुरुआत में यह एक तरह का ‘अभिजात्य प्रभाव’ था।
जब वाहन केवल संपन्न वर्ग के पास थे, तब भी पैदल यात्रियों को महत्व नहीं मिला और जैसे-जैसे वाहनों की संख्या बढ़ती गई, सड़कों पर उनका एकाधिकार स्थापित होता गया। आज स्थिति यह है कि अनेक शहरों में फुटपाथ हैं ही नहीं और जहां हैं, वहां अतिक्रमण, पार्किंग, ठेले और दुकानों ने उन्हें लगभग समाप्त कर दिया है। यह निर्णय कई महत्वपूर्ण संदेश देता है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब फुटपाथ कोई सरकारी दया या सुविधा का विषय नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार का प्रश्न है।
अदालत ने नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों, नगरपालिकाओं और ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट कर दी है। अब वे संसाधनों की कमी या प्राथमिकता का बहाना नहीं बना सकते। यदि सड़क है, तो पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित मार्ग भी होना चाहिए। इस फैसले के बाद नागरिकों को यह अधिकार भी मिला है कि यदि फुटपाथ नहीं हैं, जर्जर हैं या उन पर कब्जा है, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
यदि इस फैसले को गंभीरता से लागू किया गया, तो इसके दूरगामी लाभ होंगे। सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी, बच्चे अधिक सुरक्षित रूप से स्कूल जा सकेंगे, बुजुर्गों और महिलाओं की आवाजाही आसान होगी तथा दिव्यांगजन के लिए सार्वजनिक स्थान अधिक सुलभ बनेंगे। साथ ही पैदल चलने की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि बड़ा सवाल क्रियान्वयन का है।
देश के अधिकांश छोटे शहरों और कस्बों में फुटपाथ नाममात्र के हैं, जहां बने भी हैं, वे अतिक्रमण की चपेट में हैं।ऐसे में नगर निकायों को फुटपाथों का सर्वे कराना चाहिए, अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाने चाहिए और नई सड़क परियोजनाओं में फुटपाथ को अनिवार्य बनाना चाहिए। स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों के आसपास पैदल यात्रियों की सुरक्षा को विशेष प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
दरअसल किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी चौड़ी सड़कों और फ्लाईओवरों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां सबसे कमजोर व्यक्ति कितनी सुरक्षा और सम्मान के साथ चल सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संवैधानिक दिशा दे दी है। अब जिम्मेदारी सरकारों की है कि वे इस ऐतिहासिक फैसले को कागजों से निकालकर जमीन पर उतारें। आखिर सड़क पर सबसे पहला अधिकार उस नागरिक का है, जो अपने दो पैरों पर चल रहा है, न कि उस वाहन का जो पहियों पर दौड़ रहा है।
