आत्मनिर्भरता के साथ हरित क्रांति की तरफ उड़ान
देश में पिछले कुछ समय से पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में कई बार वृद्धि ने जहां लोगों की परेशानी बढ़ाई है, वहीं सरकार के सामने अपना भारी भरकम तेल आयात बिल कम करने की चुनौती है। इसे देखते हुए ही भारत सरकार ई-85 और ई-100 फ्यूल को लेकर नियम बनाने की तैयारी कर रही है। फ्लेक्स फ्यूल तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे पेट्रोल की खपत कम होगी और देश की विदेशी तेल पर निर्भरता कम होगी। केंद्रीय सड़क राजमार्ग परिवहन मंत्रालय ने पिछले दिनों फ्लेक्स फ्यूल वाहनों के लिए नए नियमों का ड्राफ्ट भी जारी किया है, इसी के बाद से फ्लेक्स फ्यूल कारें काफी चर्चा मे हैं। इनकी खासियत यह है कि यह पूरी तरह 100 फीसदी एथेनॉल पर चल सकेंगी, जिससे प्रदूषण कम होगा और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता भी कम होगी। देश के ऑटोमोबाइल निर्माता फ्लेक्स-फ्यूल से चलने वाले वाहनों के प्रोटोटाइप और कमर्शियल मॉडल पेश कर रहे हैं। मारूति, टाटा और हीरो कार्प जैसी कंपनियां इस तकनीक पर आधारित वाहन बाजार में उतारने की तैयारी कर चुकी हैं
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ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ा कदम
भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए तेजी से फ्लेक्स-फ्यूल (लचीले ईंधन) तकनीक की ओर कदम बढ़ा रहा है। यह कोशिश आने वाले समय में ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़े बदलाव का गवाह बनने की तरफ अग्रसर है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (ई-20) का लक्ष्य हासिल करने के बाद अब फ्लेक्स फ्यूल तकनीक का काम परवान चढ़ते ही वैश्विक स्तर पर ब्राजील और अमेरिका के बाद भारत इस तकनीक को अपनाने वाला तीसरा बड़ा देश और दुनिया का सबसे बड़ा ऑटो बाजार बन जाएगा। पारंपरिक पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार के साथ वाहन निर्माता कंपनियां भी इस तकनीक को जमीन पर उतारने के तेजी से वाहनों के इंजन में जरूरी बदलाव करने में जुटी हैं। कई प्रमुख कार कंपनियों ने फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक अपनाने का अपना रोड मैप भी घोषित कर दिया है।
क्या है फ्लेक्स फ्यूल तकनीक
फ्लेक्स फ्यूल एक ऐसी तकनीक है जो कारों और बाइक्स को पेट्रोल और एथेनॉल के किसी भी मिश्रण पर चलने की अनुमति देती है। इसमें लगे स्मार्ट सेंसर ईंधन के मिश्रण को पहचानकर उसी अनुसार इंजन के परफॉर्मेंस को एडजस्ट करते हैं। दरअसल, फ्लेक्स फ्यूल वाहनों में एक विशेष फ्यूल कंपोजिशन सेंसर और डायनेमिक इंजन कंट्रोल यूनिट लगी होती है। यह सेंसर पहचान लेता है कि टैंक में पेट्रोल और एथेनॉल का क्या अनुपात है। इंजन कंट्रोल यूनिट सेंसर से डेटा मिलने के बाद, इंजन में हवा और ईंधन के अनुपात को डायनेमिक तरीके से बदल देता है।
ई-100 का मतलब 100 प्रतिशत एथेनॉल
फ्लेक्स फ्यूल वाहन ऐसी तकनीक पर काम करती है जिसे पेट्रोल, एथेनॉल या इन दोनों के मिश्रण से चलाया जा सकता है। अभी भारत में मिलने वाली सामान्य पेट्रोल कारें केवल 20% एथेनॉल मिक्स पेट्रोल (ई-20) पर चलती हैं। लेकिन फ्लेक्स फ्यूल कारें बहुत ज्यादा एथेनॉल मिक्स पेट्रोल जैसे ई-85 या ई-100) पर भी बिना किसी खराबी के आराम से चल सकती हैं। ई-100 का मतलब है कि इसमें 100% एथेनॉल होगा।
अभी पेट्रोल में 20% एथेनॉल, इसे बढ़ाकर 85 % करने की तैयारी
फ्लेक्स फ्यूल यानी फ्लेक्सिकबल फ्यूल को पेट्रोल और एथेनॉल के मिश्रण से बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा को अलग अलग स्तर पर मिलाया जा सकता है। देश में वर्तमान में पेट्रोल पंपों पर 20 फीसदी एथेनॉल के मिश्रण वाले पेट्रोल की बिक्री की जा रही है। अब इसे लगातार बढ़ाने की तैयारी है। जल्दी ही एथेनॉल का मिश्रण बढ़ाकर 85 से 100 फीसदी तक किया जा सकता है। यह देखा जा चुका है कि वाहनों के विशेष प्रकार से तैयार किए गए इंजन पारंपरिक पेट्रोल के साथ न सिर्फ 85 प्रतिशत तक एथेनॉल मिश्रण (ई-85) पर भी आसानी से चल सकते हैं, बल्कि ई-100 पर भी इन्हें चलाया जा सकता है।
मारुति, टाटा और टोयटा ला रही हैं इस तकनीक पर आधारित कारें
मारुति सुजुकी ने फ्लेक्स फ्यूल वाहन उतारने की बड़ी तैयारी करते हुए 100 फीसदी एथेनॉल पर चलने वाली कार का प्रदर्शन किया है। कंपनी वैगन-आर या फ्रॉन्क्स में किसी एक कार को इस तकनीक के साथ बाजार में जल्दी ही उतार सकती है। टोयटा इलेक्ट्रिक फ्लेक्स फ्यूल कार इनोवा हाईक्रास पर काम कर रही है। टाटा मोटर्स ऐसे इंजन तैयार कर रही है जो अलग-अलग एथेनॉल ब्लेंड पर आसानी से चलाए जा सकें। पिछले साल टाटा मोटर्स ने अपनी ‘पंच’ कार का फ्लेक्स फ्यूल प्रोटोटाइप मॉडल प्रदर्शित किया था। इसके लिए इंजन में जरूरी बदलाव किए गए थे। कंपनी का कहना है कि वह ई-100 फ्यूल के लिए वाहनों के इंजन की नई तकनीक तेजी से विकसित कर रही है।
दो साल में देश में पांच हजार ई-100 एथेनॉल फ्यूल स्टेशन
फ्लेक्स फ्यूल तकनीक का लक्ष्य हासिल करने में हालांकि कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं। इनमें पूरे देश में एथेनॉल की सप्लाई चेन सुनिश्चित करना, एथेनॉल पंपों का बुनियादी ढांचा तैयार करना और फ्लेक्स-फ्यूल इंजन के कारण वाहनों की निर्माण लागत में होने वाली बढ़ोतरी को नियंत्रित करना शामिल है। कंपनियों ने अगर तेजी के साथ ऐसे वाहन बाजार में उतारने शुरू कर दिए तो शुरू में फ्लेक्स फ्यूल ईंधन की उपलब्ध ता बड़ी चुनौती हो सकती है, क्योंेकि देश में इस तकनीक का ईंधन को उपलब्ध करवाने में अभी कम से कम एक साल का समय लग सकता है। सरकार को भी इन दिक्कतों का पता है, इसीलिए एथेनॉल के इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से बढ़ाने की योजना पर काम चल रहा है। केंद्रीय सड़क एवं राजमार्ग परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक अगले दो सालों के अंदर पूरे देश में लगभग पांच हजार ई-100 एथेनॉल फ्यूल स्टेशन खोले जाएंगे, ताकि ग्राहकों को ईंधन की कोई कमी न होने पाए। इसी क्रम में सरकार पानी की अधिक खपत वाली गन्ने की फसल पर निर्भरता कम करने के लिए मक्के और कृषि अपशिष्ट से 'सेकंड जनरेशन' एथेनॉल बनाने पर जोर दे रही है।
आयात में कमी से विदेशी मुद्रा बचेगी, किसानों की आय बढ़ेगी
देश अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। पेट्रोल में एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से भारी विदेशी मुद्रा की बचत होगी। एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ना, मक्का और अधिशेष खाद्यान्न से होता है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और किसानों को सीधा वित्तीय लाभ मिलेगा।इसके साथ ही एथेनॉल आधारित ईंधन से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन का उत्सर्जन पेट्रोल की तुलना में काफी कम होता है।
तकनीक के नुकसान, जिन्हें लेकर जताई जा रही है चिंता
ऑटो विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लेक्स फ्यूल का सबसे बड़ा नुकसान वाहन की माइलेज पर पड़ सकता है। सामान्य पेट्रोल से चलने वाले वाहनों के मुकाबले इस फ्यूल से चलने वाले वाहनों की माइलेज 15 से 20 फीसदी तक कम हो सकती है। ऐसा इसलिए हो सकता है, क्योंेकि एथेनॉल की ऊर्जा डेंसिटी पेट्रोल के मुकाबले कम होती है। यही नहीं, वाहन की इंजन की उम्र पर भी फ्लेक्स फ्यूल का असर पड़ सकता है। सामान्य पेट्रोल के मुकाबले इस ईंधन से चलाए जाने वाले वाहनों में पाइप, रबर सील जैसे पार्ट्स जल्दी खराब हो सकते हैं। इसी तरह वाहनों की कीमत थोड़ी बढ़ सकती है। इसकी वजह नई तकनीक का उपयोग वाहनों में करने पर आने वाला खर्च होगी।
-मनोज त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार
