एंसेल्म कीफर : इतिहास, स्मृति और सभ्यता के अवशेष

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Published By Anjali Singh
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कला केवल सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है या मानवीय संबंधों, इतिहास, स्मृति, राजनीति, पर्यावरण, मिथक और यहाँ तक कि मानवीय अस्तित्व जैसे सवाल भी इसके केंद्र में हैं या हो सकते हैं । इन सभी प्रश्नों और मुद्दों का जवाब हमें जिन समकालीन कलाकारों की कृतियों में मिलती हैं, उनमें एक उल्लेखनीय नाम हैं एंसेल्म कीफ़र। 1945 में जर्मनी में जन्मे कीफ़र यानी एक ऐसा कलाकार जिनका प्रारंभिक जीवन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के जर्मनी की सामाजिक और नैतिक परिस्थितियों से प्रभावित रहा है । संभवतः यही कारण है कि उनकी कला में युद्ध, विनाश, अपराध-बोध, पुनर्निर्माण और सभ्यता की स्मृतियाँ बार-बार लौटती हैं।

इतिहास के साथ संवाद

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कीफर ने चित्रकला, रेखांकन, फोटोग्राफी, छापाचित्रण, मूर्तिकला और विशाल इंस्टॉलेशन (संस्थापन) कला के माध्यम से वैश्विक कला जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी कृतियां सामान्यतया असाधारण रूप से बड़े आकार की होती हैं, जिनमें दर्शक केवल चित्र को देखते नहीं, बल्कि उसके भीतर प्रवेश करने जैसा अनुभव करते हैं। वे अपनी कृतियों के लिए कैनवास पर तेलरंग के साथ-साथ मिट्टी, राख, भूसा, सीसा, रेत, लकड़ी, सूखे पौधे, धातु और जले हुए पदार्थों का प्रयोग करते हैं। इस कारण उनकी रचनाएं चित्र और वस्तु के बीच की सीमाओं को धुंधला कर देती हैं। कीफर की कला का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इतिहास के साथ उनका संवाद है। उन्होंने जर्मनी के नाज़ी अतीत और उससे जुड़े सामूहिक अपराध-बोध पर गंभीर कलात्मक हस्तक्षेप किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जिस दौर में जर्मन समाज अपने भयावह अतीत को भूलने की कोशिश कर रहा था, तब कीफ़र ने अपनी कला के माध्यम से उसे अभिव्यक्ति देने को प्राथमिकता दी। उनकी आरंभिक कृतियां इस प्रश्न को उठाती हैं कि क्या किसी समाज के लिए अपने इतिहास से बच निकलना या आंखें चुरा लेना संभव है। दरअसल कीफ़र स्मृतियों को किसी बोझ के बजाए आत्मबोध का प्रमुख आधार मानते हैं।

पर्यावरण और प्रकृति

वैसे इतिहास के साथ-साथ मिथक और साहित्य भी उनकी कला के प्रमुख स्रोत हैं। अपनी कलाकृतियों के लिए वे जर्मन, यहूदी, यूनानी और मिस्री मिथकों से लेकर कविता और दर्शन तक अनेक स्रोतों का उपयोग करते हैं। विशेष रूप से जर्मन भाषी रोमानियाई कवि पॉल सेलान की कविताओं का प्रभाव उनकी कई कृतियों में दिखाई देता है। पॉल सेलान की कविताओं ने एंसेल्म कीफ़र को इतिहास, स्मृति, होलोकॉस्ट और मानवीय त्रासदी के प्रश्नों से गहराई से जोड़ने को प्रेरित किया। सेलान की कविता “डेथ फ्यूग” विशेष रूप से कीफ़र की कई कृतियों का आधार बनी। उनके चित्रों में अक्सर परित्यक्त भवन, जली हुई भूमि, निर्जन खेत और आकाश की अनंतता दिखाई देती है, जो सभ्यता के उत्थान और पतन दोनों की ओर संकेत करते हैं। पर्यावरण और प्रकृति के प्रति उनकी यह दृष्टि विशेष उल्लेखनीय है। क्योंकि वे प्रकृति को केवल दृश्य-सौंदर्य के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे स्मृति, समय और जीवन-चक्र के रूप में समझते हैं। सूखे फूल, भूसा, पेड़-पौधे और धरती उनकी कृतियों में प्रतीकों के रूप में उपस्थित रहते हैं। इन तत्वों के माध्यम से वे मनुष्य और प्रकृति के संबंधों पर पुनर्विचार करते हैं। उनकी कला हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि सभ्यता का विकास और पर्यावरणीय विनाश किस प्रकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

सभ्यता की आत्मपरीक्षा

कीफर की एक अन्य विशेषता अपनी कृतियों के निर्माण के लिए बरती जाने वाली उनकी सामग्री चेतना भी है। वे मानते हैं कि पदार्थ भी अपने आप में इतिहास और स्मृतियों को समेटे रहते हैं। उदाहरण के लिए, सीसा उनकी कला में बार-बार दिखाई देता है। दरअसल यह धातु उनके लिए परिवर्तन, भार, रहस्य और आध्यात्मिक रूपांतरण का विशेष प्रतीक है। इसी प्रकार राख और जले हुए अवशेष उनकी कृतियों में विनाश के साथ-साथ पुनर्जन्म का भी संकेत देते हैं। इस तरह से उनकी कला में सौंदर्य और भय, निर्माण और विनाश, आशा और निराशा एक साथ उपस्थित रहते हैं। यही द्वंद्व उनकी रचनाओं को गहरी दार्शनिकता प्रदान करता है। देखा जाए तो अपनी कृतियों के माध्यम से वे दर्शक को सरल उत्तर नहीं देते, बल्कि उन्हें उन प्रश्नों के बीच खड़ा कर देते हैं। ताकि दर्शक स्वयं उसका उत्तर तलाश सके । उनकी कृतियाँ हमें स्मरण कराती हैं कि कला केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि इतिहास, स्मृति और मानवता के साथ संवाद का माध्यम भी है। भारतीय संदर्भ में एंसेल्म कीफ़र का कलात्मक योगदान इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वे कला को केवल दृश्य-सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास, स्मृति, मिथक और सभ्यता के आत्मचिंतन का जरिया मानते हैं। वास्तव में उनकी यह दृष्टि भारतीय कला-परंपरा के उस विचार से मेल खाती है, जहां कला का संबंध केवल रूप-सौंदर्य से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक अनुभव से भी रहा है। उनकी रचनाएं यह सिद्ध करती हैं कि कला केवल सौंदर्य का उत्सव नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मपरीक्षा का भी एक विशिष्ट जरिया है। इन्हीं कारणों से आज वे विश्व कला-जगत के सबसे प्रभावशाली और चिंतनशील कलाकारों में अग्रणी माने जाते हैं। 

-सुमन कुमार सिंह

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