वैश्विक शोध का केंद्र अवध विवि की श्रीराम शोध पीठ 

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Published By Anjali Singh
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मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय में स्थापित श्रीराम शोध पीठ राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर अपनी आभा बिखेर रही है। इस शोध पीठ से न केवल 156 देश सीधे जुड़े हैं, बल्कि श्रीराम से जुड़े 251 महत्वपूर्ण ग्रंथ शोध पीठ की शोभा बढ़ा रहे हैं। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय में स्थापित श्रीराम शोध पीठ भारतीय ज्ञान परंपरा, कला, संस्कृति और रामायणीय दर्शन के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय केंद्र बनकर उभरा है।    

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श्रीराम शोध पीठ स्थापना 25 फरवरी, 2001 को तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री के मार्गदर्शन में की गई थी। स्थापना के बाद से यह केंद्र निरंतर श्रीराम के जीवन-दर्शन, भारतीय कला-शैलियों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं शोध में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। श्रीराम शोध पीठ में चित्रित भित्ति चित्रों के माध्यम से भारतीय कला की विविध परंपराओं का सजीव एवं ऐतिहासिक चित्रण किया गया है। इनमें गुरुकुल शिक्षा-दीक्षा की परंपरा, ईरानी शैली का विस्तृत प्रदर्शन, मेवाड़ शैली में बाल चरित्र, तंजौर शैली में राम दरबार तथा मुगल शैली में ताड़का वध एवं सीता स्वयंवर जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों का प्रभावशाली कलात्मक निरूपण शामिल है। इसके साथ ही हनुमान जी द्वारा श्रीराम को मुद्रिका प्रदान करने तथा लंका दहन जैसे प्रसंगों को भारतीय इतिहास और कला के संदर्भ में अत्यंत जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इस शोध पीठ में भगवान श्रीराम से संबंधित लगभग 251 ग्रंथ संरक्षित हैं, जो विभिन्न भाषाओं, धर्म साहित्य, दर्शन एवं संस्कृति पर शोध के लिए आधारित हैं। ये शोधार्थियों के लिए अध्ययन एवं अनुसंधान का सशक्त आधार प्रदान करते हैं। अब तक अनेक शोधार्थी इस केंद्र से जुड़कर रामकथा, भारतीय संस्कृति एवं कला इतिहास पर अपना शोध कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण कर चुके हैं।

पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों के संदर्भ में भी श्रीराम का चरित्र अत्यंत 

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प्रेरणादायक श्रीराम शोध पीठ के समन्वयक प्रो. हिमांशु शेखर सिंह ने बताया कि कुलपति के प्रयासों से श्रीराम शोध पीठ न केवल भारतीय संस्कृति और कला का संरक्षक केंद्र बनेगा, बल्कि यह आधुनिक जीवन मूल्यों को भारतीय दर्शन से जोड़ने वाला एक सशक्त अकादमिक मंच भी बनाने का प्रारूप तैयार किया जा रहा है। श्रीराम शोध पीठ का लक्ष्य यह भी है कि देश-विदेश की शैक्षिक संस्थाओं से संबद्ध नई-नई विधाओं को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।ॉ

कुलपति के नेतृत्व में मिल रहा है शोध पीठ को नया आयाम

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कुलपति डॉ. बिजेन्द्र सिंह के मार्गदर्शन में श्रीराम शोध पीठ को और अधिक सुदृढ़ एवं वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित बनाने के लिए सतत प्रयास किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का उद्देश्य इसे एक अंतर्राष्ट्रीय शोध केंद्र के रूप में विकसित करना है, जिससे श्रीराम के जीवन-दर्शन और भारतीय ज्ञान परंपरा का व्यापक वैश्विक प्रसार सुनिश्चित हो सके। कुलपति ने ‘अमृत विचार’ को बताया कि भगवान श्रीराम की वास्तविक प्रासंगिकता किसी एक युग, काल या धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका जीवन समस्त मानव जाति के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शक है। आज के आधुनिक एवं तनावपूर्ण समय में, जब व्यक्ति छोटी-छोटी परिस्थितियों में भी धैर्य खो देता है, तब श्रीराम का ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ स्वरूप आत्म-अनुशासन और भावनात्मक संतुलन का आदर्श प्रस्तुत करता है। उनका ‘रामराज्य’ केवल एक धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक आदर्श कल्याणकारी राज्य का प्रतीक है, जिसमें समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और कल्याण सुनिश्चित किया जाता है।

पीठ का विदेशों में महत्व

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भगवान राम और रामायण की महिमा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर इसकी गहरी जड़ें हैं। यहां दुनिया के 156 से अधिक प्रमुख देशों की लोक-संस्कृति, इतिहास, कला और दैनिक जीवन में भगवान राम की स्पष्ट और जीवंत उपस्थिति मिलती है।

थाईलैंड रामायण को ‘रामकियेन’ कहा जाता है, जो वहां का राष्ट्रीय ग्रंथ है। थाईलैंड की प्राचीन राजधानी का नाम ‘अयुथ्या’था, जो अयोध्या पर आधारित है। यहां के राजाओं को ‘राम’ की उपाधि दी जाती है (जैसे वर्तमान राजा राम दशम हैं)।

इंडोनेशिया: दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले इस देश में रामकथा रग-रग में बसी है। यहां की रामायण को ‘काकाविन रामायण’ कहा जाता है। यहां के मुस्लिम कलाकार आज भी पूरी श्रद्धा से रामलीला (वायंग या शैडो पपेट्री) का मंचन करते हैं।

कंबोडिया: यहां रामायण को ‘रीमकर’ के नाम से जाना जाता है। विश्व के सबसे बड़े मंदिर परिसर ‘अंकोरवाट’ की दीवारों पर रामकथा के प्रसंग बहुत ही खूबसूरती से उकेरे गए हैं।

लाओस: इस देश का नाम ही भगवान राम के पुत्र ‘लव’ के नाम पर माना जाता है। यहां रामायण को ‘फरा लक फरा राम’ कहा जाता है।

मलेशिया: यहां की लोककथाओं में रामायण ‘हिकायत सेरी राम’ के रूप में जीवित है। यहां आज भी प्रशासनिक और सांस्कृतिक स्तर पर रामकथा के प्रतीकों (जैसे ‘श्री पादुका’) का सम्मान किया जाता है।

म्यांमार (बर्मा): यहां रामकथा को ‘यामा जादॉ’ कहा जाता है, जिसे वहां की बौद्ध परंपराओं के साथ जोड़कर बड़े आदर से देखा जाता है।

फिलीपींस: यहां के मरानाओ समुदाय में ‘महाराडिया लवना’ नाम की लोककथा प्रचलित है, जो सीधे तौर पर रामकथा का ही रूपांतरण है।

- प्रस्तुति-कमर अब्बास, अयोध्या

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