NEET Paper Leak: सात बच्चों की जान लेने वाले भ्रष्टाचारी... बने प्रतिभाओं के शत्रु

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Published By Muskan Dixit
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लखनऊः रामेंद्र ने चैनल पर जैसे ही यह समाचार सुना कि नीट परीक्षा का प्रश्न पत्र लीक हो जाने के कारण सरकार ने परीक्षा निरस्त करने तथा इस प्रकरण की जांच सीबीआई द्वारा कराने का निर्णय लिया है, उसका खून खौल गया। वह तैयार होकर अपने कार्यालय पहुंचा, तो कार्यालय में भी देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित परीक्षाओं में गिनी जाने वाली नीट परीक्षा के निरस्त किए जाने का समाचार चर्चा में था। कुछ ही देर में आईजी महोदय ने उसे अपने कक्ष में बुलाकर बताया कि नीट परीक्षा में प्रश्न पत्र लीक होने के मामले की जांच के लिए जो टीम गठित की गई है, उसमें तुम्हारा नाम भी है। अतः तुम्हें शीघ्र ही टीम के अन्य सदस्यों के साथ जांच के सिलसिले में बाहर जाना पड़ेगा। महीना-दो महीना देश के दूसरे हिस्सों में भाग दौड़ के लिए तैयार रहना।

यह सुनकर कर रामेंद्र की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसे अपने द्वारा दी गई उप-निरीक्षक की परीक्षा के निरस्त होने की घटना ताजा हो गई। वह सोचने लगा कि जो अभ्यर्थी दिन रात मेहनत करके परीक्षा की तैयारी करते हैं, परीक्षा निरस्त कर दिए जाने पर उनके दिल पर क्या बीतती है, यह तो वही जानते हैं। ये धन-दौलत के लिए अपना ईमान तक बेच देने वाले भ्रष्ट लोग धन के लोभ में अनैतिक तरीके अपनाकर प्रतिभावान युवकों का हक छीनकर धनी परिवार में जन्मे अयोग्य युवकों की झोली में डालकर प्रतिभावान बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं। उन बच्चों के माता-पिता ने किस तरह पेट काटकर इन बच्चों को पढ़ाया होगा, इन बच्चों के क्या अरमान होंगे, इसकी इन धन लोलुपों को कोई चिंता नहीं होती। इस बार ईश्वर ने मुझे इन पीड़ित बच्चों को न्याय दिलाने का अवसर प्रदान किया है, तो मैं भी इन निकृष्ट धन पशुओं को पकड़ने और सबक सिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा। इन्हें पकड़ने और दंड दिलाने में जमीन आसमान एक कर दूंगा।

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वास्तव में रामेंद्र एक प्रतिभावान व्यक्ति था, जिसे इस भ्रष्ट व्यवस्था का शिकार होना पड़ा था और मजबूरी में अपनी योग्यता से बहुत नीचे के पद पर नियुक्ति को स्वीकार करना पड़ा था। रामेन्द्र की नियुक्ति पुलिस विभाग में सिपाही के पद पर हुई थी। किंतु अपनी प्रतिभा, लगन और कठिन परिश्रम के बल पर उसने समय-समय पर विभागीय परीक्षाएं उत्तीर्ण कर प्रोन्नति प्राप्त की और वर्तमान में सीबीआई के दिल्ली स्थित कार्यालय में पुलिस उपाधीक्षक के पद पर कार्यरत है।

छात्र जीवन में वह हमेशा अपनी कक्षा में प्रथम आता था। उसके पिता लघु सीमांत कृषक थे, जो किसी प्रकार पुरखों से प्राप्त खेतों में अत्यंत परिश्रम से  खेती करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। रामेंद्र उनका इकलौता बेटा था। उसने इंटरमीडिएट की परीक्षा में महात्मा गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज के इतिहास में सर्वाधिक अंक अर्जित करने का रिकार्ड बनाया था।

रामेंद्र के पिता राम चरण की इच्छा थी कि अब रामेंद्र कस्बे में नगर पालिका कार्यालय या किसी विद्यालय में नौकरी कर लें, मगर रामेंद्र आगे और पढ़ाई करना चाहता था। जब रामचरण ने गरीबी के कारण अपने पुत्र को आगे पढ़ाने में असमर्थता जता दी, तो रामेंद्र बहुत उदास हो गया। उसके आगे न पढ़ने की बात, जब महात्मा गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज के प्रधानाचार्य अरविंद कुमार को ज्ञात हुई, तो वह बहुत दुखी हुए। प्रधानाचार्य महोदय रविवार के दिन समय निकालकर रामेंद्र के घर पहुंचे और राम चरण को समझाते हुए कहा- “रामचरण जी, आपका पुत्र रामेंद्र बहुत प्रतिभाशाली युवक है। इसकी पढ़ाई जारी रखो चाहे इसके लिए तुम्हें ऋ ण ही क्यों न लेना पड़े। यह लड़का आगे चलकर तुम्हारा और तुम्हारे परिवार को इस गरीबी के दलदल से बाहर ले आएगा।

प्रधानाचार्य महोदय की सलाह मानकर रामचरण ने रामेंद्र को ऋण लेकर आगे पढ़ाने का निर्णय लिया। रामेंद्र ने शहर जाकर बीएससी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद भौतिक विज्ञान की स्नातकोत्तर परीक्षा में उसने विश्वविद्यालय में उस वर्ष सर्वाधिक अंक प्राप्त किए थे और विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा उसे स्वर्ण पदक से सम्मानित भी किया गया था। इसके बाद रामेंद्र नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया। शरीर से हष्ट-पुष्ट होने के कारण वह सेना अथवा पुलिस विभाग में नौकरी करना चाहता था, किंतु उसके माता-पिता उसे सेना में भेजने के लिए तैयार नहीं थे। अतः उसने अपना सारा ध्यान पुलिस विभाग की नौकरी पर केंद्रित कर दिया था। आईपीएस की लिखित परीक्षा में वह दो बार सम्मिलित हुआ, किंतु सफलता नहीं मिली।

इसके बाद रामचरण ने एक दिन उसे अपने पास बैठा कर कहा-“बेटा, तुम्हारी पढ़ाई के कारण मेरे ऊपर बहुत कर्ज हो गया है, जिसका मैं ब्याज तक नहीं चुका पा रहा हूं। खेत भी गिरवीं पड़े हैं। अब तुम कहीं-कोई नौकरी कर लो, इसी में हमारी भलाई है। परिस्थिति से विवश होकर रामेंद्र ने उपनिरीक्षक पद हेतु प्रतियोगी परीक्षा में भाग लिया, मगर दुर्भाग्य से प्रश्न पत्र लीक हो जाने के कारण वह परीक्षा ही निरस्त कर दी गई। इससे वह भीतर तक टूट गया। वह ही क्यों, उसके पिता राम चरण ने तो अपने इकलौते बेटे के सामने दोनों हाथ खड़े कर के कहा-“बेटा, पिछले चार साल से सारे खेत गिरवीं पड़े हैं। हथा-उधारू ऋ ण भी पचास हजार रुपये से अधिक हो गया है, जिसमें दो रुपया सैकड़ा प्रतिमाह की दर से ब्याज लग रहा है। अब तो रोटी तक के लाले पड़ गए हैं। अब जहां-जैसे भी हो, नौकरी न सही, कहीं कोई और काम-धंधा ही पकड़ लो।उस दिन पिता की विवशता पर उसकी आंखें डबडबा आई थीं और उसका मन अपराध बोध से भर गया था। संयोग से उन्हीं दिनों पुलिस विभाग में सिपाही पद पर नियुक्ति हेतु एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ था और उसने मन मारकर सिपाही के पद हेतु आवेदन पत्र जमा कर दिया था। सिपाही पद हेतु लिखित परीक्षा में उसे पूरे प्रदेश में सर्वाधिक अंक प्राप्त हुए थे। मौखिक परीक्षा में उससे जब एक परीक्षक ने उससे पूछा कि हर परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने और भौतिक विज्ञान की स्नातकोत्तर परीक्षा में स्वर्ण पदक अर्जित करने के बाद सिपाही की नौकरी?

इस प्रश्न का उत्तर उसने बहुत संजीदगी से देते हुए कहा था किउसने आईपीएस की परीक्षा दी थी, किंतु सफलता नहीं मिली। फिर उप निरीक्षक की परीक्षा भी दी, किंतु उसे निरस्त कर दिया गया। यदि यह नौकरी भी उसे मिल जाए, तो मेरी पढ़ाई के लिए मेरे वृद्ध पिता की गिरवीं रखी गई खेती वापस मिल जाएगी और एक गरीब परिवार बिखरने से बच जाएगा।यह सुनकर वहां बैठे सारे परीक्षक द्रवित हो गए थे, उसे सिपाही के पद पर नियुक्ति मिल गई थी।

शाम को जब रामेंद्र अपने घर पहुंचा, तो उसकी भेंट उसकी छोटी बहन शिवानी से हुई। शिवानी उससे आयु में दो वर्ष छोटी थी। बचपन में उन दोनों में खूब झगड़ा और मारपीट होती थी और अब दोनों एक दूसरे को उतना ही अधिक प्यार करते हैं। शिवानी को देखते ही रामेंद्र ने उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया और उसका सिर चूम लिया। शिवानी ने उसे बताया कि वह गांव में अम्मा -बापू के साथ एक सप्ताह रहकर आ रही है। वे दोनों तुमको और बच्चों को बहुत याद कर रहे थे। वे अब बहुत बूढ़े और कमजोर हो गए हैं। यह सुनकर रामेंद्र बोला-“मैं और तुम्हारी भाभी कितनी ही बार उन्हें यहां आकर हमारे साथ रहने को कह चुके हैं, मगर वे लोग यहां रहते ही नहीं। दो बार खुशामद करके उन्हें यहां लाए भी, मगर वे एक महीना भी नहीं रुके और जिद करके वापस लौट गए।” “अरे! तो तुम लोग ही महीने-दो महीने में गांव जाकर उनकी खोज खबर ले आया करो।”- शिवानी ने कहा। फिर कुछ रुक कर बोली- “भइया राधू के साथ बहुत बुरा हुआ। उनके दु:ख से सारा गांव दुखी है।” “अरे! ऐसा क्या हो गया राधू के साथ?”- रामेंद्र ने पूछा उनका लड़का विजय पढ़ने में बहुत तेज था। राधू ने नीट परीक्षा की तैयारी कराने के लिए अपना दो बीघा खेत बेंच दिया था। उसके प्रश्न पत्र बहुत अच्छे हुए थे। परीक्षा देकर शहर से लौटने के बाद वह बहुत खुश था। उसे पूरी आशा थी कि वह इस प्रतियोगी परीक्षा में अवश्य ही सफल हो जाएगा। नीट की परीक्षा निरस्त हो जाने पर वह फूट-फूट कर रोया और फिर शाम को अपने खेत में खड़े महुआ के पेड़ पर फांसी लगाकर जान दे दी।

अगले तीन दिनों में प्रकाशित समाचारों से उसे यह जानकारी मिली कि नीट परीक्षा के निरस्त कर दिए जाने के कारण कुल सात बच्चों ने आत्महत्या कर ली। यह सुनकर उसका खून खौल गया।

 सीबीआई की टीम ने शीघ्र ही उन प्रोफेसरों को दबोच लिया, जो प्रश्न पत्र तैयार करने वाली समिति का हिस्सा थे और स्ट्रांग रूम में प्रश्न पत्र रखने के पूर्व मोबाइल पर प्रश्न पत्र का फोटो खींच कर उसे तीस तीस लाख रुपये में अनेक दलालों को बेचा था। इस प्रकरण में कुल सत्ताइस दलाल भी गिरफ्तार किए गए। रामेंद्र ने पकड़े गए प्रोफेसरों और दलालों को अच्छी तरह से थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट देते हुए अत्यंत क्रोधित स्वर में कहा- “तुम सब सात मासूम बच्चों के हत्यारे और तेईस लाख बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने के अपराधी हो। तुम्हें तो चौराहे पर खड़ा करके गोली मारी दी जानी चाहिए।
काश! ईश्वर ने मुझे तुम दुष्टों को दंड देने की शक्ति प्रदान की होती।यह कहते-कहते रामेंद्र रो पड़ा।

कहानी- डॉ. मृदुल शर्मा वरिष्ठ लेखक

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