Short Story: वफादार कुत्तों का दर्द... सुबह प्यार, शाम को मौत
लखनऊः सुबह अपनी गाड़ी निकालने के लिए जैसे ही शटर को ऊंचा किया, रोजाना की तरह मोहल्ले के चारों कुत्ते शटर की आवाज सुन अपना प्रेम दिखाने मेरे पास आ गए और कूं-उं करते हुए मेरे पैर सूंघने लगे। मैंने भी हमेशा की तरह उन सभी के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और सोचा कि लौटकर उन्हें रोज की तरह रात का बचा हुआ खाना दे दूंगा।
रोज का इनाम यही था, उन निरीह प्राणियों का। इससे ज्यादा वो और कुछ चाह भी नहीं रखते थे। इतने में ही खुश हो जाते थे। मोहल्लेवासियों की जूठन से अपना पेट भरने वाले चारो कुत्ते भले ही आवारा थे, मगर मेरे साथ हमेशा स्नेह दिखाकर अधिकार जताते थे। वे वफादार थे। मेरी एक सीटी की आवाज पर दौड़े चले आते थे और उनकी मौजूदगी में मजाल है किसी चोर उचक्के की जो मोहल्ले में चोरी या लूटपाट की वारदात कर सके। जैसे ही मैंने गाड़ी स्टार्ट की तो, उनमें से एक कुत्ता जो सबसे छोटा था, मेरे करीब आकर पैर चाटने लगा, इस उम्मीद से की शायद अब रोज की तरह कुछ इनाम मिलेगा! सभी से लौटकर आने को बोलकर निकल पड़ा अपनी मंजिल की ओर “बंदीगृह”, जहां मुझे आज कुछ नए अनुभव होने वाले थे। उन लोगों के जीवन में खुशियां देने जाना था, जिन्हें हमारी समाज ने बहिष्कृत कर दिया है, जिनके साथ सभ्य लोग बैठना पसंद नहीं करते, जिन्हें हम कैदी, बंदी या साधारण भाषा में अपराधी कहते हैं।
पिपरिया जेल में योग प्रशिक्षण सप्ताह चल रहा था, जिसमें मैं भी एक सहायक प्रशिक्षक की भूमिका निभा रहा था। आज उन कैदियों के चेहरों पर भी मुस्कान देखने को मिली, जो ऊंची-ऊंची दीवारों में वर्षों से कैद थे और अपने पापों का प्रायश्चित कर अच्छा जीवन व्यतीत करने के सपने संजो रहे थे। पर क्या वास्तव में वो दया के पात्र थे ? शायद नहीं! जिन लोगों ने दूसरों के सपने चूर चूर किए हों, घर उजाड़े हों, कितनों की खुशियां छीनी हों, जिन्होंने न जाने कितनी मां-बहनों की आत्मा दुखायी होगी, वो कैसे दया के पात्र हो सकते हैं।
खैर, जेल के पिछले गेट पर बड़े अक्षरों में लिखा था- नफरत अपराध से करो अपराधी से नहीं! माफ करने वाला हमेशा बड़ा होता है। इसी जुमले के साथ हम आगे बढ़ेंगे तो ज्यादा सार्थक होगा। दो घंटे का प्रशिक्षण सत्र समाप्त करके जेल से लौटा तो देखा घर के बाहर रोड पर एक ट्रैक्टर खड़ा है और भीड़ लगी हुई है। आगे जाकर देखा, तो नगर पालिका के दो सफाईकर्मी उस ट्रैक्टर के नीचे से एक कुत्ते की लाश घसीट कर कचरे की गाड़ी में फेंक रहे थे। मेरी नजरें अभी भी उस मृत कुत्ते के बच्चे की आंखों पर थीं, जो अभी भी मुझे देख रहीं थी और अपने इनाम का इंतजार कर रही थीं।
ये वही पिल्ला था, जो सुबह मुझे लाड़ दिखा रहा था, उसके साथी फिर से मेरे पास आकर मेरे पैर सूंघने लगे थे और अपने साथी के चले जाने का दुःख उन्हीं की भाषा में सुना रहे थे। इतनी भीड़ में सिर्फ मैं ही उनकी भाषा समझ पा रहा था।
- प्रीतम प्रीत चौरसिया, नर्मदापुरम
