“मां, मैं डाइवोर्स लेना चाहती हूं”... बहू के फोन ने मां का दिल तोड़ दिया
बरेलीः बारिश का मौसम कितना अच्छा लगता है, आसमान से गिरती बारिश धरती के साथ-साथ सभी के मन को भी तृप्त कर देती है और खासतौर पर भीषण तपिश के बाद की बारिश। आज उनका मन कितना द्रवित हो रहा था। दिल का भारीपन, मन की घबराहट, दिमाग का गुस्सा, बे-बुनियादी ख्याल, बारिश की बूंदे ने सब कुछ बहा दिया था। अब मन हल्का हुआ, तो कुछ सोचने समझने की चेतना भी वापस आई। जब मन अशांत हो, तो कहां विचार सही आते हैं, तब तो हम सिर्फ वही सोच पाते हैं, जो सोचना चाहते हैं। दूसरे के पहलू को देख ही नहीं पाते। मंदाकिनी जी यही सब सोच रही थी। अभी कुछ देर पहले आई एक फोन कॉल ने उन्हें पूरी तरह से हिलाकर दिया था। उनकी बहू जिया का फोन आया था, वह सुबकते हुए कह रही थी, “मां आपके बेटे नीरव से मैं डाइवोर्स लेना चाहती हूं। मैं अब और नहीं सह सकती हूं।” मंदाकिनी जी यह सुनते ही घबरा गई ओर घबराती हुई बोली, “क्यों..क्यों? ऐसा क्या हुआ?”
पहले तो जिया चुप रही फिर उसने दुखी स्वर में कहा, “नीरव का अफेयर किसी ऑस्ट्रेलियाई महिला से चल रहा है। मुझे तो यह बात शादी के एक हफ्ते बाद ही पता चल गई थी, पर मैंने निभाने की कोशिश की कि शायद नीरव संभल जाए, पर अब तो बात और भी बिगड़ती जा रही है। अब तो नीरव रात दिन उसी के साथ ही रहता है। अब कहीं कोई गुंजाइश नहीं है मां? मेरी जिंदगी बिखर चुकी है, अब तो नीरज से अलग होकर ही मैं शायद इसे फिर से संजो पाऊंगी।”
यह सब सुनते मंदाकिनी जी के तो पैरों तले जमीन ही खिसक गई। अपने बेटे के चरित्र पर उंगली उठती देख, मंदाकिनी जी भड़क उठी। जिया को खरी खोटी सुनाने लगी।
उनका तो दिमाग ही चकरा गया। दिमाग को जैसे झटका सा लगा हो। कितना लाड़ प्यार से नीरव को पाला था। सारे संस्कार कूट-कूट भरे थे, जब उसने आस्ट्रेलिया पढ़ने जाने की जिद की तो उसकी जिद के आगे वह मान गई। अपना अकेलापन भी न देखा।
अभी 4 महीने पहले ही तो इतनी धूमधाम से उन्होंने शादी की थी नीरव की थी।
नीरव ने ऑस्ट्रेलिया से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और फिर वह वही एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करने लगा। जिया भी सुशिक्षित व सुशील लड़की थी। मंदाकिनी जी ने खुद ही रिया को अपने बेटे के लिए पसंद किया था। उन्हें जिया अपने बेटे के लिए पूर्णता परफेक्ट लगी थी। नीरव ने भी शादी के लिए हां कर दी थी। शादी के तुरंत बाद ही दोनों बहू-बेटे ऑस्ट्रेलिया चले गए थे। मंदाकिनी जी भी बेटे की तरफ से निश्चित हो गई थी। पर अब अचानक यह सब, मंदाकिनी जी तनावग्रस्त हो गईं। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या सही है और क्या गलत? इसी बीच उन्होंने नीरव को फोन लगाकर पूछा, नीरज ने बड़ी ही लापरवाही से कह दिया, “हां, मां! लूसी गर्लफ्रेंड है मेरी, जिया ने तो इस बात का बतंगड़ बना दिया, यहां ऑस्ट्रेलिया में तो सभी की गर्लफ्रेंड होती हैं, जिया तो बिल्कुल गवारों जैसी बातें कर रही है।”
मंदाकिनी जी को बेटे की बातें सुनकर धक्का लगा। बेटे ने कब इतनी बड़ी उड़ान ले ली, उन्हें पता ही न चला। सही गलत, संस्कार, धरोहर, रिश्ते, सबको बहुत पीछे छोड़ चुका था नीरव। वह समझ गई थी कि अब बेटे का वापस आना नामुमकिन है। उथल-पुथल व्यथित हृदय से वह अपनी बालकनी में जमी सी रह गई। कब बारिश आकर उन्हें भीगा गई, उन्हें खबर नहीं, पर यही बारिश राह भी दिख गई। उन्हें समझ आ गया कि वह अपने बेटे के स्वार्थ के लिए किसी दूसरे की जिंदगी बर्बाद नहीं कर सकती, उन्होंने तुरंत ही बहू जिया को फोन लगाया और दृढ़ता से कहा, “जिया, मैं तुम्हारे साथ हूं, तुम अपना जीवन अपने हिसाब से जी सकती हो।”
श्रुति सुकुमार, लेखिका
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