EWS Quota : लाखों की फीस भरकर भी EWS कोटे से लिया लाभ, क्या वाकई 'जरूरतमंदों' को मिल रहा लाभ या सिस्टम की कमियों पर सेंधमारी 

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Published By Anjali Singh
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अमृत विचार : संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद अब आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) कोटे को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। परीक्षा में जहां एक ओर बेहद गरीब परिवारों के बच्चों ने सफलता के झंडे गाड़े हैं, वहीं दूसरी ओर इस कोटे के तहत संपन्न पृष्ठभूमि वाले अभ्यर्थियों के चयन पर भी सवाल उठने लगे हैं। 

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पारदर्शिता और नियमों के पुनरीक्षण की मांग

अब सोशल मीडिया पर EWS कोटे की पारदर्शिता को लेकर मांग तेज हो गई है। जानकारों की मानें तो 'सिस्टम के खामियों का फायदा उठाकर आर्थिक रूप से मजबूत लोग इस कोटे में सेंधमारी करेंगे, तो उन गरीब और जरूरतमंद अभ्यर्थियों का हक मारा जाएगा जो वास्तव में इस आरक्षण के हकदार हैं। ऐसे में सरकार और आयोग को EWS प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और सख्त बनाने की आवश्यकता है।

क्यों उठ रहे गंभीर सवाल

बता दें कि विवाद का मुख्य कारण, EWS कोटे से चयनित कई उम्मीदवारों ने देश के उन नामचीन और महंगे निजी कोचिंग सेंटरों से तैयारी की है, जिनकी सालाना फीस लाखों रुपये में होती है। अब सवाल ये है कि जो परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई और कोचिंग के लिए लाखों रुपये खर्च करने में सक्षम है, वह 'आर्थिक रूप से कमजोर' (EWS) की श्रेणी में कैसे आ सकता है?

कुली के बेटे से लेकर IIT-DU के छात्र तक 

सिविल सेवा परीक्षा के नतीजों में EWS कोटे के तहत दो बेहद विपरीत सामाजिक और आर्थिक तस्वीरें देखने को मिली हैं, इस बार के परिणाम में सुरक्षा गार्ड और रेलवे कुली जैसे बेहद सीमित संसाधनों वाले परिवारों के बच्चों ने देश की सबसे कठिन परीक्षा पास कर मिसाल कायम की है। तो वही इसके विपरीत, कोटे का लाभ उठाकर कई ऐसे अभ्यर्थी भी भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS/IPS) के लिए चयनित हुए हैं। इनमें से कई छात्र IIT (आईआईटी), दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों और महंगे निजी स्कूलों से पढ़े हैं।

104 में 67 उम्मीदवारों ने भरी ज्यादा कोचिंग फीस

आंकड़े बताते हैं कि ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत चयनित उम्मीदवारों में से एक बड़ा हिस्सा बेहद महंगे और नामचीन कोचिंग संस्थानों से पढ़कर निकला है, EWS  कोटे से पास हुए कुल 104 उम्मीदवारों में से 67 अभ्यर्थी ऐसे हैं, जिन्होंने दिल्ली और देश के अन्य बड़े शहरों के प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थानों से तैयारी की। इन संस्थानों की सालाना फीस 2.50 लाख से 2.65 लाख रुपये तक है। इन उम्मीदवारों ने 'वाजीराम एंड रवि', 'वाजीराव एंड रेड्डी' और 'दृष्टि IAS' जैसे नामी संस्थानों से पढ़ाई की है। कुल 104 में से 84 उम्मीदवारों ने सिविल सर्विस की फॉर्मल कोचिंग ली थी, जिसमें 'फोरम IAS', 'नेक्स्ट IAS', 'किंगमेकर्स IAS' और 'UPSC वाला' जैसे संस्थान शामिल हैं। इस गिनती में सरकारी या यूनिवर्सिटी द्वारा चलाए जा रहे मुफ्त कोचिंग प्रोग्राम के छात्र शामिल नहीं हैं। 

MNC में नौकरी और 'Upper-middle class' बैकग्राउंड

कई उत्तीर्ण अभ्यर्थी पहले मल्टीनेशनल कंपनियों (MNCs) में काम कर रहे थे। कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी के दौरान इन अभ्यर्थियों की सालाना आमदनी 'अपर मिडिल क्लास' (उच्च मध्यम वर्ग) के स्तर की थी, जो सामान्यत ईडब्ल्यूएस की श्रेणी में नहीं आते।

प्राइवेट स्कूलों से हुई स्कूली शिक्षा

वही 46 उम्मीदवारों ने नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) और विभिन्न राज्यों की राजधानियों (जैसे लखनऊ, रायपुर और जयपुर) के नामचीन और महंगे प्राइवेट स्कूलों से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की है।

क्या है 103वां संविधान संशोधन

देश की आरक्षण नीति में आर्थिक आधार पर बड़ा बदलाव लाने वाला EWS कोटा भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक है। मोदी सरकार द्वारा अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान शुरू की गई इस व्यवस्था ने देश में जातिगत आरक्षण से अलग एक नया आयाम स्थापित किया। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक कानून के सफर और इसके मुख्य प्रावधानों के बारे में।

इस आरक्षण को कानूनी रूप देने के लिए केंद्र सरकार को संविधान के बुनियादी ढांचे में संशोधन करना पड़ा। यह ऐतिहासिक कोटा संसद के 103वें संवैधानिक संशोधन के तहत अस्तित्व में आया।  इसके तहत भारतीय संविधान में दो नए अनुच्छेद 15 (6) और 16 (6) जोड़े गए, ताकि शिक्षा और नौकरियों में इस व्यवस्था को कानूनी सुरक्षा मिल सके।

सिर्फ 7 दिनों में बना कानून

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मोदी कैबिनेट ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए 10 फीसदी आरक्षण कोटे को आधिकारिक मंजूरी दी। इस ऐतिहासिक विधेयक को संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में पेश किया गया और भारी बहुमत से पारित कराया गया। संसद से पास होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून देश भर में प्रभावी रूप से लागू हो गया।

क्या है इस कोटे का मकसद 

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इस कानून का मुख्य उद्देश्य जातिगत पहचान से परे जाकर सामान्य वर्ग के उन गरीब परिवारों को आगे बढ़ाना है, जो आर्थिक तंगी के कारण पिछड़ जाते हैं। इस कोटे का लाभ केवल उन परिवारों को मिलता है जिनकी कुल वार्षिक आय ₹8 लाख से कम होती है। यह देश के इतिहास में मौजूदा 50 फीसदी (SC, ST, OBC) आरक्षण की सीमा से अलग, पूरी तरह से आर्थिक आधार पर उठाया गया पहला बड़ा कदम था।

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