बहुत शुभ होती है वैजयंती की माला
हिंदू देवताओं में वैजयंती के फूल भगवान विष्णु को बहुत पसंद हैं। शंख चक्र, गदा और पद्म के साथ वह गले में वैजयंती फूलों की माला भी पहनते हैं। विष्णु के अवतारों को भी वैजयंती की माला पसंद है। वैजयंती यानी विजय दिलाने वाला पुष्प। किसी ने लिखा है- मोर मुकुट, कटि काछनी, गल वैजयंती माल।। /यो वानक मो मन बस्यो सदा बिहारी लाल।। वैजयंती के सुगंधित फूलों की माला बनती ही इतनी खूबसूरत है कि पहनने वाले के तन से मोहक सुगंध आने लगती है। पुराणों में कथा आती है कि एक बार महर्षि दुर्वासा कहीं जा रहे थे, तो उन्हें रास्ते में देवराज इंद्र आते दिखाई दिए।
महर्षि दुर्वासा ने उन्हें सर्वत्र विजय के लिए वैजयंती फूलों की माला दी। अहंकार बस इंद्र ने वैजयंती माला अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर डाल दी। ऐरावत हाथी ने वह माला अपने पैरों के नीचे कुचल दी। यह देख सुनकर महर्षि दुर्वासा क्रोधित हुए और उन्होंने इंद्र को श्री हीन होने का श्राप दे दिया। बाद में इंद्र को बहुत कष्ट उठाने पड़े और दुर्वासा ऋषि से माफी मांगनी पड़ी। कहते हैं, जो भी वैजयंती फूलों की माला पहनता है, उसके घर लक्ष्मी जी का निवास होता है, उसे हर जगह विजय मिलती है। वैजयंती के फूल लक्ष्मी जी को बहुत पसंद हैं। भगवान कृष्ण भी वैजयंती के फूलों की माला पहनते हैं।
वैजयंती या केना एक बहुवर्षीय पौधा है। इसकी पत्ते केले की भांति चिकने,हरे या ताम्र रंग के या चित्तीदार, पीली धारियों वाले होते हैं। फूल असंगत, विचित्र आकार के चमकीले होते हैं जो देखने में बहुत सुंदर लगते हैं। पुष्प भड़कीले व कई रंग में सामूहिक रूप से खिलते हैं। यह नम स्थानों, झील, तालाब और झरनों के किनारे बहुलता से पाया जाता है। मुख्यतया इसको उद्यानों एवं बागों अर्द्ध-छायादार स्थानों में लगाया जाता है। फूल के बाह्य दल हरे या ताम्र रंग के तथा पंखुड़ियां, बाह्य दल की तरह हरी अथवा रंगीन होती हैं। फूल के रंगीन भाग को स्टॉमिनाडिया कहते हैं, पुंकेसर स्टॉमिनाडिया का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पुष्प का अलंकृत भाग होता है। केना की लगभग 50 जातियां, प्राय: उष्णकटिबंधीय तथा उपोष्ण देशों में पाई जाती हैं, जिनमें वैजयंती प्रमुख है।
इसके कड़े व काले बंदूक की गोली समान बीज के कारण इसे साधारणतया ‘इंडियन शॉट’ कहते हैं। संस्कृत में देवकिली, कृष्णातामारासर्वज्दया, सर्वाजया, काला फूल (बंगाली), देवकली (मराठी), हुदिंगाना (कन्नड़), काल्वालाई, पुवालाई (तमिल), कृष्णातमाय (तेलुगु) तथा काटुवाला मलयालम में कहते हैं। इसका वनस्पतिक नाम केना इंडिका है, जो एक बीजपत्री कुल-केनेसी में आता है। यह एक बहुवर्षीय शाक पात है।
जड़ें प्रकंदीय, 2.5 मी. तक लंबी, तना गोलाकार, मांसल, चिकना, पत्तियां आयताकार, ऊपरी छोर पतला तथा निशिताय: पुष्प-युग्म शीर्षस्थ, छोटा: पुष्य सहपत्र चक्राकार, पुष्प पतला तथा उच्छीर्ण, दल लगभग 4 सेमी. लंबे, ऊपरी स्टॉमिनाडिया, गहरा लाल, लगभग पांच सेमी. लंबा होता है। वर्तमान में वैजयंती की जो जातियां उद्यान, पुष्प-प्रेमियों के मध्य पाई जाती हैं। वह केना इंडिका, केना पलासिड, केना इरिडिफ्लोरा, केना ग्लाउको तथा केना वासीविस्जी के संस्करण से उत्पन्न हुई हैं। संकर प्रजातियों के पुण्य बड़े, विभिन्न आकार एवं रंग के होते हैं।
सामान्यता पुष्प वर्ष भर आते हैं, लेकिन जनवरी से अप्रैल तक अधिक फूल आते हैं। पौध को लगाने के लिए प्रकंद यानी जड़ के टुकड़ों द्वारा जुलाई में रोपण करते हैं। बीज द्वारा रोपण के लिए बीज को गर्म पानी या गोबर की खाद में 3-4 दिनों तक भिगो देते हैं, कड़े छिलके मुलायम हो जाते हैं। उसके बाद चाकू से बीज के ऊपर पतला लंबा चीरा लगाकर मिट्टी में रोपित करने से पौधे अंकुरित हो जाते हैं। वैजयंती के फूलों की सुंदरता दुनियाभर में विख्यात है। सुंदर फूलों के अलावा वैजयंती के पौधे से अनेक लाभ लिए जा सकते हैं। इसके तने के रेशे से सुतली तथा बोरा अथवा थैला बनाया जाता है।
शिवचरण चौहान, लेखक
