जॉब का पहला दिन : जब मिला जीवन का उद्देश्य

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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20 जुलाई 2010, मंगलवार का दिन मेरे जीवन का ऐसा यादगार दिन है, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। इसी दिन मैंने शिक्षा क्षेत्र तारुन, जनपद अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) के प्राथमिक विद्यालय पचगवां में सहायक अध्यापक के रूप में अपनी पहली नियुक्ति ग्रहण की थी। वर्षों की पढ़ाई, संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद नियुक्ति पत्र हाथ में आने पर ऐसा लगा जैसे मेरे सपनों को पंख लग गए हों। विद्यालय के पहले दिन मन में उत्साह के साथ-साथ एक अनजाना भय भी था। ईश्वर का स्मरण करते हुए जब विद्यालय परिसर में प्रवेश किया, तो बच्चों की उत्सुक निगाहें मेरी ओर उठीं। प्रधानाध्यापक और सहकर्मियों ने आत्मीयता से स्वागत किया, जिससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। इसके बाद मैं बच्चों को पढ़ाने के लिए कक्षा में पहुंचा।

उसी दिन की एक घटना आज भी मेरे मन में ताजा है। कक्षा में प्रवेश करते ही एक नन्हा बालक खड़ा हुआ और बोला, “गुरुजी, अब आप रोज पढ़ावै अऊबा न...?” उसके इस सरल प्रश्न में विश्वास, अपनापन और उम्मीद का जो भाव था, उसने मुझे भीतर तक छू लिया। उसी क्षण मुझे महसूस हुआ कि शिक्षक का कार्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि बच्चों के सपनों और उनके भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी भी है। उस दिन विद्यालय से लौटते समय मन में अपार संतोष था।

बच्चों को पढ़ाने, उनके सवालों का जवाब देने और उनके साथ बिताए गए समय ने मुझे यह एहसास कराया कि मुझे जीवन का उद्देश्य मिल गया है। इसके बाद प्रतिदिन विद्यालय जाना, बच्चों को पढ़ाना और उनके साथ सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में शामिल होना मेरे जीवन की सबसे सुखद आदत बन गई।  आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो 20 जुलाई 2010 केवल नौकरी का पहला दिन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण की मेरी यात्रा का पहला महत्वपूर्ण कदम प्रतीत होता है।

शिव शंकर सोनी, सहायक अध्यापक, अयोध्या