जॉब का पहला दिन : आज भी याद है वरिष्ठों का अपनत्व भरा स्वभाव
जीवन में स्मृतियां बहुत बड़ी धरोहर होती है, ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को याद रखने और भूल जाने की शक्ति दी है। अपने इसी याद रखने की शक्ति के अंतर्गत जॉब के पहले दिन की ओर जाता हूं तो मधुर स्मृतियां एक रील की तरह मस्तिष्क पर आ जाती हैं। उहापोह के अनेक प्रश्न थे, साथ ही डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर बनने का एक विशेष उत्साह भी था। कॉलेज में प्रवेश करते ही अभूतपूर्व डिजाइन से बनी बिल्डिंग, घास का मैदान, लान टेनिस खेलने का कोर्ट व पूरा परिवेश आकर्षित कर रहा था।
कॉलेज पहुंचने पर सर्वप्रथम तत्कालीन प्रिंसिपल डॉक्टर चौहान से भेंट हुई, उनकी आत्मीयता देखते ही बनती थी। दो शब्दों में- सरल और सहज। उनका ये स्वभाव अपनी पूरी सेवा में विस्मृत न कर सका, उनका व्यवहार सदैव मन मस्तिष्क पर छाया रहा, उनके निर्देशानुसार अपनी सभी प्रपत्रों को बड़े बाबू को सौंपा, जिन्होंने स्वागत करते हुए ऑफिस के सभी लोगों से परिचय कराया। राजाओं के कॉलेज की अपनी विशिष्ट परंपराएं होती हैं, जो हर तरफ परिलक्षित हो रही थीं।
सभी औपचारिकताएं पूरी करने के पश्चात विभाग में पहुंचने पर केवल विभागाध्यक्ष ही नहीं, बल्कि अन्य सहयोगी साथियों से परिचय और बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। शैक्षिक योग्यता, नगर आगमन तथा विभिन्न रुचियों पर चर्चा हुई, कॉलेज के प्रथम दिन से ही जुड़े अर्थशास्त्र विभाग के डॉक्टर रूहेला व जीव विज्ञान के डॉ. सिंह आज भी मेरी स्मृतियों में है, जिन्हें याद करना आवश्यक हैं। इन वरिष्ठ साथियों ने हर स्तर पर मुझे सहयोग किया। महाविद्यालय की सभी गतिविधियों से परिचित कराते हुए मेरे निवास की व्यवस्था की तथा पारिवारिक अपनत्व प्रदान किया।
दूसरी ओर, पहले दिन विभागाध्यक्ष कुछ कक्षाओं में भी लेकर गए और मेरा विधिवत परिचय कराया। छात्र छात्राओं ने खड़े होकर करतल ध्वनि से स्वागत किया। छात्र-छात्राओं का उत्साह देखते ही बनता था...। जॉब के प्रथम दिन लगा ही नहीं कि परिवार से दूर कॉलेज के एक नए वातावरण में आ गया हूं... महाविद्यालय का अभूतपूर्व इतिहास पद्मश्री डॉ जयदेव सिंह, प्राचार्य के निर्देशन में प्रारंभ हुआ। भारतीय दर्शन व शास्त्रीय संगीत में उनकी विशिष्ट ख्याति थी। उनके द्वारा स्थापित श्रेष्ठ परंपराएं, साथियों का अपनत्व आज भी एक विरासत के रूप में मेरे मस्तिष्क पर विद्यमान है।
