श्रद्धालुओं में आस्था का केंद्र मुक्तिनाथ धाम

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Published By Anjali Singh
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नेपाल का मुस्तांग जिला इन दिनों मुख्यतः दो कारणों से सुर्खियों में है। एक, यहां के लंबे और ऊंचे पहाड़ के बड़े हिस्से में यूरेनियम सहित बेशकीमती धातुओं की उपलब्धता और दूसरे हिंदू और बौद्ध समुदाय के आस्था का केंद्र मुक्तिनाथ धाम। बेशकीमती धातुओं की उपलब्धता वाले पहाड़ के हिस्से को हासिल करने में भारत, चीन और अमेरिका में होड़ है, जबकि मुक्तिनाथ धाम में भारत के हजारों श्रद्धालुओं में दर्शन और गंडकी नदी से निकलने वाली पवित्र जलधारा में स्नान कर मोक्ष पाने की जद्दोजहद है। 

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समुद्र तल से मुक्ति नाथ धाम की ऊंचाई चार हजार मीटर के आसपास है। मुक्तिनाथ मंदिर को स्थानीय लोग मोक्ष का द्वार कहते हैं। पहाड़ों पर बारिश तो आम बात है, तपती गर्मी के महीने में भी यहां का पानी बर्फ जैसा है और ठंडी दिसंबर जनवरी जैसी।

पहाड़ों पर जहां कहीं भी हमारे देव स्थल है, जाहिर है वहां के रास्ते दुर्गम और डरावने होते हैं। नेपाल की धरती हिंदू धर्म की दृष्टि से देवधरा है। काठमांडू में स्थित बाबा पशुपतिनाथ का मंदिर सबसे सरल स्थल पर है। जहां पर शरीर को कष्ट दिए बिना आसानी से पहुंचा जा सकता है, जबकि सूपा देउराली हो, मनोकामना मंदिर हो या फिर मुक्तिनाथ मंदिर, यहां पहुंचना एक चैलेंज है, फिर भी श्रद्धालु यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं चूकते। अनुमानतः प्रतिदिन सौ सवा सौ से अधिक भारतीय श्रद्धालु मुक्तिनाथ मंदिर तक पहुंच रहे हैं। वह भी तब, जब यहां कड़ाके की ठंड के साथ आक्सीजन का भी जोखिम रहता है। 
काठमांडू से उतर पश्चिम कोण पर  तिब्बत (चीन) अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित मस्तांग जिला एक स्वतंत्र शाही साम्राज्य था 18 वीं शताब्दी के अंत में यह साम्राज्य नेपाल के अधीन हो गया, लेकिन नेपाल के गोरखा राजाओं ने मस्तांग की स्वायत्तता बरकरार रखने दी मुस्तांग के अंतिम राजा जिग्मे दोरजे पलबर बिस्ता थे। 2008 में नेपाल के राजशाही मुक्त के बाद मुस्तांग की राजशाही आधिकारिक रूप से समाप्त कर दी गई।

मुस्तांग के शिखर पर स्थित कोरला दर्रा वह अंतर्राष्ट्रीय सीमा है, जो नेपाल को चीन (तिब्बत) की सीमा से जोड़ता है। काठमांडू से मुस्तांग की दूरी साढ़े चार सौ किलोमीटर के करीब है। भारतीय श्रद्धालु भारत नेपाल सीमा के किसी भी अधीकृत बार्डर से जा सकते हैं। पोखरा एक ऐसा जंक्शन है, जहां से वाया जोमसोम मुक्तिनाथ मंदिर का रास्ता जाता है। नेपाल के श्रद्धालुओं को भी इसी मार्ग से वहां तक पहुंचना होता है।  उत्तर प्रदेश से लगने वाली नेपाल सीमा से मुक्तिनाथ पंहुचने के लिए सड़क मार्ग से 18 -20 घंटे का समय लगता है। 

जाहिर है सड़क मार्ग से लगातार इतनी लंबी यात्रा दुष्कर है, इसलिए श्रद्धालुओं को पोखरा में एक रात का विश्राम करना ही होता है। आते वक्त भी और जाते वक्त भी। काठमांडू और पोखरा से जोमसोम के लिए डोमेस्टिक फ्लाइटें भी हैं। पोखरा से जोमसोम के लिए टैक्सी और छोटी बसें हमेशा उपलब्ध रहती हैं। पोखरा से जोमसोम तक करीब 12 घंटे का समय लगता है। जोम सोम से रानी पोवा मुक्ति नाथ मंदिर के वेस तक पहुंचने में डेढ़ दो घंटे लगता है। यहां से मंदिर तक एक डेढ़ किलो मीटर पैदल चलना पड़ता है। अमूमन लोग मुक्तिनाथ मंदिर जाने से पहले जोमसोम में भी एक रात का विश्राम करते हैं और यही अच्छा होता है। 

खास बात यह है कि जिस तरह गंगटोक से नाथूला दर्रा तक जाने के लिए विशेष परमिट की आवश्यकता होती है, ठीक उसी तरह जोमसोम से मुक्तिनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए अन्नपूर्णा कंजर्वेशन एरिया प्रोजेक्ट (एसीएपी) परमिट लेना अनिवार्य है। बिना इस परमिट के आगे की यात्रा संभव नहीं होती। यदि आप किसी होटल में ठहरे हैं, तो अधिकांश होटल प्रबंधन नेपाल टूरिज्म बोर्ड के माध्यम से यह परमिट बनवाने में आपकी मदद कर देते हैं। इससे आपका समय भी बचता है और अनावश्यक भागदौड़ से भी राहत मिलती है। वहीं यदि आप अपने निजी वाहन से यात्रा कर रहे हैं, तो यह पूरी प्रक्रिया आपको स्वयं पूरी करनी पड़ती है, जिसमें संबंधित कार्यालयों के चक्कर लगाने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने जैसी औपचारिकताएं शामिल होती हैं। 

मेरा निजी अनुभव कहता है कि यदि आप चार, छह या उससे अधिक लोगों के समूह में यात्रा कर रहे हैं, तो नेपाल की स्थानीय टैक्सी किराए पर लेना अधिक सुविधाजनक और व्यावहारिक विकल्प है। इससे न केवल यात्रा आरामदायक हो जाती है, बल्कि रास्ते में पड़ने वाली पुलिस चौकियों, परमिट जांच और अन्य प्रशासनिक औपचारिकताओं की चिंता भी नहीं रहती। इन सभी प्रक्रियाओं का जिम्मा टैक्सी चालक स्वयं संभाल लेता है।

बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी है खास

मुक्तिनाथ मंदिर हिंदुओं के लिए आस्था का केंद्र है ही, बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी खास है। बौद्ध धर्म गुरुओं के अनुसार तिब्बती बौद्ध धर्म के संस्थापक गुरु रिनपोचे ने 12 वीं सदी में तिब्बत जाते समय यहां ध्यान किया था और यहीं पर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। सुदूर पहाड़ों पर स्थित इस मंदिर की प्राचीनता क्या है, इसका सटीक विवरण किसी को नहीं पता, हां पैगोडा शैली में निर्मित इस मंदिर का निर्माण 1815 वीं इसवी में होने की बात बताई जाती है। स्थानीय पुजारियों के अनुसार मंदिर का निर्माण नेपाल के तत्कालीन राजा राणा बहादुर शाह की पत्नी सुवर्ण प्रभा द्वारा कराया गया है। मंदिर के मुख्य परिसर में 108 गोमुख बने हुए हैं, जिसमें पवित्र गंडकी नदी की जलधाराएं निरंतर झरती रहती हैं। किंवदंती है कि इन जलधाराओं से स्नान कर श्रद्धालुओं के पाप धुलते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। मंदिर के ठीक पीछे एक छोटा मंदिर हैं, जहां से चमत्कारिक रूप से जल का रिसाव और आग की लपटें निकलती है। हिंदू मान्यताओं में इसे ज्वाला देवी कहते हैं। बौद्ध धर्मावलंबी इसे आग जल और पृथ्वी का अद्भुत संगम मानते हैं।

क्या है मुक्तिनाथ मंदिर का महात्म्य 

हिंदू धर्मावलंबियों के अनुसार यहां पर भगवान विष्णु ने जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से मुक्ति पाई थी। इस मंदिर के मुक्तिनाथ नामकरण के पीछे यही वजह बताई जाती है। भागवत पुराण में वर्णित है कि यह स्थान 108 शक्ति पीठों में से एक है। मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सती का मस्तक गिरा था। मंदिर के निकट स्थित काली गंडकी नदी को शालिग्राम का उद्गम स्थल कहा जाता है। शालिग्राम को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है।

- यशोदा श्रीवास्तव लेखक