नानी के घर जाऊंगा, दूध मलाई खाऊंगा

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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“नानी के घर जाऊंगा, दूध मलाई खाऊंगा…” जैसी पंक्तियां सुनते ही न जाने कितने लोगों के मन में एक साथ कई तस्वीरें उभर आती हैं- ननिहाल, गर्मी की छुट्टियां, मोहल्ले की क्रिकेट, छत पर बिछी चारपाई, स्कूल की छुट्टियों की सुबहें और बेफिक्र दिन। ये केवल यादें नहीं हैं। ये उस सामाजिक संसार की झलक हैं, जिसमें परिवार, रिश्ते और रोजमर्रा का जीवन आज की तुलना में कहीं अधिक आत्मीय और सहज महसूस होता था।

सोशल मीडिया पर नजर डालिए। कहीं पुराने स्कूल की तस्वीरें हैं, कहीं बचपन के खेलों की चर्चा, कहीं ननिहाल की यादें और कहीं 90 के दशक को याद करती रील्स। पुराने फोटो एल्बमों से निकली तस्वीरें भी अब बार-बार साझा की जा रही हैं। यह केवल एक चलन नहीं है। इसके पीछे हमारे समय की एक गहरी मनः स्थिति दिखाई देती है। वर्तमान जीवन की जटिलताओं के बीच अतीत अक्सर अधिक सरल, सुरक्षित और अपनापन भरा लगता है।

भारतीय समाज में ननिहाल केवल एक रिश्ते का नाम नहीं रहा है। वह बच्चों के लिए एक अलग दुनिया हुआ करता था। वहां नियम कुछ ढीले होते थे, स्नेह कुछ अधिक और अपेक्षाएं कुछ कम। संयुक्त परिवारों और घनिष्ठ सामाजिक संबंधों वाले दौर में ननिहाल, दादा-दादी का घर, मोहल्ले के दोस्त और छुट्टियों का समय मिलकर बचपन को एक सामूहिक अनुभव बनाते थे। यही वजह है कि कई पीढ़ियों की स्मृतियों में ये स्थान आज भी इतने जीवंत बने हुए हैं, लेकिन बचपन की स्मृतियों का यह आकर्षण केवल व्यक्तिगत नहीं है। 

यह हमारे समाज में हो रहे बदलावों से भी जुड़ा है। जिस जीवन में काम का दबाव लगातार बढ़ रहा हो, समय हमेशा कम पड़ता हो और व्यक्ति की पहचान उसकी उपलब्धियों से तय की जाने लगी हो, वहां लोग स्वाभाविक रूप से उन दिनों को याद करते हैं, जब जीवन अपेक्षाकृत सरल महसूस होता था। अतीत तब केवल याद नहीं रह जाता, वह एक तरह का भावनात्मक सहारा बन जाता है।

आज की पीढ़ी का जीवन पिछली पीढ़ियों से कई मायनों में अलग है। शहरीकरण बढ़ा है, प्रतिस्पर्धा तेज हुई है, शिक्षा और रोजगार से जुड़ी अपेक्षाएं बढ़ी हैं। जीवन के लगभग हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव मौजूद है। अवसर पहले से अधिक हैं, लेकिन उन्हें पाने की दौड़ भी पहले से कहीं अधिक कठिन और थकाऊ हो गई है।

विडंबना यह है कि जिन तकनीकों ने लोगों को चौबीसों घंटे जोड़े रखा है, उन्होंने अकेलेपन की भावना को पूरी तरह समाप्त नहीं किया। हमारे पास पहले से अधिक साधन हैं, लेकिन शायद पहले जितना खाली समय नहीं। बातचीत के तरीके बढ़े हैं, मगर दिल की बातें कम हुई हैं। मोबाइल की स्क्रीन पर दर्जनों लोग मौजूद रहते हैं, लेकिन कई बार मन फिर भी अकेला महसूस करता है। शायद यह भी हमारे समय का एक विरोधाभास है कि यादों को सुरक्षित रखने के साधन पहले कभी इतने अधिक नहीं थे। मोबाइल फोन में हजारों तस्वीरें हैं, क्लाउड में वर्षों का डिजिटल रिकॉर्ड है और हर क्षण को दर्ज कर लेने की सुविधा मौजूद है। फिर भी लोग बार-बार उन दिनों को याद कर रहे हैं, जिनकी बहुत कम तस्वीरें बची हैं। 

लगता है कि स्मृतियों की ताकत उन्हें सहेजने के साधनों से नहीं, उन्हें जीने की गहराई से पैदा होती है। यहीं से बचपन की स्मृतियों का महत्व समझ में आता है। वे केवल बीते हुए समय की याद नहीं हैं, वे उस सहजता की याद हैं, जो आज के जीवन में धीरे-धीरे कम होती दिखाई देती है। शायद लोग बचपन को इसलिए याद नहीं करते कि वह बीत गया है, वे उसे इसलिए याद करते हैं, क्योंकि उसके साथ जीवन का एक ऐसा ढंग भी चला गया, जिसमें हर क्षण का कोई उपयोग साबित करना जरूरी नहीं था।

हालांकि इस भावनात्मक प्रवृत्ति को समझते समय एक सावधानी भी आवश्यक है। उस दौर में भी अपनी सीमाएं, अभाव और परेशानियां थीं। फर्क केवल इतना है कि समय के साथ स्मृति सुखद अनुभवों को अधिक सहेज लेती है और कठिन अनुभवों को धीरे-धीरे पीछे छोड़ देती है। मनुष्य अतीत को वैसा नहीं याद रखता जैसा वह था, वह उसे वैसा याद रखता है जैसा उसे महसूस हुआ था। 

यही कारण है कि बचपन की यादों को केवल भावुकता मान लेना भी सही नहीं होगा। जब बड़ी संख्या में लोग बार-बार अपने पुराने दिनों को याद करने लगें, तो यह वर्तमान जीवन के बारे में भी कुछ बताता है। यह संकेत देता है कि आधुनिक जीवन में सुविधा तो बढ़ी है, लेकिन शायद आत्मीयता, अवकाश और भावनात्मक संतुलन के लिए जगह अपेक्षाकृत कम होती गई है।
सवाल यह नहीं है कि बचपन बेहतर था या वर्तमान। 

सवाल यह है कि क्या हमारी जीवनशैली में ऐसे रिश्तों और अनुभवों के लिए पर्याप्त स्थान बचा है, जो बिना किसी स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा या प्रदर्शन के हमें संतोष दे सकें। क्या हमारे पास ऐसा समय बचा है, जो केवल जीने के लिए हो, न कि किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए? बचपन कभी लौटकर नहीं आता। न ननिहाल वैसा रहता है, न गांव, न वे लोग और न ही हम स्वयं। 

फिर भी उसकी स्मृतियां बार-बार लौटती हैं। शायद इसलिए नहीं कि अतीत वर्तमान से बेहतर था, बल्कि इसलिए कि वे हमें उन चीजों की याद दिलाती हैं, जिनकी जरूरत आज भी उतनी ही है, जितनी कभी थी अपनापन, थोड़ा खाली समय और ऐसे रिश्ते, जिनमें हमें हर समय कुछ साबित न करना पड़े। शायद यही वजह है कि बचपन की यादें पुरानी नहीं पड़तीं। वे समय-समय पर लौटकर हमें यह याद दिलाती रहती हैं कि मनुष्य केवल उपलब्धियों, आय और व्यस्तताओं से नहीं बनता। उसके जीवन का असली अर्थ उन संबंधों और अनुभवों में भी छिपा होता है, जो उसे भीतर से समृद्ध बनाते हैं।

शिवम भारद्वाज