खोज : ऐसे हुआ एलईडी बल्ब का आविष्कार
एलईडी (लाइट एमिटिंग डायोड) बल्ब आज दुनिया में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली ऊर्जा-कुशल प्रकाश तकनीक बन चुके हैं। इसका विकास कई वैज्ञानिकों के दशकों लंबे शोध का परिणाम है। इसकी शुरुआत वर्ष 1907 में हुई, जब ब्रिटिश वैज्ञानिक हेनरी जोसेफ राउंड ने पाया कि कुछ पदार्थों में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर प्रकाश उत्पन्न होता है। बाद में 1927 में रूसी वैज्ञानिक ओलेग लोसेव ने एलईडी जैसी डिवाइस विकसित की, लेकिन उस समय इसका व्यावहारिक उपयोग संभव नहीं था।
वर्ष 1962 में अमेरिकी इंजीनियर निक होलोन्याक जूनियर ने पहली दृश्य लाल (रेड) एलईडी विकसित की, जिसके बाद इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में संकेतक (इंडिकेटर) के रूप में होने लगा। निक होलोन्याक जूनियर को इसका जनक भी कहा जाता है। हालांकि सामान्य रोशनी के लिए सफेद एलईडी की जरूरत थी। यह सफलता 1990 के दशक में जापानी वैज्ञानिक इसामु आकासाकी, हिरोशी अमानो और शूजी नाकामुरा ने उच्च क्षमता वाली नीली एलईडी विकसित करके हासिल की। नीली एलईडी और फॉस्फर तकनीक के संयोजन से सफेद एलईडी बल्ब बनाना संभव हुआ। इस उपलब्धि के लिए तीनों वैज्ञानिकों को 2014 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। आज एलईडी बल्ब पारंपरिक बल्बों की तुलना में 80–90 प्रतिशत तक बिजली बचाते हैं, कम गर्मी पैदा करते हैं और 25,000 से 50,000 घंटे तक चलते हैं। यही कारण है कि एलईडी तकनीक को ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी आविष्कार माना जाता है।
वैज्ञानिक के बारे में
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अमेरिकी इंजीनियर निक होलोन्याक जूनियर का जन्म 3 नवंबर 1928 को अमेरिका के इलिनॉय राज्य के ज़ीगलर शहर में हुआ था। उनके माता-पिता यूक्रेनी मूल के प्रवासी थे और साधारण परिवार से संबंध रखते थे। बचपन से ही उनकी रुचि विज्ञान और इलेक्ट्रॉनिक्स में थी। उन्होंने University of Illinois Urbana-Champaign से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और प्रसिद्ध वैज्ञानिक जॉन बार्डीन के मार्गदर्शन में शोध किया। निक होलोन्याक ने अपना अधिकांश जीवन शिक्षा, अनुसंधान और नई तकनीकों के विकास को समर्पित किया। वे लंबे समय तक अध्यापन और शोध कार्य से जुड़े रहे। 18 सितंबर 2022 को 93 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनकी सादगी, वैज्ञानिक सोच और नवाचार के प्रति समर्पण आज भी इंजीनियरों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
