अंबुबाची मेला- समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का उत्सव

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Published By Anjali Singh
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उत्तर पूर्व भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक अंबुबाची मेला हर साल असम के गुवाहाटी में स्थित कामाख्या मंदिर में चार दिनों तक चलता है। इस दौरान यहां देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु, तीर्थयात्री, साधु और पर्यटक जुटते हैं। नारी शक्ति और प्रजनन क्षमता के प्रतीक के रूप में मनाया जाने वाला यह मेला, देवी कामाख्या के वार्षिक मासिक धर्म चक्र का उत्सव है।

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देवी कामाख्या को सृजन शक्ति का साक्षात स्वरूप माना जाता है। इस मेले के समय समूचा गुवाहाटी चौतरफा श्रद्धा, भक्ति, आध्यात्म और पूजा के रंग में डूब जाता है। कहीं ढोल-नगाड़ों का शोर तो कहीं मौन साधना। कहीं पूजा और जप तो कहीं तंत्र-मंत्र का कौतूहल। अंबुबाची मेला अपने आध्यात्मिक महत्व के अलावा असम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का उत्सव भी है।

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अंबुबाची मेला कलाकारों, शिल्पकारों और प्रस्तुतिकर्ताओं को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का मंच प्रदान करता है। लोक नृत्य, संगीत कार्यक्रम और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां इस मेले को जीवंत बनाती हैं, जिससे कला और भक्ति का एक अनूठा संगम बनता है। आमतौर पर यह मेला हर साल जून माह के अंतिम सप्ताह में आयोजित होता है।

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मां कामाख्या या कामेश्वरी देवी का मंदिर असम के गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ियों के मध्य में स्थित है। 51 शक्ति पीठों और चार आद्य शक्ति पीठों में से एक, कामाख्या मंदिर इसलिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि देवी सती की योनि यहीं पर गिरी थी। इसी कारण देवी कामाख्या को उर्वरता की देवी या ‘रक्तस्राव की देवी’ भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि मंदिर की अधिष्ठात्री देवी कामाख्या अंबुबाची मेला के दौरान अपने वार्षिक मासिक धर्म चक्र से गुजरती हैं। इसी वजह से मंदिर के द्वार तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि देवी इस दौरान कायाकल्प और दिव्य ऊर्जा की पुनःपूर्ति का अनुभव करती हैं। चौथे दिन मंदिर के द्वार खुलते ही लोगों में खुशी और भक्ति की लहर दौड़ जाती है। भक्त दिव्य आशीर्वाद की कामना करते देवी को फूल, मिठाई और प्रार्थनाएं अर्पित करते हैं। इस दौरान मंदिर में व्याप्त जीवंत ऊर्जा और आध्यात्मिक उत्साह एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जो भौतिक जगत से परे होता है।

प्रसाद में लाल वस्त्र के टुकड़े का महत्व

तीन दिन बाद पट खुलने पर कहा जाता है कि झरने का पानी लाल दिखता है और इसी में भीगे वस्त्र के टुकड़े का प्रसाद प्राप्त होना बहुत सौभाग्य माना जाता है। यह भी मान्यता है कि यह प्रसाद रजस्वला हुई देवी मां का विशेष आशीर्वाद है। यह स्त्री की पवित्रता, शक्ति का प्रतीक के प्रतीक के साथ दर्शाता है कि वह सृष्टि की रचयिता हैं।

शक्तिपीठ का जीर्णोद्धार और सुंदरीकरण

नीलाचल पहाड़ी पर स्थापित कामाख्या मंदिर चार हजार साल से भी अधिक प्राचीन है। अफगान और तुर्क हमलों से यह भी क्षतिग्रस्त हुआ था। 1565 में इसका जीर्णोद्धार किया गया। अब राज्य सरकार इसका और भी सुंदरीकरण कर रही है। यह प्राचीन मंदिर सनातन, आध्यात्मिक ऊर्जा, परंपरा, शक्ति, विश्वास और परंपरा का जीवंत साक्षी है। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु असम में सिर्फ देवी दर्शन को ही आते हैं।

ऐसे पहुंच सकते हैं मंदिर तक

दिल्ली और लखनऊ से सीधे हवाई जहाज से दो घंटे में गुवाहाटी पहुंच सकते हैं। वहां से टैक्सी या बस से डेढ़ घंटे में मंदिर पहुंच जाएंगे। दिल्ली और लखनऊ से ट्रेन की भी सुविधा है, जिससे 24 से 28 घंटे में गुवाहाटी पहुंचकर बस या टैक्सी से डेढ़ घंटे में मंदिर पहुंच सकते हैं। यहां एक हजार से आठ हजार रुपये तक में होटल के कमरे उपलब्ध हैं। धर्मशाला और गेस्ट हाउस में तीन सौ से पांच सौ तक में ठहरने की सुविधा मिल जाती है।

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- शैलेश अवस्थी वरिष्ठ पत्रकार कानपुर