बंधन और माया

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

बंधन क्या है? हम किससे बंधे हैं? या हमें किसने बांध के रखा है? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर शायद एक खोजी के लिए ज्ञान की पराकाष्ठा है, क्योंकि बंधन को समझ लिया या जान लिया, तो समझ लो मोक्ष सामने ही खड़ा है। बंधन क्या है ये समझना बड़ा कठिन है और बिना सतगुरु के तो इसे समझ पाना असंभव ही है, क्योंकि माया इंसान पर इस तरह व्याप्त रहती है कि वह इंसान और सत्य के बीच पर्दा बनकर खड़ी हो जाती है। 

अब प्रश्न ये उठता है कि माया क्या है? तो माया का कोई अस्तित्व नहीं है, बल्कि हमारी सोंच, हमारी कल्पना और हमारा मान ही माया है। माया जो न होते हुए भी हमें अपने जाल में जकड़ लेती है। तात्पर्य यह है कि इंसान अपनी सोच, अपनी कल्पना और अपनी मान में ही स्वयं बंधा रहता है। इंसान अपने सिद्धांत से बंधता है, अपने नियमों से बंधता है, इंसान सांसारिक, सामाजिक, सांप्रदायिक व जातिय नियमों व कर्मों में बंधा रहता है।

ये सब बातें सामान्य इंसान समझ नहीं पाता, क्योंकि वह श्रवण, किर्तन, नाम स्मरण, चरण सेवा, अर्चना, वंदना और निवेदन में ही व्यस्त रहता है और इसे ही अपने जीवन की सार्थकता समझ कर इन्हीं में खोया रहता है। इसलिए एक सामान्य इंसान बंधन क्या है, माया क्या है, मान क्या है? ये समझ ही नहीं पाता या ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि  सामाजिक सांप्रदायिक व जातीय बंधन उसे समझने नहीं देती। सामान्य इंसान सांप्रदायिक कर्मकांडों में इस कदर उलझा रहता है कि उसकी बुद्धि कुंठित हो जाती है, सोच संकुचित हो जाती है, संकीर्ण हो जाता है, जिसके कारण इंसान इस बंधन की ओर सोच ही नहीं पाता। 

इंसान सांप्रदायिक और सामाजिक कर्मों को ही अंतिम मानकर उसे निभाता हुआ अपने को धन्य मान लेता है। इससे आगे कि न तो उसकी सुध जाती और न उसकी सोंच। बंधन को समझने के लिए इन सबसे ऊपर उठना पड़ेगा, सांप्रदायिक कर्मकांडों से अपने को अलग करना पड़ेगा। इंसान अपने विवेक रूपी मथनी को मथकर घी (सत्य की खोज) निकालने के बजाय दूसरों के सोंच रूपी छाछ (वेद शास्त्र ग्रंथ आदि की बातों) को ग्रहण करता रहता है, इसलिए वह घी से दूर हो जाता है।

शिवानंद मिश्रा, आध्यात्मिक लेखक