सेवक नहीं, जनता का स्वामी मान बैठे हैं नौकरशाह
आईएएस अफसरों में जबरदस्त ‘ब्रदरहुड’ देखा जाता है। ‘अति विशिष्ट’ होने की भावना उनमें इतनी प्रबल होती है कि अपने से इतर किसी और सेवा के अधिकारियों को ये पनपने ही नहीं देते।
भारत के पहले उप प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आईएएस को इस्पात का ढांचा (स्टील फ्रेम) कह महिमामंडन किया था। भारतीय संविधान में आईएएस अधिकारियों को अनुच्छेद 311 के अंतर्गत 'कार्यकाल की सुरक्षा' दी गई है। अखिल भारतीय सेवा के इन अफसरों को अनुच्छेद 312 एक स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रशासनिक ढांचा भी प्रदान करता है। आईसीएस (भारतीय सिविल सेवा) के स्थान पर आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) पद बने करीब 80 वर्ष हो चुके हैं। ऐसे में नौकरशाहों की भूमिका, उनकी प्रासंगिकता पर विश्लेषण के साथ-साथ उनके आधिकारिक क्रियाकलापों व समाज में उनके परिणामोन्मुखी योगदान पर दृष्टिपात लाजमी है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सेवारत नौकरशाह अपने को ‘जनता का सेवक न मानते हुए स्वामी’ मान बैठे हैं। कार्य दिवसों में उनका अधिकांश समय तथाकथित बैठकों में व्यतीत होता है। पीड़ित व निरीह जनता से मिलना उन्हें अपनी झूठी शान के खिलाफ लगता है। लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में दो वर्षीय प्रशिक्षण के समय तो उनमें सेवाभाव का जज्बा हिलोरे लेता है, किंतु जब वे वहां से निकलकर फील्ड में सेवा को जाते हैं, तो उनका व्यवहार पूर्णतया परिवर्तित हो जाता है। जनसामान्य का तो मानना है कि जिले व राज्य मुख्यालय में सेवा करने के दौरान उनमें लार्ड कार्नवालिस (सिविल सेवा के जनक) की आत्मा प्रवेश कर जाती है। अपने व्यक्तित्व को अति विशिष्ट मानते हुए वे जनसामान्य से दूरी बनाने लगते हैं।
भारत की एक बड़ी आबादी गांवों में रहती है। अधिकांश ग्रामीण आधारभूत समस्याओं से दो-चार होते रहते हैं, हालांकि बेहतर जीवन स्तर के लिए ग्रामीण युवा शहरों की ओर पलायित हो रहे हैं, जिससे देश में शहरी जनसंख्या में तीव्रतम वृद्धि भी हो रही है। जाहिर है शहरी लोगों की भी अपनी दिक्कतें हैं। बुनियादी सुविधाओं अर्थात पेयजल, सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य व खाद्य-पदार्थ वितरण प्रणाली के लिए उनकी निर्भरता ‘सरकारी सिस्टम’ पर टिक जाती है। सिस्टम यानी मंत्रालय/विभाग/निदेशालय के प्रशासनिक मुखिया नौकरशाह ही होते हैं।
नीति निर्माण के अलावा उसके क्रियान्वयन के लिए वे प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार होते हैं। आजादी के करीब आठ दशक बाद भी जिस देश की अधिकांश आबादी को मूलभूत सुविधाएं मयस्सर न हो सके तो इसके लिए सबसे बड़े दोषी नौकरशाह ही तो माने जाएंगे, क्योंकि प्रशासनिक मशीनरी के वे ही पहरुआ होते हैं। देश में बुनियादी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। लाख टके का प्रश्न यह है कि आखिर कार्यपालिका परिणामोन्मुखी क्यों नहीं हो पा रही है? जनता में अपनी साख क्यों नहीं बना पा रही है? कार्य के प्रति ईमानदार व पारदर्शी क्यों नहीं हो पा रही है? पदलोलूपता, भाई-भतीजावाद, लालफीताशाही, विभागीय गलाकाट प्रतिस्पर्धा व अहम के भाव से क्यों नहीं उबर पा रही है? जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर खरी क्यों नहीं उतर पा रही?
शुरुआती प्रशिक्षण के बाद एक आईएएस अफसर अपनी सेवा के दौरान लाल बहादुर प्रशासनिक संस्थान में पांच चरणों में ‘मध्य करियर प्रशिक्षण कार्यक्रम’ में शामिल होता है। प्रत्येक प्रशिक्षण कार्यक्रम के मूल में जनसेवा ही होती है, लेकिन ऐसे कितने आईएएस अफसर हैं, जो प्रशिक्षणोंपरांत सेवा भाव को आत्मसात कर दीन-दुखियों के चेहरे पर मुस्कान ला पा रहे हैं? सच तो यह है कि नौकरशाही जनता से अलग-थलग होकर काम करने लगी है। नतीजा यह है कि आमजन में न उनकी धाक जम पा रही न ही साख।
लिखना लाजमी है कि नौकरशाहों के मनमाने तबादले व पोस्टिंग अक्सर राजनीतिक वफादारी या इच्छा पर निर्भर करती है। इससे उनका मनोबल तो गिरता ही है, वे निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर पाते। हमारी प्रशासनिक व्यवस्था आज भी ब्रिटिश काल के ढांचे पर ही चल रही है, जिसमें जनकल्याण व समस्या-समाधान की बजाए सत्ता बनाए रखने पर अत्यधिक जोर होता है। वास्तविकता यह भी कि अकुशलता, अत्यधिक केंद्रीकरण व जवाबदेही में कमी के कारण नौकरशाही आमजन की नजर में अब कठघरे में खड़ी दिखने लगी है।
सरल कार्य को भी जटिलतम बना, उसमें अड़चनें पैदा करते रहना कोई आज के नौकरशाहों से सीखे। उनका दंभी स्वभाव आर्थिक प्रगति, सामाजिक न्याय व लोकतांत्रिक सिद्धांत को बुरी तरह प्रभावित करते दिखता है। नौकरशाही की अक्षमताओं के कारण परियोजना निष्पादन में देरी, संसाधनों का गलत आवंटन व प्रशासनिक गुणवत्ता में निरंतर गिरावट देखने को मिल रही है। इसके अलावा, तकनीकी प्रगति व नीति नवाचारों को अपनाने में नौकरशाहों की उदासीनता से शासन संबंधी चुनौतियां बढ़ गई हैं, साथ ही आमजन भी बेहद प्रभावित हो रहा है।
वास्तव में, शासन की रीढ़ माने जाने वाली नौकरशाही ‘बिना रीढ़’ की हो चली है। आज की नौकरशाही के बारे में आमजन की धारणा यह है कि ‘मर्सिडीज कार तो खड़ी है, लेकिन उसका इंजन गायब हो चुका है।’ केंद्र में मंत्रालय हों या राज्यों में विभाग, इन सभी जगहों के शीर्ष पर आईएएस अधिकारी ही कुंडली मारकर बैठे हैं। ‘न खेलूंगा न खेलने दूंगा’ की तर्ज पर वे विशेषज्ञों पर भारी तो पड़ते ही हैं, नीतियों के क्रियान्वयन में भी सबसे बड़े अवरोधभंजक बने रहते हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर देश के अति महत्वपूर्ण गृह, वित्त, रक्षा, विदेश, शिक्षा तथा स्वास्थ्य मंत्रालयों के शीर्ष पद पर भी सचिव के रूप में आईएएस अफसर ही होते हैं। यही हाल राज्यों में विभागों का भी है। आईएएस अफसरों में जबरदस्त ‘ब्रदरहुड’ देखा जाता है। ‘अति विशिष्ट’ होने की भावना उनमें इतनी प्रबल कि अपने से इतर किसी और सेवा के अधिकारियों को ये पनपने ही नहीं देते। संविधान ने उनकी सेवा को स्टील फ्रेम में तो रखा है, लेकिन समय आ गया है कि वे अब अपने को जनता का सेवक मानकर अपनी साख व धाक बचाएं। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में सर्व शक्तिशाली जनता ही होती है।
