गर्भाधान संस्कार की प्रासंगिकता  

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Published By Anjali Singh
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सामान्य अर्थ में संस्कार का अर्थ है निखारना, जिस क्रिया के द्वारा किसी वस्तु के दोष, मैल और अशुद्धि को दूर करके उसमें गुणों का आधान किया जाए, उसे संस्कार कहा जाता है। जैसे सुनार सोने को तपाकर और शुद्ध करके कुंदन बनाता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था की गई है। हमारे ग्रंथों में 16 तथा 48 संस्कारों का उल्लेख मिलता है। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन में शुद्धता, सदाचार और देवत्व का विकास करता है। जिस प्रकार सुंदर चित्र को पूर्णता प्रदान करने के लिए उसमें रंग भरे जाते हैं, उसी प्रकार व्यक्तित्व और चरित्र के समग्र विकास के लिए संस्कार आवश्यक हैं। 

संस्कारों के माध्यम से मनुष्य का आंतरिक परिष्कार होता है और उसका पुनर्जन्म जैसा आध्यात्मिक उत्थान माना जाता है। गर्भ से लेकर मृत्यु तक जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण को संस्कारित करने के लिए हमारे ऋषियों ने विभिन्न संस्कारों की व्यवस्था की है। आज आधुनिक विज्ञान भी भारतीय संस्कार परंपरा के अनेक पक्षों को स्वीकार करने लगा है। कर्णवेध संस्कार के आधार पर विकसित एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर जैसी चिकित्सा पद्धतियां इसका उदाहरण हैं। पूर्वकाल में चूड़ाकरण संस्कार के अंतर्गत शिखा रखने की परंपरा भी शरीर की सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी मानी जाती थी। किंतु पाश्चात्य प्रभाव के कारण संस्कारों के प्रति समाज की आस्था कमजोर हुई है और अनेक संस्कार लुप्तप्राय हो गए हैं।

सोलह संस्कारों में गर्भाधान संस्कार का विशेष महत्व है। दुर्भाग्य से आज यह लगभग विस्मृत हो चुका है। भारतीय संस्कृति में संतानोत्पत्ति को केवल भोग का विषय नहीं, बल्कि एक पवित्र यज्ञ माना गया है। गर्भाधान का उद्देश्य केवल संतान प्राप्ति नहीं, बल्कि श्रेष्ठ, गुणवान और संस्कारित संतति का निर्माण है। इसीलिए शास्त्रों में गर्भाधान के लिए विशेष नियम, संयम और आध्यात्मिक तैयारी का विधान किया गया है। प्राचीन परंपरा के अनुसार पति-पत्नी संतान के स्वरूप और गुणों का विचार करते हुए देवपूजन, जप, तप, संयम और प्रार्थना द्वारा स्वयं को मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से तैयार करते थे। वे अपने भीतर ओज, तेज और पवित्रता का विकास करते हुए शुभ मुहूर्त में गर्भाधान करते थे। यही आध्यात्मिक उपचार संस्कार कहलाता है। इसका उद्देश्य केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक स्तर पर भी श्रेष्ठ संतति का निर्माण करना था।

हमारे यहां विवाह भी एक संस्कार माना गया है। यह केवल दांपत्य जीवन का आरंभ नहीं, बल्कि संयम, उत्तरदायित्व और धर्ममय जीवन का प्रवेश द्वार है। विवाह का उद्देश्य परिवार और समाज के लिए आदर्श संतति का निर्माण भी माना गया है। इसी कारण विवाह और गर्भाधान दोनों में समय, परिस्थिति और मानसिक स्थिति को महत्व दिया गया है।

शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि स्त्री और पुरुष के शरीर तथा मन की स्वस्थता, पवित्रता और प्रसन्नता से ही श्रेष्ठ संतान उत्पन्न होती है। गर्भाधान के समय माता-पिता की मानसिक अवस्था का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। महर्षि चरक ने भी उल्लेख किया है कि गर्भाधान के समय माता-पिता के मन में जो भाव होते हैं, वे बालक के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक बनते हैं। इसलिए उस समय धार्मिक, विद्वान, शूरवीर और सद्गुणी संतानों की कामना करते हुए वैसा ही चिंतन करने की प्रेरणा दी गई है।

शास्त्रों में गर्भाधान के लिए समय और काल का भी विशेष महत्व बताया गया है। ऋ तुकाल, नक्षत्र, तिथि तथा अन्य ज्योतिषीय परिस्थितियों का विचार करके गर्भाधान करने का विधान है। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि दंपति संयमित जीवन जीते हुए संतुलित मनः स्थिति में रहें। शास्त्रों ने दिन के समय गर्भाधान को अनुचित बताया तथा रात्रि के उपयुक्त समय को श्रेष्ठ माना है। गर्भावस्था में माता के आहार, विचार और व्यवहार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह विश्वास रहा है कि गर्भस्थ शिशु पर माता के वातावरण और चिंतन का गहरा प्रभाव पड़ता है। 

भारतीय परंपरा में प्रह्लाद और अभिमन्यु के उदाहरण दिए जाते हैं, जिन्होंने गर्भावस्था में ही श्रेष्ठ संस्कार और ज्ञान प्राप्त किया। इसलिए गर्भवती स्त्री को सत्संग, सद्ग्रंथों का अध्ययन, शुभ चिंतन और सकारात्मक वातावरण में रहने की सलाह दी गई है। संस्कारों का मूल उद्देश्य मनुष्य को संयमित, सदाचारी और आध्यात्मिक बनाना है। आज भोगवादी जीवनशैली और असंयम के कारण अनेक पारंपरिक संस्कार उपेक्षित हो गए हैं। परिणामस्वरूप जीवन में नैतिकता, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों का ह्रास दिखाई देता है। आवश्यकता इस बात की है कि संस्कारों के वास्तविक उद्देश्य को समझा जाए और उन्हें अंधविश्वास नहीं, बल्कि जीवन के परिष्कार की प्रक्रिया के रूप में देखा जाए।

हमारे शास्त्र यह भी बताते हैं कि संतान की श्रेष्ठता संख्या में नहीं, गुणों में होती है। इतिहास में अनेक महान व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अकेले ही समाज और राष्ट्र को नई दिशा दी। भगवान श्रीराम, भीष्म आदि शंकराचार्य तथा प्रह्लाद जैसे महापुरुषों का महत्व उनकी संख्या नहीं, बल्कि उनके गुण, चरित्र और आदर्शों के कारण है। संस्कारों का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को उत्कृष्ट बनाना है। विशेष रूप से गर्भाधान संस्कार का मर्म यही है कि भावी पीढ़ी शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ बने।

आचार्य प्रदीप द्विवेदी आध्यात्मिक लेखक