संपादकीय : जलवायु न्याय का आह्वान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेशेल्स की संसद में कहा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव ग्लोबल साउथ, विशेषकर छोटे द्वीपीय देशों पर पड़ रहा है और जलवायु कार्रवाई का आधार ‘निष्पक्षता, जिम्मेदारी और समता’ होना चाहिए। यह मात्र कूटनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय जलवायु राजनीति के उस मूल विवाद को सामने लाता है, जो तीन दशकों से विकसित और विकासशील देशों के बीच चला आ रहा है। वास्तविकता यह है कि जिन देशों ने औद्योगिक क्रांति के बाद सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित कीं, वे आज अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं; जबकि अफ्रीका, दक्षिण एशिया, प्रशांत और हिंद महासागर के छोटे द्वीपीय देश, जिनका वैश्विक उत्सर्जन में योगदान नगण्य है, यही देश समुद्र-स्तर वृद्धि, चक्रवातों, तटीय कटाव, समुद्री जैव विविधता के विनाश और अनियमित वर्षा जैसी आपदाओं का सबसे अधिक दंश झेल रहे हैं। सेशेल्स, मालदीव और अन्य द्वीपीय देशों के सामने तो अस्तित्व का संकट तक खड़ा हो सकता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने समुद्र तटों, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, मौसम के पैटर्न और स्थानीय समुदायों पर दिखाई दे रहे प्रभावों का विशेष उल्लेख किया।
इस मसले पर ‘निष्पक्षता, जिम्मेदारी और समता’ का अर्थ भी इसी संदर्भ में समझना होगा। निष्पक्षता का आशय है, जलवायु परिवर्तन की कीमत सभी देशों से समान रूप से नहीं वसूली जा सकती है। जिम्मेदारी का अर्थ है कि ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण करने वाले विकसित देशों को उत्सर्जन में अधिक कटौती और वित्तीय सहायता की बड़ी जिम्मेदारी उठानी चाहिए। समता का तात्पर्य यह है कि विकासशील देशों को गरीबी उन्मूलन और विकास का अवसर भी मिले तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकी, जलवायु वित्त और क्षमता निर्माण तक उनकी समान पहुंच सुनिश्चित हो। यही सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय जलवायु विमर्श में ‘साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारी’ की अवधारणा का आधार है। यहीं से ‘जलवायु न्याय’ की अवधारणा जन्म लेती है। इसका अर्थ केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जलवायु संकट का बोझ उन समाजों पर न डाला जाए, जिन्होंने इसे पैदा नहीं किया। तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था होने और जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे भारत की भूमिका जलवायु न्याय के मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद भारत ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, जैव ईंधन, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा-रोधी अवसंरचना जैसे अनेक प्रयासों के माध्यम से नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है। फिर भी भारत के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। उसे ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और रोजगार की जरूरतों के साथ हरित संक्रमण का संतुलन बनाना होगा। कोयले पर निर्भरता धीरे-धीरे कम करनी होगी, लेकिन यह संक्रमण न्यायपूर्ण होना चाहिए, ताकि विकास की गति प्रभावित न हो।
सेशेल्स में दिया गया प्रधानमंत्री का संदेश इसलिए दूरगामी है, क्योंकि उसने जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय, विकास और भू-राजनीति के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया है, हालांकि यह विमर्श तभी सार्थक होगा, जब विकसित देश अपने वित्तीय और तकनीकी वादों को निभाएं तथा विकासशील देश भी हरित विकास को अपनी नीतियों का स्थायी आधार बनाएं। जलवायु न्याय की सबसे बड़ी परीक्षा भाषणों में नहीं, बल्कि संसाधनों, तकनीक और राजनीतिक इच्छाशक्ति के न्यायपूर्ण वितरण में होगी।
