संपादकीय : आस्था के प्रति जवाबदेही
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी और कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रही एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि राम मंदिर में बड़े पैमाने पर चोरी और कमीशनखोरी हुई। इसने देश की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्थाओं में से एक की प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं। चढ़ावे का कोई पूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध न होना सबसे बड़ी चिंता है। कानून और लेखा-परीक्षण की दृष्टि से रिकॉर्ड का अभाव अपराध को और अधिक गंभीर बनाता है। मंदिर केवल एक धार्मिक परिसर नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, इसलिए यहां का मामला सामान्य वित्तीय अनियमितता से कहीं अधिक गंभीर और आस्था के प्रति जवाबदेही का है।
प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार समस्या केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि संस्थागत प्रक्रियाओं में भी खामियां मौजूद हैं, हालांकि अंतिम निष्कर्ष अभी आना शेष है, फिर भी प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि निगरानी और जवाबदेही की मौजूदा व्यवस्था अपेक्षित स्तर की नहीं रही। रिपोर्ट में कुछ तथ्यों को संवेदनशील और गोपनीय बताते हुए सार्वजनिक नहीं किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि जांच आगे वित्तीय लेनदेन, खरीद अनुबंधों, नियुक्तियों, ट्रस्ट से जुड़े प्रभावशाली व्यक्तियों तथा धन के प्रवाह की गहन पड़ताल की दिशा में बढ़ सकती है। ट्रस्ट के पदाधिकारियों, कर्मचारियों अथवा उनसे जुड़े जिन व्यक्तियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाए सरकार को चाहिए कि वह उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई, एफआईआर और आपराधिक मुकदमे से कतई गुरेज न करे, ताकि विश्वास बहाली संभव हो। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार की पहल पर हुआ था।
स्वतंत्र निकाय होने के बावजूद उसकी विश्वसनीयता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना सरकार का नैतिक दायित्व है, इसलिए सरकार यह कहकर पूरी तरह अलग नहीं रह सकती कि मामला केवल ट्रस्ट के अधिकार क्षेत्र का है। जवाबदेही सुनिश्चित करना शासन का भी कर्तव्य है। लखनऊ हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका के आधार पर यदि न्यायालय को वर्तमान जांच अपर्याप्त प्रतीत होती है, तो मामले को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो अथवा किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने की संभावना भी बन सकती है। इसी प्रकार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से व्यापक ऑडिट कराने की मांग भी तर्कसंगत प्रतीत होती है, क्योंकि इससे पिछले वर्षों के वित्तीय प्रबंधन की निष्पक्ष समीक्षा संभव होगी। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब श्रद्धालुओं के विश्वास बहाली का है।
सरकार को पांच वर्षों के चढ़ावे और व्ययों का स्वतंत्र ऑडिट कराना चाहिए, सभी दान की डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था लागू करने, सोना-चांदी के लिए बारकोड आधारित अभिलेखीकरण शुरू करने के अलावा गणना कक्षों में चौबीसों घंटे सीसीटीवी निगरानी और बैंक तक सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था सुनिश्चित करना होगा। नियुक्तियों को पूरी तरह योग्यता आधारित और पारदर्शी बनाने के लिए ट्रस्ट का पुनर्गठन और एक पेशेवर मुख्य कार्यपालक अधिकारी की नियुक्ति भी उचित कदम होगा। करोड़ों लोगों की श्रद्धा के प्रतीक राम मंदिर से संबद्ध इस मामले में लक्ष्य केवल दोषियों को दंडित करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करना होना चाहिए, जिसमें भविष्य में किसी भी श्रद्धालु को यह संदेह न रहे कि उसकी आस्था और उसका अर्पण पूर्णतः सुरक्षित हाथों में नहीं है।
