संपादकीय : इस आग से सबक
लखनऊ के एक व्यावसायिक भवन में हुआ हालिया अग्निकांड शासन-प्रशासन, नियामक संस्थाओं और भवन स्वामियों की सामूहिक विफलता का भयावह दस्तावेज है। जिन 15 लोगों की जान गई, वे केवल आग की लपटों से नहीं मरे, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही, नियमों की अनदेखी और जवाबदेही के अभाव के शिकार बने। राजधानी में ऐसी घटना का होना इस बात का प्रमाण है कि कागजों पर मौजूद सुरक्षा व्यवस्था और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।
प्रारंभिक तथ्यों से स्पष्ट है कि आवासीय को व्यावसायिक बना दिए गए भवन में आपातकालीन निकास नहीं था, धुएं की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी, भूतल में प्लास्टिक और रासायनिक पदार्थों का भंडारण था तथा प्रवेश-निकास का एक ही रास्ता था। मुख्य द्वार का थंब इंप्रेशन आधारित लॉकिंग सिस्टम आग फैलने के बाद बाधा बन गया। आधुनिक तकनीक सुविधा के लिए होती है, लेकिन यदि उसमें आपातकालीन मैनुअल ओवरराइड की व्यवस्था न हो तो वही तकनीक मृत्यु का कारण बन सकती है। देश और विदेश में ऐसी अनेक घटनाओं के बावजूद यदि सुरक्षा मानकों में यह पहलू शामिल नहीं किया गया, तो यह गंभीर नियामकीय कमी है। हर बड़े अग्निकांड के बाद जांच, सर्वेक्षण और अभियान शुरू होना एक सरकारी अनुष्ठान हो चुका है। लगभग हर जांच रिपोर्ट ने एक जैसी कमियां उजागर की हैं— अवैध निर्माण, बंद आपातकालीन निकास, अग्निशमन उपकरणों का अभाव और निरीक्षण तंत्र की निष्क्रियता। प्रश्न यह है कि यदि समस्याएं पहले से ज्ञात हैं, तो कार्रवाई केवल हादसे के बाद ही क्यों होती है? यह वास्तव में आग लगने के बाद कुआं खोदने जैसी प्रवृत्ति है। सरकार द्वारा गठित दो सदस्यीय विशेष जांच दल तथ्यों का संकलन कर जिम्मेदार अधिकारियों और संस्थाओं की पहचान तो करेगा पर उसे कोई ऐसी नई सच्चाई नहीं मिलेगी, जिससे शासन पहले से परिचित न हो। अधिक उपयोगी यह होता कि जांच दल में अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञ, भवन अभियंता, शहरी नियोजन विशेषज्ञ और आपदा प्रबंधन के जानकारों को भी शामिल किया जाता। इससे रिपोर्ट केवल दोष निर्धारण तक सीमित न रहकर भविष्य की नीति सुधार का आधार बन सकती थी।
सरकार ने कहा है कि दोषी को अवश्य सज़ा मिलेगी पर महत्वपूर्ण प्रश्न है कि दोषी कौन हैं? यदि भवन मूलतः आवासीय था और बाद में व्यावसायिक उपयोग में परिवर्तित हुआ, तो उसके नक्शे, अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र, उपयोग परिवर्तन की अनुमति तथा समय-समय पर निरीक्षण की जिम्मेदारी विभिन्न सरकारी एजेंसियों की भी थी। नगर निगम यदि वर्षों से व्यावसायिक कर वसूल रहा था तो क्या उसने सुरक्षा मानकों की जांच की? अग्निशमन विभाग ने अनापत्ति प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी किया या उसका नवीनीकरण किया? विकास प्राधिकरण और स्थानीय प्रशासन ने निरीक्षण क्यों नहीं किए? यह मामला व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही का है। दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि ऐसे मामलों में दंड का रिकॉर्ड बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है। लंबी जांच, कानूनी प्रक्रियाएं और प्रशासनिक संरक्षण अक्सर जवाबदेही को कमजोर कर देते हैं। लखनऊ का यह भीषण अग्निकांड सबक देता है कि अब आवश्यकता भवन सुरक्षा के पूरे ढांचे की पुनर्समीक्षा की है।
