संपादकीय : ट्रस्ट पर ‘ट्रस्ट’ का प्रश्न

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Published By Pradeep Kumar
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राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ही एक सदस्य द्वारा ट्रस्ट के अन्य सहयोगियों पर मुकदमा दर्ज कराने की घटना ने कई गंभीर विधिक, नैतिक और प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रस्ट की इस कारगुजारी का मतलब है कि एसआईटी के बाद उसने भी स्वीकार लिया कि मंदिर में चंदे और दान की बड़ी चोरी हुई है। ट्रस्ट का यह कदम संस्थागत पारदर्शिता और 'सुधार की इच्छा' का प्रतीक दिखाई देता है। लगता है कि ट्रस्ट अपनी छवि को लेकर सतर्क है। दूसरी तरफ, इस आशंका को भी जन्म देता है कि जब मामले को पूरी तरह उजागर होने के बाद छिपाने की गुंजाइश नहीं बची, तब अपनी बची-खुची साख बचाने के लिए इस 'डैमेज कंट्रोल' के जरिए यह छवि सुधारने की कोशिश है। जनता के मन में यह सवाल हो सकता है कि क्या यह कानूनी कदम वाकई दोषियों को सजा दिलाने के लिए है, या फिर चौतरफा घिरने के बाद खुद को कानूनी और नैतिक रूप से सुरक्षित करने का एक प्रयास? 

सबसे चिंताजनक पहलू प्राथमिक अभियुक्तों की सूची है। जिन पर मुकदमा दर्ज कराया गया है, वे दानपात्रों की देखरेख करने, नकदी को बेसमेंट में पहुंचाने और उसकी गिनती करने जैसे जमीनी कार्यों से जुड़े सामान्य कर्मचारी हैं। बेशक, इतने बड़े स्तर पर होने वाली वित्तीय हेराफेरी, सामान्य चोरी या केवल निगरानी की लापरवाही का नतीजा नहीं हो सकती। बिना किसी ऊंचे प्रशासनिक संरक्षण या शीर्ष पदाधिकारियों की कार्य-विफलता के, जमीनी स्तर के कर्मचारी इतने समय तक व्यवस्था को चकमा नहीं दे सकते। केवल निचले स्तर के कर्मियों पर कार्रवाई करना जनमानस में इस धारणा को पुख्ता करता है कि मुख्य साजिशकर्ताओं और 'मास्टरमाइंड' को बचाने के लिए छोटे प्यादों की बलि दी जा रही है। इसके अतिरिक्त, ट्रस्ट पर पहले से ही 11 भूमि सौदों में करोड़ों रुपये के घपले के आरोप हैं, जिनमें सीधे तौर पर बड़े पदाधिकारियों का नाम उछाला गया था। उन मामलों में अब तक किसी ठोस आंतरिक कार्रवाई का न होना इस शंका को और गहरा करता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस पूरे मामले को लेकर बेहद गंभीर रुख अपनाए हुए हैं। वे जानते हैं कि इस परियोजना से न केवल धार्मिक भावनाएं, बल्कि राज्य की प्रशासनिक साख भी गहरायी से जुड़ी है।

इस मामले को तार्किक परिणति तक पहुंचाने के लिए सरकार को चाहिए कि वह अपने बनाए निष्पक्ष जांच दल को बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के पूर्ण स्वतंत्रता दे कर विस्तृत जांच कराए और उसका दायरा केवल 'कैशियर या क्लर्क' तक सीमित न रखे। वह ट्रस्ट के सभी वित्तीय खातों, दान के डिजिटल-भौतिक रिकॉर्ड और विवादित भूमि सौदों का एक स्वतंत्र ऑडिट कराए तथा 'कानून के समक्ष समानता' के सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए ऊंचे रसूख वाले संदिग्धों को भी जांच के दायरे में लाए। मुख्यमंत्री को इस मामले में 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि आस्था के नाम पर सेंधमारी करने वाला कितना भी रसूखदार क्यों न हो, वह कानून के शिकंजे से बच न पाए। जनता की शंकाओं का समाधान केवल निष्पक्ष न्याय से ही संभव है।