संरक्षण हेतु इमारती पत्थर की माइक्रोस्ट्रक्चरल घड़ी

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Published By Anjali Singh
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भवन निर्माण, ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और आधुनिक बहुमंजिला इमारतों में आज मार्बल, सैंडस्टोन, ग्रेनाइट तथा अन्य इमारती पत्थरों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। अधिकांश लोग पत्थर का चयन उसके रंग, चमक और बनावट देखकर करते हैं, जबकि उसकी वास्तविक मजबूती उसके भीतर मौजूद सूक्ष्म संरचना यानी माइक्रोस्ट्रक्चर पर निर्भर करती है। यही अदृश्य बनावट तय करती है कि पत्थर कितने वर्षों तक दबाव, तापमान और मौसम का सामना कर सकेगा। ऊपर से एक जैसे दिखने वाले दो पत्थरों का आंतरिक ढांचा बिल्कुल अलग हो सकता है। लाखों वर्षों तक पृथ्वी के भीतर पड़े दबाव, ताप और विकृति से इनमें रंगीन धारियां, नसें और जटिल पैटर्न बनते हैं। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर खनिज कणों का मुड़ना, टूटना और नए ढंग से व्यवस्थित होना स्पष्ट दिखाई देता है। यही माइक्रोस्ट्रक्चर भूवैज्ञानिकों को पृथ्वी के विकास और चट्टानों के इतिहास को समझने का आधार प्रदान करता है।

नई शोध ने बदली पुरानी धारणा

अब तक यह माना जाता रहा कि चट्टान में जितना अधिक कुल तनाव या स्ट्रेन जमा होगा, उसका माइक्रोस्ट्रक्चर उतना ही अधिक विकसित होगा। किंतु जर्नल ऑफ़ जियोफिजिकल रिसर्च: सॉलिड अर्थ में 15 मई 2000 को प्रकाशित अध्ययन तथा दिसंबर 2024 में प्रकाशित एक अन्य शोध ने इस धारणा को चुनौती दी है। भूवैज्ञानिक जैक किडियाओ और उनके सहयोगियों ने पाया कि केवल कुल स्ट्रेन नहीं, बल्कि स्ट्रेन किस प्रकार और किस दिशा में लगाया गया, इसका प्रभाव कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। किडियाओ के अनुसार माइक्रोस्ट्रक्चर चट्टान के यांत्रिक गुणों को नियंत्रित करता है। चूंकि यह प्रक्रिया पृथ्वी की गहराइयों में घटित होती है, इसलिए प्रयोगशाला में किए गए नियंत्रित प्रयोग ही इसे समझने का माध्यम हैं। वैज्ञानिकों ने छोटी कार के आकार की टॉर्शन एपैरेटस मशीन का उपयोग किया, जो चट्टानों को दबाने, घुमाने और लगभग एक हजार डिग्री सेल्सियस तक गर्म करने में सक्षम है तथा एक सप्ताह से भी कम समय में लाखों वर्षों की भूवैज्ञानिक प्रक्रिया का अनुकरण कर सकती है।

डिफॉर्मेशन का इतिहास भी महत्वपूर्ण

अधिकांश प्रयोगों में चट्टानों को लगातार एक ही दिशा में मोड़ा जाता रहा है, जबकि प्रकृति में ऐसा शायद ही होता है। पृथ्वी पर हिमचादरों का बनना और पिघलना, ज्वारीय बल, टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियां तथा पर्वत निर्माण जैसी प्रक्रियाएं समय-समय पर दबाव की दिशा बदलती रहती हैं। इन्हीं परिस्थितियों की नकल करने के लिए वैज्ञानिकों ने अत्यंत शुद्ध और एकरूप मार्बल के नमूनों को अलग-अलग दिशाओं में बार-बार घुमाकर परीक्षण किया। एंड्रयू क्रॉस के अनुसार यही मानक सामग्री विश्व की अनेक प्रयोगशालाओं में प्रयोग की जाती है, जिससे विभिन्न अध्ययनों की तुलना संभव होती है। परिणामों में पाया गया कि माइक्रोस्ट्रक्चर पर सबसे अधिक प्रभाव उस अधिकतम स्ट्रेन का पड़ा, जो किसी एक दिशा में लगाया गया था। बाद में दिशा बदलने पर पहले से विकसित संरचना आंशिक रूप से रीसेट हो गई। अर्थात चट्टानों में डिफॉर्मेशन केवल जुड़ता नहीं, बल्कि उसकी पूरी इतिहास-श्रृंखला भी भविष्य की संरचना को प्रभावित करती है। इससे स्पष्ट हुआ कि माइक्रोस्ट्रक्चरल घड़ी हर बार पूरी तरह नहीं, बल्कि आंशिक रूप से पुनः आरंभ होती है।

भवन निर्माण और संरक्षण में उपयोगिता

वैज्ञानिकों का मानना है कि इन निष्कर्षों को पृथ्वी के आंतरिक भाग के कंप्यूटर मॉडल तथा बृहस्पति के यूरोपा और शनि के एन्सेलाडस जैसे बर्फीले उपग्रहों के अध्ययन में भी शामिल किया जा सकता है। मंगल, चंद्रमा और क्षुद्रग्रहों से खनिज प्राप्त करने की संभावनाओं के संदर्भ में भी यह शोध उपयोगी सिद्ध हो सकता है। व्यावहारिक दृष्टि से इसका महत्व और अधिक है, क्योंकि भवन निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों की मजबूती और दीर्घायु सीधे उनकी माइक्रोस्ट्रक्चर पर निर्भर करती है। आजकल फैक्ट्री निर्मित स्टोन शीट्स भी इटैलियन मार्बल के नाम पर बड़े पैमाने पर बिक रही हैं, लेकिन उनकी सूक्ष्म संरचना और दबाव सहने की क्षमता की जानकारी प्रायः खरीदारों को नहीं होती। इसलिए बड़े निर्माण कार्यों में वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक हो जाता है।

भारतीय संस्थानों की भूमिका

व्यावसायिक पत्थर उद्योग सामान्य गुणवत्ता नियंत्रण के लिए निजी प्रयोगशालाओं और अपने भूवैज्ञानिकों पर निर्भर रहता है। किंतु विशेष गुणवत्ता वाले पत्थरों की माइक्रोस्ट्रक्चरल तथा पेट्रोलॉजिकल जांच के लिए प्रायः जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) के भूविज्ञान एवं सिविल इंजीनियरिंग विभागों की सहायता ली जाती है। ये संस्थान एक्स-रे डिफ्रैक्शन, स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी तथा पेट्रोग्राफिक विश्लेषण जैसी उन्नत तकनीकों से कणों का आकार, पोरोसिटी, सूक्ष्म दरारें और मौसम के प्रभाव का अध्ययन करते हैं। मकराना मार्बल, विंध्य सैंडस्टोन और विभिन्न ग्रेनाइटों पर ऐसे अध्ययन लगातार किए जाते हैं। राजस्थान के दिलवाड़ा जैन मंदिर, आगरा किला तथा अन्य धरोहरों के संरक्षण में भी यही वैज्ञानिक विश्लेषण आधार बनते हैं। ताजमहल, जसवंत थड़ा, मूसी रानी की छतरी, हैदराबाद के पैगा मकबरे और विक्टोरिया मेमोरियल जैसे ऐतिहासिक भवनों में प्रयुक्त उच्च गुणवत्ता वाले पत्थरों की पहचान कभी शिल्पियों ने अपने अनुभव से की थी। आज यदि इन धरोहरों में मूल पत्थर बदलने की आवश्यकता पड़े, तो उनकी मजबूती, टिकाऊपन और उपयुक्तता का निर्णय वैज्ञानिक माइक्रोस्ट्रक्चरल अध्ययन ही करेगा। यही शोध भविष्य के सुरक्षित, टिकाऊ और दीर्घजीवी निर्माण की सबसे विश्वसनीय आधारशिला भी है।

 

- रणबीर सिंह, विज्ञान लेखक

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