संस्मरण : गुमनाम सिपाही

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Published By Anjali Singh
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“अरे रवि, क्या एसी बंद हो गया है?” लोको पायलट सर ने मेरी तरफ मुड़ते हुए पूछा। मैंने तुरंत पीछे सीट के पीछे लगे एसी की तरफ देखा और कहा, “नहीं सर।” मैं अपनी सीट से उठा। एसी पहले से ही हाई कूलिंग और हाई ब्लोअर मोड पर चल रहा था। रेल इंजनों, खासकर मेमू में लगे एसी में सिर्फ मोड होते हैं, तापमान बढ़ाने और घटाने के लिए कोई रिमोट नहीं होता। डिस्प्ले पर 21°C दिख रहा था, लेकिन फिर भी केबिन में वैसी ठंडक महसूस नहीं हो रही थी।

हुआ यूं कि बीते दिन मेरी ड्यूटी लालकुआं-बरेली सिटी मेमू पैसेंजर में थी। दोपहर तक केबिन ठीक-ठाक ठंडा था, लेकिन लगभग एक बजे लालकुआं से चलने के बाद धूप लगातार तेज होती गई।

करीब दो बजे जब हम बहेड़ी में खड़े थे, बाहर का तापमान लगभग 41°C था। एक तरफ 21°C पर चलता एसी, दूसरी तरफ इंजन की अपनी गर्मी और बाहर की झुलसाती धूप, दोनों की इस जद्दोजहद में हमारे केबिन का तापमान भी करीब 28°C के आसपास ही बना हुआ था।

हमारे सामने वाले फ्रंट ग्लास पर सन प्रोटेक्शन शीट लगी थी, ताकि सीधी धूप अंदर न आए। पीछे एसी चल रहा था, सीट पर तौलिया बिछा था, पीने के लिए रेलवे का थर्मस था और जरूरत पड़े तो बैग में धूप का चश्मा भी रखा था। यानी गर्मी से बचने की लगभग हर सुविधा हमारे पास थी।

थोड़ी देर बाद रास्ते में दूर एक ऑरेंज टी-शर्ट पहने आदमी दिखाई दिया। वह रेलवे का पेट्रोलमैन था। न एसी, न सन प्रोटेक्शन, न कोई ठंडी हवा, बस सिर पर बरसती धूप और पटरियों पर चलते हुए बेतहाशा कदम। उसका काम यह देखना था कि कहीं भीषण गर्मी से रेल पटरी चटक तो नहीं गई, कहीं टेढ़ी तो नहीं हो गई या कोई और ऐसी खराबी तो नहीं, जिससे रेल संचालन प्रभावित हो। कभी कभी मन करता है कि ट्रेन रुके तो पूछ लूं ठंडा पानी है क्या? या मौका मिले तो बोलूं भाई साब दो मिनट ठंडी हवा खा लो फिर देख लेना पटरियां। हम जिस ट्रैक पर निश्चिंत होकर ट्रेन दौड़ाते हैं, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी ऐसे ही लोगों के कंधों पर होती है। जैसे-जैसे रास्ते में एक-एक पेट्रोलमैन मिलता गया, सर की वही बात बार-बार याद आती रही- “देखना, एसी बंद तो नहीं हो गया?”

मन में बस एक ही बात बार-बार आई। हम 28 डिग्री वाले केबिन में बैठकर गर्मी महसूस कर रहे थे और एक भाई 41 डिग्री की धूप में हमारी सुरक्षा के लिए कई किलोमीटर पैदल चल रहा था। सच कहूं, रेलवे के असली हीरो सिर्फ इंजन चलाने वाले नहीं, बल्कि पटरी पर चलने वाले ये गुमनाम सिपाही भी हैं। इनके बिना हमारी कोई भी सुरक्षित यात्रा संभव नहीं।

रवि, लोको पायलट

 

 

 

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