फलों की चमक के पीछे का अंधेरा

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
On

बाजारों में एक जैसे रंग के चमकीले फल आकर्षित करते हैं, लेकिन इनके पीछे छिपी रासायनिक सच्चाई एक गंभीर स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करती है।

cats
जयदेव राठी, एडवोकेट

देश भर के बाजारों में चमचमाते, एक जैसे रंग के चमकीले फल स्वाद या पोषण का संकेत नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे छिपी रासायनिक सच्चाई एक गंभीर स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करती है। आधुनिक खेती में बढ़ते कीटनाशकों का उपयोग और फलों को जल्दी पकाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल्स ने भोजन को ‘धीमे जहर’ में बदल दिया है। चिंता की बात यह है कि इनका असर तुरंत नहीं दिखता, बल्कि धीरे-धीरे शरीर के भीतर ऐसी बीमारियों को जन्म देता है, जो शुरुआत में अदृश्य रहती हैं और बाद में जानलेवा रूप ले लेती हैं।

सबसे पहले बात कीटनाशकों की करें, तो ये रसायन फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन इनके अवशेष सीधे हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य से जुड़े शोध बताते हैं कि फलों और सब्जियों में मौजूद कीटनाशक अवशेष लंबे समय तक शरीर में जमा होकर हार्मोनल असंतुलन, कैंसर और तंत्रिका तंत्र की बीमारियों का कारण बन सकते हैं।

कीटनाशकों का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि ये ‘क्यूम्युलेटिव’ होते हैं— यानी धीरे-धीरे शरीर में जमा होते रहते हैं। शुरुआत में व्यक्ति को केवल थकान, सिरदर्द या हल्की एलर्जी जैसी समस्याएं महसूस होती हैं, लेकिन समय के साथ ये न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर, प्रजनन क्षमता में कमी और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का रूप ले सकते हैं। यही कारण है कि इन्हें ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है। दूसरी ओर, फलों को कृत्रिम रूप से पकाने का चलन तेजी से बढ़ा है। प्राकृतिक रूप से फल पेड़ पर पकते हैं, जहां वे धीरे-धीरे पोषक तत्व विकसित करते हैं, लेकिन बाजार की मांग और मुनाफे की दौड़ ने इस प्रक्रिया को रसायनों के जरिए तेज कर दिया है।

सबसे खतरनाक रसायन कैल्शियम कार्बाइड है, जो पानी के संपर्क में आकर एसिटिलीन गैस छोड़ता है और फल को जल्दी पकाता है, लेकिन यह गैस शरीर के लिए बेहद हानिकारक होती है। इसमें आर्सेनिक और फॉस्फोरस जैसे जहरीले तत्व भी हो सकते हैं, जो मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं और पेट, त्वचा तथा श्वसन तंत्र में गंभीर समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा एथेफोन जैसे रसायन भी इस्तेमाल किए जाते हैं, जो शरीर के लिए विशेष रूप से लीवर पर हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं। शोध बताते हैं कि यह लिवर को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है और लंबे समय तक सेवन से गंभीर रोग उत्पन्न कर सकता है।

हाल ही में भारत में भी इस मुद्दे पर सख्ती बढ़ी है। खाद्य सुरक्षा एजेंसियों ने पाया कि आम, केला और पपीता जैसे फलों में अवैध रूप से केमिकल का उपयोग किया जा रहा है, जिससे स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ रहा है। इसी कारण कैल्शियम कार्बाइड के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है और इसके खिलाफ कार्रवाई भी तेज की गई है, हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि हर कृत्रिम पकाने की प्रक्रिया खतरनाक नहीं होती। उदाहरण के लिए एथिलीन गैस एक प्राकृतिक हार्मोन है, जो नियंत्रित मात्रा में उपयोग करने पर अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब सस्ते और खतरनाक विकल्पों का उपयोग किया जाता है।

इन रसायनों का प्रभाव केवल शारीरिक बीमारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की आने वाली पीढ़ियों पर भी असर डाल रहा है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि कीटनाशक और जहरीले रसायन गर्भ में पल रहे बच्चों के विकास को प्रभावित कर सकते हैं। इससे जन्मजात विकृतियां, मानसिक विकास में कमी और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन बीमारियों का प्रारंभिक चरण लगभग अदृश्य होता है। व्यक्ति सामान्य जीवन जीता रहता है, लेकिन भीतर ही भीतर शरीर कमजोर होता जाता है। वर्षों बाद जब बीमारी सामने आती है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है।

यही कारण है कि कैंसर, किडनी रोग, लीवर फेलियर और हार्मोनल बीमारियों के मामलों में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है। यह केवल चिकित्सा का विषय नहीं है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और नीति का भी बड़ा सवाल बन चुका है। इस स्थिति के लिए केवल किसान या व्यापारी ही जिम्मेदार नहीं हैं। इसके पीछे उपभोक्ताओं की मानसिकता भी एक बड़ी वजह है। हम अक्सर चमकदार, बड़े और जल्दी उपलब्ध होने वाले फलों को प्राथमिकता देते हैं। यही मांग बाजार को मजबूर करती है कि वह प्राकृतिक प्रक्रिया को दरकिनार कर रासायनिक रास्ता अपनाए। समाधान की बात करें तो सबसे पहले जागरूकता जरूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि हर चमकदार फल सुरक्षित नहीं होता। फलों को अच्छी तरह धोना, छीलना और विश्वसनीय स्रोत से खरीदना जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकता है।