संपादकीय : रणनीति से समृद्धि

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Published By Pradeep Kumar
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ऑस्ट्रेलिया दौरे पर हुए समझौते बदलती वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा असुरक्षा, चीन-केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं की चुनौती और प्रौद्योगिकी-प्रधान विश्व व्यवस्था के बीच उभरती नई रणनीतिक साझेदारी के संकेत हैं। दोनों देश मिलकर आने वाले दशक की आर्थिक, सामरिक और तकनीकी चुनौतियों का साझा समाधान विकसित करने के लिए प्रयासरत दिखते हैं। रक्षा, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, साइबर प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और खेल जैसे क्षेत्रों में घोषित पहलें इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा हैं।

मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के इस दौर में ऊर्जा महज आर्थिक विषय नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न है। तेल, गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा आपूर्ति जोखिम का सीधा प्रभाव भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है, ऐसे में भारत-ऑस्ट्रेलिया संयुक्त ऊर्जा सुरक्षा वक्तव्य महत्वपूर्ण है। इसमें केवल कोयला, गैस और तरल ईंधन की स्थिर आपूर्ति का आश्वासन ही नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, ऊर्जा संक्रमण और विश्वसनीय सप्लाई चेन पर भी बल दिया गया है। ऑस्ट्रेलिया पहले से भारत के लिए कोयला, एलएनजी और कुछ पेट्रोलियम उत्पादों का महत्वपूर्ण स्रोत है, यह दृष्टिकोण अल्पकालीन ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालीन ऊर्जा परिवर्तन के बीच संतुलन बनाएगा। दीर्घकालीन ऊर्जा व्यापार और निवेश सहयोग से भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति का विविधीकरण कर सकेगा। इससे किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भरता कम होगी, जो आज की अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में अत्यंत आवश्यक है। प्रस्तावित क्रिटिकल मिनरल्स कॉरिडोर भी महत्वपूर्ण है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण, नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग की रीढ़ लिथियम,  कोबाल्ट,  निकेल और दुर्लभ मृदा तत्व के वैश्विक उत्पादन और प्रसंस्करण पर सीमित देशों का वर्चस्व है।

ऑस्ट्रेलिया के विशाल खनिज भंडार और भारत की विनिर्माण क्षमता का संयोजन दोनों देशों को वैश्विक मूल्य शृंखला में मजबूत स्थान दिलाएंगे। विश्वसनीय डिजिटल अवसंरचना और सुरक्षित डेटा पारिस्थितिकी भविष्य की आर्थिक प्रतिस्पर्धा का आधार बनने जा रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और डिजिटल रेजिलिएंस में संयुक्त अनुसंधान के लिए बना ऑस्ट्रेलिया-भारत साइबर, क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन पार्टनरशिप भारत को केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि विकासकर्ता बनाने की दिशा में सहायक होगा। ऑस्ट्रेलिया विश्व के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में है और अब दीर्घकालीन आपूर्ति व्यवस्था भारत की 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता में व्यापक वृद्धि की योजना को ईंधन उपलब्ध करा सकती है। ऑस्ट्रेलिया के जुड़ने से आपूर्ति स्रोत अधिक सुरक्षित और विविध होंगे। कोकोस द्वीप पर गगनयान मिशन के लिए स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल की स्थापना भारत के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए रणनीतिक उपलब्धि है। हिंद महासागर क्षेत्र में बेहतर ट्रैकिंग और संचार क्षमता मिशन की सुरक्षा और सफलता दोनों बढ़ाएगी। दूसरी ओर खेल सहयोग रोडमैप युवा आदान-प्रदान, खेल विज्ञान, कोचिंग और अवसंरचना के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलेगा।

पर सबसे बड़ी चुनौती इन घोषणाओं को धरातल पर उतारने की है। इसके लिए समयबद्ध कार्ययोजना, निजी निवेश, उद्योग-अनुसंधान संस्थानों की साझेदारी, नियामकीय सरलता, राज्यों की सक्रिय भागीदारी और नियमित प्रगति समीक्षा आवश्यक होगी। कूटनीति की वास्तविक सफलता दस्तावेजों से नहीं, बल्कि उन परियोजनाओं से मापी जाती है, जो उद्योग, रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय सामर्थ्य में स्थायी परिवर्तन लाती हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया के सामने यही अगली और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा है।