संपादकीय : जंग के मुहाने पर
पश्चिम एशिया एक बार फिर जंग के उस मुहाने पर है, जहां एक गलत सैन्य कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को गहरे संकट में गिरा सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम का टूटना तथा उसके बाद अमेरिकी हमलों में ईरान के लगभग 90 सैन्य ठिकानों—मिसाइल भंडार, रडार नेटवर्क और तटीय सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जाना, इस बात का संकेत है कि संघर्ष अब केवल सीमित प्रतिशोध तक नहीं रह गया है। पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध न भी हो पर यह साफ है कि अब सैन्य टकराव पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ जाएगा। इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। यहां अस्थिरता का अर्थ है तेल, गैस, बीमा, शिपिंग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर व्यापक दबाव।
यह घटनाक्रम अमेरिकी कूटनीति की भी कठिन परीक्षा है। यदि युद्धविराम कुछ ही समय में ढह जाए और बातचीत के स्थान पर फिर सैन्य कार्रवाई हावी हो जाए, तो यह स्पष्ट संकेत है कि केवल सैन्य दबाव स्थायी समाधान नहीं दे सकता। कूटनीति की विफलता का मूल्य अंततः पूरी दुनिया चुकाती है। यह केवल अमेरिका और ईरान का संघर्ष नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें युद्ध और कूटनीति के बीच संतुलन लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। यदि पश्चिम एशिया में स्थिरता बहाल नहीं होती, तो इसकी कीमत पूरी दुनिया—और विशेषकर अपनी कच्चे तेल की लगभग 85 प्रतिशत आवश्यकता आयात से पूरी करने वाले भारत को चुकानी पड़ेगी। यदि कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर जाती हैं, तो पेट्रोलियम आयात बिल बढ़ेगा, चालू खाते का घाटा बढ़ेगा, महंगाई पर दबाव आएगा और रुपये पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। ऊर्जा महंगी होने से परिवहन, उर्वरक, बिजली और विनिर्माण लागत भी बढ़ेगी। परिणामस्वरूप भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में शीघ्र राहत देना कठिन हो सकता है। चाबहार बंदरगाह पर हमले की खबरें भी भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाती हैं। यह परियोजना केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक भारत की वैकल्पिक पहुंच का आधार है। यदि वहां अस्थिरता बनी रहती है, तो भारत की दीर्घकालिक क्षेत्रीय संपर्क नीति प्रभावित हो सकती है। विदेश नीति के स्तर पर भी मामला जटिल है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार है, वहीं ईरान ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार और मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण सहयोगी है। ऐसे में भारत द्वारा किसी पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संयम, संवाद और कूटनीति पर जोर देना व्यावहारिक और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है। यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी शक्ति रही है और वर्तमान परिस्थितियों में भी यही सबसे विवेकपूर्ण विकल्प है।
यदि संकट लंबा खिंचता है, तो रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने, आयात स्रोतों का और अधिक विविधीकरण करने, दीर्घकालिक एलएनजी अनुबंधों को मजबूत करने, नवीकरणीय ऊर्जा एवं हरित हाइड्रोजन में निवेश तेज करने तथा भारतीय जहाजरानी और बीमा तंत्र को अतिरिक्त सुरक्षा देने की आवश्यकता होगी। साथ ही रुपये की स्थिरता और महंगाई नियंत्रण के लिए वित्तीय तथा मौद्रिक नीति में समन्वित तैयारी भी उसके लिए अनिवार्य होगी।
