Sonam Wangchuk के आंदोलन के बीच क्यों गूंज रहा है Prof. G.D. Agrawal का नाम? IIT प्रोफेसर से सन्यासी बने ‘गंगापुत्र’ की अनकही दास्तान

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Edited By Muskan Dixit
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डिजिटल डेस्कः राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर 19 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को शनिवार को दिल्ली पुलिस द्वारा जबरन सफदरजंग अस्पताल में सेहत का हवाला देकर भर्ती करा दिया है। लेकिन इन सबके बीच एक नाम काफी चर्चाओं में है। लोग लगातार उनके काम और हौसलों को याद कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं भारत के सबसे सम्मानित पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों में से एक प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) की, जिन्होंने अपनी आस्था और वैज्ञानिक समझ को गंगा की रक्षा में खुद झोंक दिया और 111 दिनों के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार दम तोड़ दिया। जानिए गांगा की रक्षा करने में अपनी जान गवाने वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी....

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जब भी देश में जन-सरोकारों और पर्यावरण को लेकर कोई बड़ा आंदोलन या अनशन सुगबुगाहट है, तो इतिहास के पन्नों से आठ साल पुराना वह जख्म दोबारा ताजा हो जाता है जिसने देश के पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया था। 

एक असाधारण जीवन: जब विज्ञान बना आस्था का सारथी

गुरु दास अग्रवाल केवल एक पारंपरिक आंदोलनकारी नहीं थे। उनका पूरा जीवन अकादमिक उत्कृष्टता और वैज्ञानिक उपलब्धियों से भरा था। 1950 के दशक में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अग्रवाल ने आगे चलकर आईआईटी कानपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर के रूप में दशकों तक सेवाएं दीं। वह देश के 'केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' (CPCB) के पहले सदस्य-सचिव भी रहे।

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एक पर्यावरण इंजीनियर के रूप में वह अच्छी तरह जानते थे कि हिमालयी क्षेत्रों में बनने वाले बड़े बांध, अनियंत्रित खनन और नदियों का डायवर्जन किस तरह गंगा के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को तबाह कर रहे हैं। जब उन्होंने देखा कि केवल सरकारी फाइलें और वैज्ञानिक रिपोर्टें इस पवित्र नदी को नहीं बचा पा रही हैं, तो साल 2011 में उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली और 'स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद' बनकर अपना जीवन पूरी तरह गंगा को समर्पित कर दिया।

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संघर्ष और सफलताओं का सफरनामा

स्वामी सानंद के लिए अनशन कोई नया हथियार नहीं था। उन्होंने गंगा की 'अविरलता' (बिना रुकावट प्राकृतिक बहाव) और 'निर्मलता' (स्वच्छता) के लिए बार-बार अपने शरीर को तपाया:

साल 2008 (उत्तरकाशी): गंगा के प्राकृतिक प्रवाह को बचाने के लिए पहला बड़ा उपवास किया, जिसके बाद सरकार ने मुद्दों की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया।

साल 2009 (दिल्ली): भागीरथी नदी पर बांध परियोजनाओं को रोकने के लिए अनशन पर बैठे। इस आंदोलन के दबाव में तत्कालीन केंद्र सरकार ने 'राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण' (NGRBA) का गठन किया।

साल 2010 (हरिद्वार): लोहारीनाग पाला जैसी विशाल जलविद्युत परियोजनाओं को बंद कराने के लिए कड़ा रुख अपनाया। इस ऐतिहासिक अनशन के परिणामस्वरूप न केवल ये परियोजनाएं रुकीं, बल्कि भागीरथी को देश का पहला 'इको-सेंसिटिव जोन' घोषित किया गया।

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111 दिन का अंतिम अनशन और निधन

22 जून 2018 को हरिद्वार स्थित मातृ सदन आश्रम में उन्होंने गंगा संरक्षण की मांगों को लेकर अंतिम आमरण अनशन शुरू किया। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार की गंगा संरक्षण नीतियों पर सवाल उठाए।

करीब चार महीने तक वे सीमित आहार पर रहे और बाद में जल का भी त्याग कर दिया। स्वास्थ्य बिगड़ने पर 10 अक्टूबर 2018 को प्रशासन ने उन्हें ऋषिकेश एम्स में भर्ती कराया। अगले दिन 11 अक्टूबर 2018 को 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

आज भी अधूरे हैं कई मुद्दे

प्रो. जी.डी. अग्रवाल के निधन के बाद सरकार ने गंगा के न्यूनतम पारिस्थितिक प्रवाह (E-Flow) से जुड़े नियम अधिसूचित किए। हालांकि, गंगा संरक्षण से जुड़ी उनकी कई प्रमुख मांगें, जिनमें व्यापक कानूनी संरक्षण और नदी के प्राकृतिक प्रवाह को लेकर उठाए गए मुद्दे शामिल थे, आज भी चर्चा का विषय बने हुए हैं।

उनका संघर्ष आज भी पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन पर होने वाली बहस का महत्वपूर्ण संदर्भ माना जाता है।

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