मनुष्य की अपराजेय आकृतियां : शाहाबुद्दीन अहमद की चित्रभाषा

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Edited By Anjali Singh
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पिछले दिनों नई दिल्ली स्थित बीकानेर हाउस में बांग्लादेश के वरिष्ठ चित्रकार शाहाबुद्दीन अहमद की एकल प्रदर्शनी देखने का अवसर मिला। इसे नियति का खेल कहें या हमारे समय की विडंबना कि आज हम पश्चिमी कला-जगत से इतने परिचित हैं कि वेनिस बिएनाले जैसी अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं तक की जानकारी नियमित रूप से प्राप्त कर लेते हैं। समाचार माध्यमों, सोशल मीडिया और कलाकार मित्रों के माध्यम से यूरोप और अमेरिका की कला गतिविधियां सहज ही हमारी जानकारी में आ जाती हैं, लेकिन कभी अखंड भारत का हिस्सा रहे पाकिस्तान और बांग्लादेश के कला-जगत तथा वहां के कलाकारों से हमारा सामान्य परिचय भी नहीं बन पाता।

सच कहूं तो शाहाबुद्दीन अहमद का नाम मैंने पहली बार इसी प्रदर्शनी के बहाने सुना और उनकी चित्रकृतियों से भी यह मेरा पहला साक्षात्कार था। किंतु प्रदर्शनी में प्रवेश करते ही यह स्पष्ट हो गया कि मैं किसी ऐसे कलाकार के सामने खड़ा हूं, जिसकी कला केवल रंगों और आकृतियों का संसार नहीं रचती, बल्कि मनुष्य के संघर्ष, उसकी जिजीविषा और उसकी अदम्य ऊर्जा का दृश्य आख्यान प्रस्तुत करती है।

क्यूरेटर ज्योतिर्मय भट्टाचार्य ने शाहाबुद्दीन अहमद का परिचय इन शब्दों में दिया है- “यदि मुझसे शाहाबुद्दीन अहमद का परिचय केवल एक शब्द में देने के लिए कहा जाए, तो मैं केवल इतना ही कहूंगा-‘सच्चे बंगाली’।” अपने इस कथन के समर्थन में वे बंगाल पुनर्जागरण, राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर की ज्ञान-परंपरा का उल्लेख करते हैं। स्पष्ट है कि वे शाहाबुद्दीन की कला को बंगाली सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों की विरासत के संदर्भ में देखते हैं।

हालांकि अगले ही अनुच्छेदों में उनका दृष्टिकोण क्षेत्रीयता की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता है और शाहाबुद्दीन की कला समूची मानवता के संघर्ष की कथा बनकर सामने आती है। मुझे लगता है कि यहीं से इस प्रदर्शनी का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु भी सामने आता है। कलाकार की जड़ें भले ही किसी विशेष भूगोल, भाषा या संस्कृति में हों, किंतु उसकी कला अंततः मनुष्य की साझा नियति से संवाद करती है।

दरअसल यह हमारे कला-जगत की एक विडंबना भी है कि हम प्रायः कलाकारों को भाषा, प्रदेश या राष्ट्रीयता की सीमाओं में बांधकर देखने लगते हैं, जबकि चित्रकला स्वयं में एक सार्वभौमिक भाषा है। मानव सभ्यता के आरंभिक गुफा-चित्रों से लेकर आज की समकालीन कला तक इसकी मूल शब्दावली लगभग वही रही है- रेखा, रंग, रूप और मानवीय अनुभव। यही कारण है कि हजारों वर्ष पुराने भीमबेटका या अल्तामीरा के गुफा-चित्र हों, दुनिया की लोककलाएं हों या समकालीन कला के नवीनतम प्रयोग- वे बिना किसी अनुवाद के भी दर्शक से संवाद स्थापित कर लेते हैं।

प्रदर्शनी में उपलब्ध विवरण से पता चलता है कि युवा अवस्था में शाहाबुद्दीन ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में एक प्लाटून कमांडर के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई थी। बाद में उन्होंने नव-स्वतंत्र बांग्लादेश के ढाका विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय से शिक्षा प्राप्त की और तत्पश्चात पेरिस जाकर एकोल नेशनल सुपीरियर दे बो-आर्ट्स में अध्ययन किया। इस जीवन यात्रा से स्पष्ट है कि एक ओर वे पश्चिमी कला और आधुनिक कला आंदोलनों से भली-भांति परिचित हैं, तो दूसरी ओर अपनी मिट्टी, अपने समाज और अपने इतिहास से उनका रिश्ता कभी विच्छिन्न नहीं हुआ।

कला के इतिहास में बंगाल पुनर्जागरण का महत्व सर्वविदित है। यद्यपि राजनीतिक दृष्टि से बंगाल विभाजित हो चुका था, किंतु सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर पर उसकी एकात्म चेतना लंबे समय तक बनी रही। दूसरी ओर यही भूभाग बंगाल के भीषण अकाल, देश-विभाजन की त्रासदी और अंततः 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम जैसी ऐतिहासिक आपदाओं का भी साक्षी रहा। कभी अकाल ने मनुष्य को निगला, कभी सांप्रदायिक हिंसा ने और कभी युद्ध ने। अर्थात् मानवीय पीड़ा इस भूगोल का स्थायी अनुभव बन गई।

विडंबना यह रही कि जहां एक ओर बंगाल अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक समृद्धि के लिए विश्वभर में प्रतिष्ठित हुआ, वहीं दूसरी ओर वह बार-बार मानवीय त्रासदियों से भी जूझता रहा। इतना ही नहीं, जीवनदायिनी नदियों का प्रदेश होने के बावजूद बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी यहां के जनजीवन का स्थायी हिस्सा बनी रहीं। संभवतः यही कारण है कि जिस समय विश्व कला-जगत अमूर्तन की ओर तेजी से अग्रसर था, उसी समय बांग्लादेश के अनेक कलाकारों ने चित्तप्रसाद, जैनुल आबेदीन और सोमनाथ होड़ जैसी जनपक्षधर परंपरा से अपना संबंध बनाए रखा। परिणामस्वरूप बांग्लादेश की चित्रकला में मनुष्य केवल एक विषय नहीं, बल्कि उसका केंद्रीय चरित्र बना रहा।

वैसे अमूर्त कला को लेकर लंबे समय से बहसें होती रही हैं। कुछ कलाकारों और समीक्षकों ने अमूर्त चित्रों में मानव आकृति की अनुपस्थिति को पूंजीवादी कला-दृष्टि का परिणाम माना, तो दूसरी ओर जे. स्वामीनाथन जैसे कलाकार और कला-चिंतक ने इस धारणा का प्रतिवाद करते हुए कहा था कि जब चित्र बनाने वाला भी मनुष्य है और उसे देखने वाला भी मनुष्य, तब यह कैसे कहा जा सकता है कि कला से मनुष्य को बाहर कर दिया गया है।

शाहाबुद्दीन के चित्रों को देखते हुए यह बहस अप्रासंगिक प्रतीत होती है, क्योंकि उनके यहां मनुष्य अपनी पूरी ऊर्जा, भाव-भंगिमा और संघर्षशीलता के साथ उपस्थित है। यहां तक कि वे चित्र भी, जो पहली दृष्टि में लगभग अमूर्त प्रतीत होते हैं, ध्यान से देखने पर उनमें गतिशील रेखाओं और रंगों के बीच से कोई न कोई आकृति उभर आती है- मानो बिजली की कौंध की तरह क्षणभर के लिए दिखाई देकर फिर उसी ऊर्जा में विलीन हो रही हो।

पहली दृष्टि में शाहाबुद्दीन की चित्रभाषा फ्रांसिस बेकन की याद अवश्य दिला सकती है, किंतु यह प्रभाव भर है, अनुकृति नहीं। कहीं आकृतियों का विरूपण तैयब मेहता की स्मृति जगाता है, तो कहीं उनकी गतिशीलता और रेखाओं का स्वाभाविक प्रवाह मक़बूल फ़िदा हुसैन की याद दिला देता है। कुछ कृतियों में रामकिंकर बैज की मूर्तियों जैसी उफनती हुई गति भी महसूस होती है। लेकिन इन सभी संभावित समानताओं के बावजूद शाहाबुद्दीन की कला अंततः अपनी स्वतंत्र पहचान निर्मित करती है।

दरअसल शाहाबुद्दीन अहमद की चित्रकला को केवल ‘एक्सप्रेशनिज़्म’ की श्रेणी में रख देना उनके सृजन को सीमित कर देना होगा। अधिक उचित होगा यह कहना कि उनकी कला में अभिव्यंजनावादी प्रवृत्तियाँ अत्यंत प्रबल हैं, किन्तु उनका स्रोत यूरोपीय एक्सप्रेशनिज़्म का प्रत्यक्ष अनुकरण नहीं, बल्कि उनका अपना जीवनानुभव है। उनके चित्रों में दौड़ती, संघर्ष करती, छलाँग लगाती और तनाव से भरी आकृतियाँ किसी औपचारिक शैलीगत प्रयोग का परिणाम नहीं, बल्कि जीवन के भीतर से उपजी हुई अनुभूतियाँ हैं। फ्रांस में लंबे समय तक रहने के कारण उनकी चित्रभाषा में यूरोपीय आधुनिकतावाद- विशेषकर शरीर की संरचना, ब्रशवर्क और गति का प्रभाव अवश्य दिखाई देता है, किन्तु उनके चित्रों का वास्तविक नायक मनुष्य ही है- संघर्षरत, गतिशील और अपराजेय।

यही कारण है कि उनके चित्रों में एक साथ फ़्रांसिस बेकन जैसा शारीरिक तनाव, एम. एफ. हुसैन जैसी गति और ऊर्जा तथा रामकिंकर बैज के मूर्तिशिल्पों जैसी जीवंत गतिशीलता दिखाई देती है। फिर भी वे इनमें से किसी की प्रतिछाया नहीं हैं। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि अनेक प्रभावों से संवाद करते हुए भी वे अंततः अपनी स्वतंत्र चित्रभाषा का निर्माण करते हैं। यही विशिष्टता उनके चित्रों को केवल आकर्षक नहीं, बल्कि स्मरणीय भी बनाती है।


-सुमन कुमार सिंह