प्रतिरोध की आवाज और संवाद के सिकुड़ते दायरे

Amrit Vichar Network
Edited By Deepak Mishra
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जब किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति व्यक्त करने वाले नागरिकों का सामना बातचीत से पहले बैरिकेड और हिरासत से होने लगे, तब प्रश्न केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि वह लोकतंत्र की प्रकृति का प्रश्न बन जाता है।

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कुमार कृष्णन,
राजनीतिक टिप्पणीकार

लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता नहीं, संवाद है। जब संवाद की जगह बैरिकेड, पुलिस बल और हिरासत ले लेते हैं, तब सवाल केवल किसी एक आंदोलन या एक राजनीतिक दल का नहीं रह जाता, वह पूरे लोकतांत्रिक चरित्र का प्रश्न बन जाता है। शंभू बॉर्डर से जंतर-मंतर तक और किसान घाट से प्रधानमंत्री आवास तक हाल के घटनाक्रम यही संकेत दे रहे हैं कि क्या भारतीय लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है?

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली परीक्षा तब होती है, जब नागरिक सरकार से सवाल पूछते हैं, जब छात्र सड़कों पर उतरते हैं, किसान अपने भविष्य को लेकर चिंता जताते हैं और विपक्ष जनता के मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगता है। ऐसे समय में यह देखा जाना महत्वपूर्ण होता है कि सत्ता संवाद का रास्ता चुनती है या बैरिकेडों, पुलिस बल और हिरासत का।

पंजाब और हरियाणा के किसान भारत-अमेरिका प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर अपनी आशंकाएं व्यक्त करना चाहते थे। उनका कहना था कि यदि कृषि और डेयरी क्षेत्र को पर्याप्त सुरक्षा दिए बिना मुक्त व्यापार लागू हुआ, तो भारतीय किसानों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है। सरकार का पक्ष था कि व्यापार समझौता देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जाएगी। यह मतभेद लोकतंत्र में स्वाभाविक है।

असली प्रश्न यह नहीं कि कौन सही है और कौन गलत। प्रश्न यह है कि क्या सरकार ने उन लोगों को पर्याप्त विश्वास में लिया, जिनके जीवन पर इस नीति का सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा? लोकतंत्र में नीति की सफलता केवल आर्थिक लाभ से नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति से भी तय होती है।

भारत की कृषि केवल अर्थव्यवस्था का क्षेत्र नहीं है, यह करोड़ों परिवारों के जीवन, संस्कृति और सामाजिक संरचना का आधार है। ऐसे में यदि किसान चिंता व्यक्त करते हैं, तो उनका उत्तर बैरिकेड नहीं, तथ्य और संवाद होना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत पुलिस नहीं, विश्वास होती है, लेकिन यह संकट केवल किसानों तक सीमित नहीं है।

21 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर और उसके आसपास जो घटनाएं सामने आईं, उन्होंने लोकतांत्रिक जवाबदेही पर और गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। छात्र आंदोलन, विपक्ष का प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस कार्रवाई के बीच एक सवाल पूरे देश में गूंजा— आखिर आंदोलन स्थल पर सिविल ड्रेस (सादे कपड़ों) में मौजूद वे लोग कौन थे, जिनकी कोई स्पष्ट पहचान दिखाई नहीं दे रही थी?

लोकतांत्रिक शासन में पुलिस की शक्ति केवल उसके अधिकार से नहीं, बल्कि उसकी पहचान और जवाबदेही से आती है। वर्दी पर लगी नेम प्लेट (नाम-पट्टिका) और बैज (पहचान-चिह्न) नागरिक को यह भरोसा देते हैं कि यदि कोई अधिकारी कानून से बाहर जाकर बल प्रयोग करेगा तो उसकी पहचान संभव होगी और जवाबदेही तय की जा सकेगी, लेकिन यदि बल प्रयोग करने वाले लोग सामान्य कपड़ों में हों और उनकी पहचान स्पष्ट न हो, तो स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न जन्म लेते हैं।

क्या वे दिल्ली पुलिस के अधिकारी थे? क्या वे किसी विशेष यूनिट (इकाई) से जुड़े कर्मचारी थे? क्या वे किसी इंटेलिजेंस एजेंसी (खुफिया एजेंसी) के सदस्य थे? या फिर वे किसी अन्य व्यवस्था के तहत वहां मौजूद थे? इन प्रश्नों का उत्तर किसी राजनीतिक दल को नहीं, बल्कि राज्य को देना चाहिए। सोशल मीडिया पर प्रसारित अनेक वीडियो में कुछ लोग सादे कपड़ों में प्रदर्शनकारियों के बीच दिखाई देते हैं। कुछ वीडियो में उन पर धक्का-मुक्की और पकड़ने के आरोप लगाए गए। यह भी उतना ही सत्य है कि इन वीडियो की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से अभी तक नहीं हुई है, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसी कारण पारदर्शिता और भी अधिक आवश्यक हो जाती है।

यदि वे अधिकृत पुलिसकर्मी थे, तो सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि वे किस इकाई से जुड़े थे और उनकी भूमिका क्या थी। यदि वे पुलिसकर्मी नहीं थे, तो भीड़ नियंत्रण जैसी संवेदनशील कार्रवाई में उनकी मौजूदगी किस आधार पर थी? लोकतंत्र में यह प्रश्न किसी दल का नहीं, कानून के शासन का प्रश्न है। संयुक्त राष्ट्र की कोड ऑफ कंडक्ट (आचार संहिता) तथा बेसिक प्रिंसिपल्स (मूल सिद्धांत) भी बल प्रयोग करने वाले अधिकारियों की पहचान और जवाबदेही पर जोर देते हैं। भारत में भी सर्वोच्च न्यायालय समय-समय पर पुलिस सुधारों और जवाबदेह व्यवस्था की आवश्यकता पर बल देता रहा है।

सादे कपड़ों में पुलिस की तैनाती कई परिस्थितियों में वैध हो सकती है, विशेषकर निगरानी या खुफिया कार्यों के लिए, लेकिन यदि वही अधिकारी प्रत्यक्ष रूप से बल प्रयोग करें, तो उनकी पहचान स्पष्ट होना लोकतांत्रिक अपेक्षा है, क्योंकि राज्य अदृश्य शक्ति नहीं हो सकता। उसकी हर कार्रवाई का एक उत्तरदायी चेहरा होना चाहिए। यही कारण है कि जंतर-मंतर का प्रश्न केवल छात्रों या विपक्ष का प्रश्न नहीं रह जाता। यह उस लोकतांत्रिक संस्कृति का प्रश्न बन जाता है जिसमें नागरिक यह जानना चाहता है कि उसके विरुद्ध बल प्रयोग किसने किया।

यदि किसी प्रदर्शनकारी के साथ मारपीट हुई, यदि किसी को चोट लगी या यदि किसी महिला ने दुर्व्यवहार का आरोप लगाया है, तो इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि आरोप गलत हैं, तो सरकार को तथ्यों के साथ यह स्पष्ट करना चाहिए। यदि आरोप सही हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। यही कानून के शासन की मूल भावना है। दुर्भाग्य यह है कि आज राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना बढ़ गया है कि हर घटना को केवल सत्ता और विपक्ष के चश्मे से देखा जाने लगा है। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है। लोकतंत्र में सरकार की शक्ति आलोचना को दबाने में नहीं, बल्कि आलोचना का उत्तर देने में दिखाई देती है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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