मानसून की भविष्यवाणी करता कानपुर का जगन्नाथ मंदिर
आमतौर पर आस्था और विज्ञान दोनों मानव जीवन के दो छोर माने जाते हैं। ईश्वरीय आस्था भारतवासियों की सबसे बड़ी शक्ति है और देश के विभिन्न चमत्कारी मंदिर हमारी इसी आस्था को पोषित और सुदृढ़ करते हैं। देश का ऐसा ही एक चमत्कारी मंदिर है, जगन्नाथ मंदिर। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के बेहटा बुजुर्ग गांव में स्थित जगन्नाथ मंदिर का हजारों साल पुराना यह पुरातन मंदिर भारतीय पुरातत्व और लोक आस्था का ऐसा अनूठा केंद्र है, जो सदियों से आधुनिक विज्ञान को चुनौती देता आ रहा है। इस तकनीकी युग में भी भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर जल की बूंदों के माध्यम से बारिश की सटीक जानकारी देने के कारण पूरे जिले में 'मानसून मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध है।
मौसम संबंधी गहन ज्ञान का जीवंत प्रमाण
रहस्यों से भरा भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि प्राचीन भारतीय ऋषियों और वास्तुकारों के मौसम संबंधी गहन ज्ञान का जीवंत प्रमाण भी है। मानसून की सटीक भविष्यवाणी करने वाले इस मंदिर के चमत्कारों को देखकर मौसम वैज्ञानिक भी हैरान हैं। मंदिर के वर्तमान पुजारी कुढ़हा प्रसाद शुक्ल के अनुसार मानसून से लगभग एक सप्ताह पहले मंदिर के गुंबद से पानी की बूंदें सीधे भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा पर गिरने लगती हैं। अगर भगवान की प्रतिमा हल्की नमी लिए होती है, तो यह उस वर्ष बारिश कम होने के संकेत होता है।
अगर प्रतिमा पर हल्के जलबिंदु दिखाई देते हैं, तो यह सामान्य बारिश का संकेत होता है। किंतु अगर गुंबद से टपकने वाली जल बूंदों से देव प्रतिमा पूरी भीगी दिखाई दे, तो यह उस वर्ष क्षेत्र में अच्छी बारिश होने का संकेत होता है। बेहटा बुजुर्ग का यह जगन्नाथ मंदिर हमें यह बताता है कि हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक है। यह मंदिर भारत की उस समृद्ध विरासत का प्रतीक है, जहां प्रकृति के रहस्यों को अध्यात्म के साथ जोड़कर लोक कल्याण के लिए उपयोग किया जाता था।
मानसून संबंधी भविष्यवाणियां
जानना दिलचस्प हो कि मौसम विभाग ने भी मंदिर की इन भविष्यवाणियों को सही माना है। इसी वजह से देशभर के कई वैज्ञानिक इस रहस्य जानने के लिए यहां आ चुके हैं। इस मंदिर का दो बार निरीक्षण करने वाले चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के मौसम वैज्ञानिक सुनील पांडेय के अनुसार पत्थर में नमी जमने से बूंदें बन जाती हैं, जिसे श्रद्धालु लोग मानसून का संकेत मानते हैं, लेकिन आज तक यह पता नहीं लगाया जा सका है कि आखिर ये बूंदे सिर्फ इसी मंदिर में क्यों बनती हैं? इसके पीछे का असली कारण क्या है, यह रहस्य आज तक सुलझ नहीं सका है।
कई भू-वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों ने इस रहस्य को सुलझाने का प्रयास किया है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किए गए पत्थरों में ‘हाइग्रोस्कोपिक’ (आर्द्रताग्राही) गुण हो सकते हैं, जो हवा में नमी के स्तर को भांपकर उसे पानी में बदल देते हैं। हालांकि बिना किसी आधुनिक यंत्र के हजारों साल पहले इस तरह की ‘वेदर फोरकास्टिंग’ तकनीक का निर्माण करना आज भी शोध का विषय है।ॉ चमत्कार के साक्षी हैं
गांव के बुजुर्ग
एक तरफ जहां वैज्ञानिक मंदिर के इस रहस्य को अपने नजरिए से समझने में जुटे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीणों के लिए यह सब भगवान की महिमा है। इसी तरह गांव की ही मालती देवी बताती हैं कि भीषण गर्मी के बीच देव प्रतिमा पर जल की बूंदें देखना एक रहस्य जैसा लगता है। वे ही नहीं, उनके पूर्वज भी इन्हीं जल बिंदुओं के आधार पर मानसून का अनुमान लगाया करते थे, जो हमेशा सटीक रहता था। स्थानीय किसान आज भी इस मंदिर की बूंदों को देखकर फसलों की बुआई और कटाई की योजना बनाते हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण है पुराणकालीन मंदिर
करीब चार हजार साल पुराने इस मंदिर का गोलाकार गुंबद, 14 फीट मोटी दीवारें और 12 खंभों पर खड़ा विशाल ढांचा इसे ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाता है। इसकी वास्तुकला सांची के बौद्ध स्तूप से मिलती-जुलती है। हालांकि इसके निर्माण काल को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, लेकिन इसकी शैली इसे मौर्य काल से लेकर गुप्त काल के बीच का बताती है। मंदिर के बाहर भगवान विष्णु के दशावतारों की मूर्तियां उकेरी गई हैं, जो इसकी सनातन जड़ों को दर्शाती हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काले पत्थर से बनी दुर्लभ मूर्तियां विराजमान हैं। इस पौराणिक मंदिर में आज भी अर्द्ध सूर्य चिन्ह मौजूद हैं। प्राचीन समय में सूर्यवंशी राजा माथे पर अर्द्ध सूर्य तिलक धारण करते थे। राम जन्मभूमि मंदिर की खुदाई में भी अर्द्ध सूर्य चिन्ह का मिलना इस मंदिर की पौराणिकता को प्रमाणित करता है। मंदिर परिसर में स्थित राम कुंड तालाब त्रेतायुग का माना जाता है।
किवदंती है कि भगवान श्रीराम ने लंका विजय के बाद यहां आकर अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था। वे बताते हैं कि प्रतिवर्ष जगन्नाथपुरी की तर्ज पर आषाढ़ माह में यहां भी एक भव्य कलश यात्रा निकाली जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में क्षेत्र के श्रद्धालु भाग लेते हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी के.पी. शुक्ल के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 11 वीं सदी में हुआ माना जाता है। कालांतर में मंदिर का जीर्णोद्धार क्षेत्र के एक जमींदार ने कराया था। उनके अनुसार पुरातात्विक उत्खनन में मंदिर परिसर में सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मौर्य काल तक के अवशेष मिले हैं। मंदिर समिति ने प्रदेश सरकार व पुरातत्व विभाग से इनके संरक्षण की मांग की है।
पूनम नेगी, लखनऊ
