तंबूरे की थाप अब भी गूंजती रहेगी

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Published By Anjali Singh
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भारतीय लोककला की दुनिया में कुछ कलाकार केवल अपनी कला के कारण नहीं, बल्कि अपनी साधना और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता के कारण अमर हो जाते हैं। पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई ऐसी ही विलक्षण लोक कलाकार थीं। उनके निधन के साथ भारतीय लोकसंस्कृति ने केवल एक महान गायिका नहीं, बल्कि पंडवानी की उस जीवंत परंपरा की प्रतिनिधि को खो दिया, जिसने महाभारत की कथाओं को गाँव की चौपाल से उठाकर विश्व के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचाया।


संघर्ष से शिखर तक

24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साधना और आत्मविश्वास की मिसाल है। औपचारिक शिक्षा भले ही सीमित रही, लेकिन बचपन में अपने नाना ब्रजलाल से सुनी महाभारत की कथाएं ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी बन गईं। उस समय पंडवानी की वेदमती शैली महिलाओं के लिए स्वीकार्य मानी जाती थी, जबकि अभिनय प्रधान कापालिक शैली लगभग पूरी तरह पुरुषों तक सीमित थी। तीजन बाई ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए कापालिक शैली अपनाई। विरोध, ताने और सामाजिक बहिष्कार जैसी कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने साबित किया कि कला का कोई लिंग नहीं होता।

पंडवानी को विश्व मंच तक पहुंचाया

पंडवानी केवल लोकगायन नहीं, बल्कि संगीत, अभिनय और कथावाचन का अद्भुत संगम है। तीजन बाई ने इसे केवल संरक्षित नहीं किया, बल्कि नई ऊर्जा दी। प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, जापान और ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में पंडवानी का प्रदर्शन किया। भाषा अलग होने के बावजूद विदेशी दर्शक उनकी प्रस्तुति की ऊर्जा और अभिनय से अभिभूत हो जाते थे। उन्होंने सिद्ध किया कि लोककला किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक शक्ति है, जो सीमाएं लांघ सकती है।

सम्मान से बड़ी विरासत

तीजन बाई को पद्मश्री (1987), पद्म भूषण (2003) और पद्म विभूषण (2019) सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान मिले। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और विभिन्न विश्वविद्यालयों की मानद उपाधियों से भी उन्हें सम्मानित किया गया। फिर भी उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने लाखों लोगों को अपनी लोक परंपराओं पर गर्व करना सिखाया। सम्मानों के बावजूद उनका जीवन अत्यंत सादा रहा। वे अपनी जड़ों से कभी नहीं कटीं। उन्होंने दिखाया कि विश्व स्तर पर पहचान पाने के लिए अपनी संस्कृति को छोड़ने की नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है।

अविस्मरणीय मुलाकात

मुझे उनसे मिलने का सौभाग्य भागलपुर में मिला था। वे आकाशवाणी के एक राष्ट्रीय संगीत कार्यक्रम में भाग लेने आई थीं। पहली ही भेंट में उनका सहज, आत्मीय और निश्छल व्यक्तित्व मन को छू गया। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार होने के बावजूद उनमें प्रसिद्धि का कोई अहंकार नहीं था। बातचीत में वे अपने गाँव, बचपन और नाना का बड़े स्नेह से उल्लेख करती रहीं। उनकी बोली में छत्तीसगढ़ की मिट्टी की सोंधी महक थी। जब मंच पर उन्होंने तंबूरा संभाला, तो कुछ ही क्षणों में पूरा सभागार महाभारत के युग में पहुँच गया। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव और कभी द्रौपदी के आत्मसम्मान का प्रतीक। उनकी मुखमुद्राएं, स्वर और अभिनय इतने प्रभावशाली थे कि श्रोता केवल कथा सुनते नहीं, उसे अपने सामने घटित होते हुए अनुभव करते थे।

एक युग का अवसान

5 जुलाई 2026 को रायपुर स्थित एम्स में 70 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम साँस ली। उनके निधन पर पूरे देश ने शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की लोककला को वैश्विक पहचान दिलाई। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी उन्हें भारतीय लोकसंस्कृति की अमूल्य धरोहर बताया। आज जब अनेक लोककलाएं अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं, तब तीजन बाई का जीवन नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने सिद्ध किया कि साधना, मौलिकता और अपनी संस्कृति के प्रति अटूट विश्वास किसी भी कलाकार को अमर बना सकता है। तंबूरा आज भले ही उनके हाथों में न हो, लेकिन उसकी थाप भारतीय संस्कृति की स्मृति में हमेशा गूँजती रहेगी। जब-जब पंडवानी की स्वर-लहरियाँ उठेंगी, जब-जब महाभारत की कथा लोकभाषा में जीवंत होगी, तब-तब तीजन बाई अपनी कला, अपनी साधना और अपनी विरासत के साथ हमारे बीच उपस्थित रहेंगी। यही उनकी सबसे बड़ी अमरता है।


- कुमार कृष्णन