भारतीय कूटनीति की परीक्षा का समय
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने के लिए भारत लगातार प्रयास कर रहा है। भारत अस्थायी सदस्य न बने इसके लिए पाकिस्तान भी लॉबिंग कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने के लिए भारत लगातार प्रयास कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या विदेश मंत्री एस जयशंकर, इसके लिए आम सहमति बनाने में जुटे हुए हैं। इस प्रयास के बीच ही अब भारत को परिषद में 2028-29 के कार्यकाल के लिए अस्थायी सदस्य बनने की खातिर एड़ी-चोटी का जोर लगाना है। भारत अस्थायी सदस्य न बने, इसके लिए पाकिस्तान भी लॉबिंग कर रहा है। अस्थायी सदस्यता के लिए परिषद के दो तिहाई देशों का समर्थन भारत के लिए बहुत ही जरूरी है।
उसके मुकाबले इस सीट के लिए ताजिकिस्तान दावेदार है, हालांकि अस्थायी सदस्यता हासिल करने में जर्मनी की नाकामी भारत के लिए झटका मानी जा रही है, पर भारत के विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि इजरायल का समर्थन करने के कारण जर्मनी भले ही हार गया हो, लेकिन भारत को ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा। हां, उसे मुस्लिम देशों को अपने पाले में रखना होगा। भारत ने इस दिशा में कोशिशें भी शुरू कर दी हैं, ताकि जो पाकिस्तान के मित्र देश हैं, वे भी इस मामले में भारत का समर्थन मजबूती से करें। यह चुनाव हमारी कूटनीति के लिए बड़ी परीक्षा है और स्थायी सदस्यता की दावेदारी के लिए भी अहम है।
परिषद के स्थायी सदस्य अमेरिका, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन चाहते हैं कि भारत को स्थायी सदस्यता मिले, लेकिन चीन इस राह में बड़ा रोड़ा है, हालांकि दुनिया के सबसे बड़े बाजार के रूप में उभरे भारत का समर्थन करना अब चीन की मजबूरी है। चीन पहले यह चाहता था कि अगर भारत को स्थायी सदस्य बनाया जाए, तो पाकिस्तान को भी इस क्लब में जगह मिले, लेकिन अब वह पाकिस्तान का नाम लिए बिना ही भारत का समर्थन करने का संकेत दे रहा है, लेकिन अभी नहीं लगता कि बहुत जल्द भारत, जापान और जर्मनी को स्थायी सदस्यता मिलने जा रही है।
इसमें अभी लंबा वक्त लगेगा, लेकिन इससे पहले अस्थायी सदस्यता हासिल करने के लिए भारत को जूझना है, हालांकि भारतीय थिंकटैंक को यह उम्मीद है कि 2021-22 की तरह ही अगले कार्यकाल के लिए भी उसे भरपूर समर्थन मिलेगा। फिलिस्तीन के मुद्दे पर जर्मनी ने इजरायल का समर्थन किया था। परिणाम स्वरूप कुछ मुस्लिम देशों की नाराजगी उसे झेलनी पड़ी और वह पिछले दिनों हुए चुनाव में हार गया। भारत और इजरायल के रिश्ते बहुत ही मजबूत हैं, लेकिन भारत फिलीस्तीन को भी राष्ट्र के रूप में देखता है और दो राष्ट्र के सिद्धांत का मजबूत समर्थक है।
ऐसे में उसे जर्मनी जैसा विरोध नहीं झेलना पड़ेगा, यह माना जा रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कतर, बहरीन, कुवैत, ओमान का दौरा इसी उदेश्य से किया है। ये देश भारत के समर्थक हैं, हालांकि इस्लामिक सहयोग संगठन में भी शामिल हैं। ताजिकिस्तान इस संगठन का हिस्सा है। संगठन के सदस्य उसकी दावेदारी का मजबूती से समर्थन करते दिख रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर यह संगठन पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आता है। पाकिस्तान भी ताजिकिस्तान के लिए लॉबिंग कर रहा है।
ऐसे में यह बात अहम हो जाता है कि 57 देशों वाले इस संगठन के कितने सदस्य भारत के पक्ष में खड़े होते हैं। हमारी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा देश भारत की अस्थायी सदस्यता का समर्थन करें। विदेश मंत्री एस जयशंकर एक अच्छे विदेश मंत्री के साथ ही बड़े कूटनीतिज्ञ भी हैं, इसलिए यह माना जा रहा है कि वे भारत के समर्थन में ज्यादा से ज्यादा देशों को आसानी से खड़ा कर लेंगे। एशिया-प्रशांत समूह श्रेणी में एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला कड़ा होने की उम्मीद है, हालांकि भारत को ग्लोबल साउथ के देशों, जी फोर के देश जैसे ब्राजील, जापान, जर्मनी आदि का समर्थन मिलना तय है।
यहां रूस के रुख को भी देखना जरूरी है। वैसे रूस हर क्षेत्र में भारत का समर्थन करता है, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह पाकिस्तान के करीब जाता दिख रहा है, जो हमारे लिए चिंता से कम नहीं है। यूक्रेन से युद्ध के कारण रूस सैन्य और आर्थिक रूप से कमजोर हुआ है। इस वक्त वह चीन पर कुछ मामलों में निर्भर हो गया है। ऐसे में लगता है कि कहीं चीन के दबाव में वह ताजिकिस्तान के साथ न खड़ा हो जाए।
भारत ग्लोबल साउथ की बड़ी आवाज है। वह हर मंच पर ग्लोबल साउथ के हितों को उठाता है, ऐसे में ग्लोबल साउथ के देश उसे पूरी मजबूती के साथ समर्थन करेंगे, यह बात तो तय है। 2021-22 के लिए जब 2020 में न्यूयॉर्क में चुनाव हुआ, तब भारत आठवीं बार भारी बहुमत से जीता था। उसे 193 के मुकाबले 184 वोट मिले थे। जो भारत की स्थायी सदस्यता के लिए मजबूत समर्थन भी माना जाता है। ऐसे में यह उम्मीद की जा रही है कि पिछली बार की तरह ही इस बार 184 से ज्यादा वोट मिलेंगे।
एल 69 समूह में शामिल अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरेबियन, एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देश भारत के समर्थन में खुलकर खड़े हैं, क्योंकि भारत उनकी मदद के लिए सदैव आगे रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार विदेश दौरा और एक के बाद एक ऐतिहासिक समझौता यह दर्शाता है कि भारत का समर्थन व्यापक है और अस्थायी सदस्यता के लिए ही नहीं, बल्कि स्थायी सदस्यता के लिए भी जब भी मतदान की आवश्यकता होगी, भारत को भारी बहुमत मिलेगा।
बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य से कई बार लगता है कि कहीं अति आत्मविश्वास में भारत, जर्मनी की तरह ही गच्चा न खा जाए, पर भारत अब ज्यादातर देशों की जरूरत बन गया है। चीन जैसा देश भी हमारे राजनीतिक नेतृत्व की कूटनीति का लोहा मानता है, हालांकि उसकी कोशिश यह रहती है कि वह भारत को नीचा दिखाए पर इसमें वह सफल नहीं हो पाता।
