बढ़ती वैश्विक गर्मी का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

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Published By Deepak Mishra
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धरती का बढ़ता तापमान अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और करोड़ों लोगों की आजीविका को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा वैश्विक जोखिम बन चुका है।

RAJAT
रजत मेहरोत्रा,
वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ

धरती का बढ़ता तापमान अब केवल पर्यावरणविदों की चिंता का विषय नहीं रह गया है। यह आज विश्व अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और करोड़ों लोगों की आजीविका को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा वैश्विक जोखिम बन चुका है। यदि पहले जलवायु परिवर्तन को भविष्य की समस्या माना जाता था, तो अब यह वर्तमान की आर्थिक वास्तविकता है। यूरोप से लेकर भारत तक लगातार टूटते तापमान के रिकॉर्ड यह संकेत दे रहे हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इसकी कीमत केवल पर्यावरण ही नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ेगी।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की State of the Global Climate 2024 रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 मानव इतिहास का सबसे गर्म वर्ष रहा। वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक क्रांति-पूर्व (1850–1900) स्तर की तुलना में 1.55±0.13 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। इसके साथ ही 2015 से 2025 तक का दशक पृथ्वी के इतिहास का सबसे गर्म दशक बन चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि महासागरों में बढ़ती ऊष्मा, रिकॉर्ड स्तर पर ग्रीन हाउस गैसें और लगातार चरम मौसम की घटनाएं इस संकट को और गहरा रही हैं। 

यूरोप इस परिवर्तन का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। यूरोप विश्व का सबसे तेज़ी से गर्म होने वाला महाद्वीप है और वहां तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है। वर्ष 2022 में यूरोप में 61,672 लोगों की गर्मी से संबंधित मौतें दर्ज की गई थीं। इसके बाद 2024 और 2025 में भी रिकॉर्ड हीटवेव, जंगलों की आग, सूखा और बाढ़ ने अरबों यूरो की आर्थिक क्षति पहुंचाई। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि अनुकूलन उपायों में तेजी नहीं लाई गई, तो 2050 तक केवल जलवायु अनुकूलन पर यूरोप को हर वर्ष लगभग 70 अरब यूरो खर्च करने पड़ सकते हैं।

भारत भी इस संकट के केंद्र में खड़ा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग और विभिन्न जलवायु अध्ययनों के अनुसार देश का औसत तापमान पिछले एक शताब्दी में लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। वर्ष 2024 में अप्रैल से जून के बीच भारत के विभिन्न मौसम उपखंडों में कुल 536 हीटवेव दिवस दर्ज किए गए, जो हाल के वर्षों में सबसे अधिक थे। साथ ही, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) के अनुसार भारत के लगभग 57 प्रतिशत जिले, जहां देश की लगभग 76 प्रतिशत आबादी रहती है, उच्च या अत्यधिक ऊष्मा जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं। 

बढ़ती गर्मी का पहला और सबसे गहरा असर कृषि पर पड़ता है। भारत की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। गेहूं, धान, मक्का, दलहन तथा बागबानी फसलों की उत्पादकता अत्यधिक तापमान और नमी की कमी से प्रभावित होती है। गर्मी बढ़ने के कारण सिंचाई की आवश्यकता बढ़ती है, भूजल का दोहन तेज़ होता है और किसानों की लागत में वृद्धि होती है। इसका परिणाम खाद्यान्न उत्पादन में कमी और खाद्य महंगाई के रूप में सामने आता है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो भारत की खाद्य सुरक्षा पर दीर्घकालिक दबाव बढ़ सकता है।

ऊर्जा क्षेत्र भी इस संकट का सबसे बड़ा आर्थिक बोझ उठा रहा है। एयर कंडीशनर, कूलर और अन्य शीतलन उपकरणों की बढ़ती मांग के कारण भारत ने हाल के वर्षों में कई बार 250 गीगावाट से अधिक की रिकॉर्ड बिजली मांग दर्ज की है। बिजली की बढ़ती मांग से उत्पादन लागत, कोयले की खपत और वितरण कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ता है। यदि बिजली अवसंरचना में समय पर निवेश नहीं हुआ, तो भविष्य में बिजली कटौती, ऊंचे टैरिफ और ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियां और गंभीर हो सकती है। गर्मी का सबसे कम चर्चा में रहने वाला, लेकिन सबसे बड़ा आर्थिक प्रभाव श्रम उत्पादकता पर पड़ता है। 

किसान, निर्माण श्रमिक, सड़क विक्रेता, डिलीवरी एजेंट, परिवहन कर्मचारी और अन्य बाहरी कार्य करने वाले करोड़ों लोग सीधे गर्मी का सामना करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक अत्यधिक गर्मी के कारण वैश्विक स्तर पर लगभग 2.2 प्रतिशत कार्य घंटे नष्ट हो सकते हैं, जो लगभग आठ करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर है। भारत उन देशों में शामिल है, जहां श्रम उत्पादकता पर इसका प्रभाव सबसे अधिक पड़ने की आशंका है।

स्वास्थ्य क्षेत्र पर इसका प्रभाव भी अत्यंत गंभीर है। हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय रोग, गुर्दा संबंधी समस्याएं और श्वसन रोगों के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अत्यधिक गर्मी विश्व स्तर पर सबसे घातक प्राकृतिक जोखिमों में शामिल होती जा रही है। भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी खुले वातावरण में कार्य करती है, स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि सीधे परिवारों की बचत और उपभोग क्षमता को प्रभावित करती है।

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