क्या इंसान को गढ़ने की ओर बढ़ रहा है विज्ञान

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

विज्ञान ने इंसान की जिंदगी बदलने वाले कई चमत्कार किए हैं। कभी टीकों ने लाखों लोगों को मौत से बचाया, कभी एंटीबायोटिक ने असाध्य मानी जाने वाली बीमारियों को साधारण बना दिया। अंग प्रत्यारोपण और जीन आधारित इलाज ने भी चिकित्सा को नई दिशा दी। लेकिन अब विज्ञान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहां सवाल सिर्फ बीमारी का इलाज करने का नहीं, बल्कि जन्म से पहले ही उसकी वजह बदल देने का है। यही वजह है कि अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में हुआ एक शोध दुनिया भर में चर्चा का विषय बना है। वैज्ञानिकों ने शुरुआती मानव भ्रूण में जीन बदलने की नई तकनीक का प्रयोग किया है। उनका उद्देश्य किसी बच्चे का जन्म कराना नहीं था, बल्कि यह समझना था कि क्या भविष्य में कुछ गंभीर आनुवंशिक बीमारियों को जन्म से पहले ही रोका जा सकता है। साथ ही उन्होंने साफ कहा है कि यह तकनीक अभी इलाज के लिए तैयार नहीं है और इस पर काफी और शोध की जरूरत है।

यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का महत्व शुरू होता है। यह केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं है। यह उस दौर की शुरुआत का संकेत है, जहां चिकित्सा पहली बार बीमारी होने के बाद उसका इलाज करने के बजाय बीमारी पैदा होने से पहले ही उसे रोकने की कोशिश कर रही है। जिन परिवारों में पीढ़ियों से कोई गंभीर आनुवंशिक बीमारी चली आ रही है, उनके लिए यह उम्मीद की खबर हो सकती है। यदि किसी बच्चे को जन्म से पहले ही ऐसी बीमारी से बचाया जा सके, जिसका बाद में इलाज मुश्किल या असंभव हो, तो यह चिकित्सा की बड़ी उपलब्धि होगीस लेकिन हर नई ताकत अपने साथ एक नया सवाल भी लेकर आती है।

अगर विज्ञान किसी बच्चे को बीमारी से बचा सकता है, तो क्या भविष्य में कोई उससे लंबा कद, तेज दिमाग या अपनी पसंद के दूसरे गुणों वाला बच्चा भी मांग सकता है? यही सवाल दुनियाभर में तथाकथित ‘डिजाइनर बेबी’ की बहस को जन्म देता है। हालांकि इस बहस में एक बात भूलना नहीं चाहिए। आज की विज्ञान इतनी आगे नहीं पहुंची है कि किसी बच्चे की बुद्धिमत्ता, स्वभाव या व्यक्तित्व को मनचाहे ढंग से तय कर सके। वैज्ञानिक स्वयं मानते हैं कि ऐसे गुण केवल जीन से नहीं, बल्कि परवरिश, वातावरण और अनेक दूसरे कारणों से भी बनते हैं। इसलिए अपनी पसंद का बच्चा तैयार करने की बातें फिलहाल कल्पना से अधिक कुछ नहीं हैं।

फिर भी इस शोध को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इतिहास बताता है कि तकनीक धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ाती है। इंटरनेट सूचना साझा करने के लिए बना था, आज उसने अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज-तीनों को बदल दिया। मोबाइल फोन सिर्फ बात करने के लिए बने थे, लेकिन आज वे बैंक, बाजार, पढ़ाई और मनोरंजन तक का सबसे बड़ा साधन बन चुके हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता(एआई) कुछ काम आसान करने के लिए आई थी, लेकिन अब शिक्षा, रोजगार और रचनात्मकता तक उसकी पहुंच है। जीन बदलने की तकनीक भी आने वाले वर्षों में किस दिशा में जाएगी, इसका उत्तर आज किसी के पास नहीं है।

इसी कारण इस बहस में अब केवल वैज्ञानिक ही नहीं, बाजार भी शामिल हो गया है। कुछ वर्ष पहले तक मानव भ्रूण में जीन बदलने की चर्चा केवल विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक सीमित थी। अब इस क्षेत्र में व्यावसायिक रुचि बढ़ रही है। यहीं इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। विज्ञान किसी नई तकनीक की संभावना पैदा करता है, लेकिन बाजार उसे उत्पाद में बदलने की कोशिश करता है। आज जीन बदलने की तकनीक का उद्देश्य गंभीर बीमारियों से बचाव है। लेकिन यदि कल यही तकनीक व्यापार का हिस्सा बनती है, तो सवाल केवल यह नहीं होगा कि वैज्ञानिक क्या कर सकते हैं। असली सवाल यह होगा कि बाजार क्या बनाना चाहेगा और समाज उसे कहाँ तक स्वीकार करेगा।

इस पूरी चर्चा का एक और पक्ष है, जिस पर अपेक्षाकृत कम बात होती है। आज तक चिकित्सा का फैसला वही व्यक्ति करता था, जिसका इलाज होना होता था। लेकिन जन्म से पहले किसी भ्रूण में किया गया बदलाव उस बच्चे और आगे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकता है। यानी फैसला आज लिया जाएगा, लेकिन उसका असर उन लोगों पर भी पड़ेगा, जिन्होंने कभी अपनी राय दी ही नहीं। यही वजह है कि दुनिया के अनेक देशों में ऐसे बदलावों पर कड़े नियम हैं और वैज्ञानिक भी लगातार सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि प्रयोगशाला में मिली सफलता और अस्पताल में सुरक्षित इलाज बनने के बीच अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। 

इसलिए इस शोध को न तो चमत्कार कहना सही होगा और न डर की वजह। यह विज्ञान का एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन मंजिल अभी दूर है। आज की सबसे बड़ी जरूरत यह नहीं है कि हर नई खोज को सनसनी बना दिया जाए, बल्कि यह है कि उसके असर को समझा जाए। विज्ञान ने एक नया दरवाजा जरूर खोला है, लेकिन उस दरवाजे से कितना आगे जाना है, इसका फैसला केवल वैज्ञानिक नहीं करेंगे। इसमें समाज, कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भी बराबर भूमिका होगी। आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि वैज्ञानिक इंसान के जीन कितनी सटीकता से बदल सकते हैं। असली सवाल यह होगा कि क्या हम विज्ञान को इंसान के भविष्य के बारे में उतने ही फैसले लेने देना चाहते हैं, जितनी ताकत अब उसके पास आने लगी है? विज्ञान रास्ता दिखा सकता है, लेकिन उस रास्ते पर कितना आगे बढ़ना है, यह फैसला आखिरकार समाज को ही करना होगा।

डॉ. शिवम भारद्वाज