श्रीराम-जानकी विवाह की अमिट स्मृतियों से आलोकित जनकपुर

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Published By Anjali Singh
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श्रीरामकथा में माता जानकी की उपस्थिति प्राणतत्व की तरह सार्वकालिक और सार्वभौमिक है। साक्ष्यों के आधार पर ज्ञात होता है कि विदेहराज जनक का राज्य वर्तमान में बिहार के सीतामढ़ी, मधुबनी तथा नेपाल के धनुषा जनपद तक फैला था। जनकपुर इसी धनुषा जनपद में स्थित है। श्रीराम विवाह-प्रसंग के साथ जनकपुर का स्मरण होते ही माता जानकी के स्वयंवर की दिव्य कथा सजीव हो उठती है।

माता सीता का जन्म सीतामढ़ी में उस समय हुआ, जब राजा जनक और रानी सुनयना कृषि योग्य भूमि में हल चला रहे थे। धरती के गर्भ से प्रकट होने के कारण उन्हें भूमिजा कहा जाता है। उनके जन्म के बाद जनकपुर धन-धान्य और हरियाली से समृद्ध हो गया तथा राज्य दुर्भिक्ष से मुक्त हुआ। शक्ति स्वरूपा माता सीता का पुत्री रूप में मिलना जनक दंपति का महान सौभाग्य था। भारतीय परंपरा में पुत्री के जन्म को लक्ष्मी के आगमन के समान माना जाता है। लक्ष्मी श्री, समृद्धि, धन-धान्य और सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा सभी प्रकार की चिंताओं का अंत करने वाली हैं।

रामविवाह में धनुष-भंग की कथा भगवान शिव के पिनाक धनुष से जुड़ी है, जिसे भगवान परशुराम ने राजा जनक को सौंपा था। किशोरावस्था में माता सीता कई बार इस धनुष को सहजता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर रख देती थीं। यह देखकर राजा जनक ने प्रण किया कि जो वीर इस धनुष को उठाकर उसका भंग करेगा, वही सीता का पति होगा। रंगभूमि में अनेक प्रतापी राजा प्रत्यंचा तक नहीं चढ़ा सके। जनक जानते थे कि उनकी पुत्री शक्तिरूपा हैं, इसलिए उनका वरण भी असाधारण पुरुष ही करेगा। शास्त्रों के अनुसार 56 देशों के राजा स्वयंवर में उपस्थित हुए थे। जनकपुर का बारह बीघा क्षेत्र आज भी इस ऐतिहासिक यज्ञभूमि की स्मृति संजोए हुए है। बिहार-नेपाल सीमा पर दूधमती नदी के किनारे स्थित फुलहर में माता गिरिजा के मंदिर में सीता स्वयंवर से पूर्व पूजन के लिए आई थीं। मंदिर के निकट पुष्पवाटिका में श्रीराम और सीता का प्रथम मिलन हुआ। वर्तमान जनकपुर के मणिमंडप में श्रीराम-सीता सहित चारों भाइयों का विवाह राजा जनक के अनुज की चारों पुत्रियों के साथ संपन्न हुआ।

जनकपुर स्थित भव्य जानकी मंदिर का निर्माण टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुंवरि ने 1901 से 1911 के बीच कराया। हिंदू, कोइरी और मुगल वास्तुकला के अद्भुत संगम वाले इस मंदिर में 60 कक्ष हैं। इसे नौलखा मंदिर भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनकपुर धाम में जनक की कुलदेवी मंदिर, राम मंदिर, जनक मंदिर, शिव मंदिर, भूतनाथ मंदिर, तैंतीस कोटि मंदिर, धनुषसागर और गंगासागर प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। गंगासागर के 12 कुंडों पर प्रतिदिन गंगा आरती होती है। अगहन माह की श्रीपंचमी पर आयोजित श्रीराम-जानकी विवाहोत्सव में विश्वभर से श्रद्धालु जनकपुर पहुंचते हैं, जबकि सामान्य दिनों में भी यहां दर्शनार्थियों की निरंतर भीड़ लगी रहती है।

संतोष कुमार तिवारी, नैनीताल