A Diamond is Forever.... क्या ‘डायमंड इज फॉरएवर’ का जादू अब खत्म हो रहा है

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Published By Anjali Singh
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साल 1947 में एक विज्ञापन पंक्ति ने दुनिया की सोच बदल दी थी- “A Diamond is Forever”। यह केवल एक स्लोगन नहीं था, बल्कि एक ऐसा विचार था, जिसने प्रेम, विवाह और सामाजिक प्रतिष्ठा को एक छोटे से चमकदार पत्थर से जोड़ दिया। अमेरिकी कंपनी डी बीयर्स ने इस अभियान के जरिए हीरे को सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि ‘अनंत प्रेम का प्रतीक’ बना दिया। करीब आठ दशक बाद सवाल यह है कि क्या यह विचार आज भी उतना ही प्रभावी है, खासकर भारत की जेन-जी (Gen-Z) और युवा पीढ़ी के बीच?

भारत में विवाह और आभूषणों का संबंध सदियों पुराना है, लेकिन यहां सोने का महत्व केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं रहा। सोना भावनात्मक सुरक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक निवेश तीनों का प्रतीक रहा है। यही कारण है कि जब किसी भारतीय परिवार में बेटी की शादी होती है, तो सोने के गहनों को भविष्य की सुरक्षा के रूप में भी देखा जाता है।

आज स्थिति दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। सोने की कीमतें लगातार नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। इसके साथ मेकिंग चार्ज और जीएसटी ने आभूषण खरीदना और महंगा बना दिया है। ऐसे में एक वर्ग मानता है कि हीरे की ओर रुझान बढ़ना चाहिए, लेकिन वास्तविकता इसके उलट दिखाई देती है।

A Diamonds Are Forever (1)

क्यों बदल रही है युवाओं की पसंद

उत्तर भारत के शहरों- लखनऊ, कानपुर, नोएडा, गुरुग्राम, देहरादून और चंडीगढ़ में रहने वाली नई पीढ़ी अपने माता-पिता से अलग सोच रखती है। उनके लिए महंगे गहनों से ज्यादा महत्व अनुभवों का है। वे विदेश यात्रा, नई कार, स्टार्टअप में निवेश, फिटनेस, गैजेट्स या डिजिटल संपत्तियों पर खर्च करना अधिक पसंद करते हैं। विवाह भी अब केवल सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पसंद और साझेदारी का विषय बनता जा रहा है। यही कारण है कि ‘दो महीने की सैलरी का हीरा’ जैसी अवधारणा, उन्हें आकर्षित नहीं करती।

निवेश की कसौटी पर कमजोर पड़ता हीरा

सोने और हीरे के बीच सबसे बड़ा अंतर निवेश मूल्य का है। सोना खरीदते ही उसकी बाजार कीमत लगभग स्पष्ट रहती है और जरूरत पड़ने पर उसे आसानी से बेचा जा सकता है। दूसरी ओर हीरे का पुनर्विक्रय मूल्य (Resale Value) अक्सर खरीदार की अपेक्षाओं से काफी कम निकलता है। युवा उपभोक्ता इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। वे यूट्यूब वीडियो देखते हैं, ऑनलाइन तुलना करते हैं और यह समझते हैं कि हीरा भावनात्मक संपत्ति तो हो सकता है, लेकिन वित्तीय निवेश नहीं। यही वजह है कि कई युवा अब प्राकृतिक हीरों के बजाय लैब-ग्रोउन डायमंड की ओर भी आकर्षित हो रहे हैं, जो दिखने में लगभग समान, लेकिन कीमत में काफी सस्ते हैं।

रिश्तों की नई परिभाषा

1947 की दुनिया और 2026 का भारत एक जैसे नहीं हैं। तब स्थायी नौकरी, स्थायी विवाह और स्थायी जीवनशैली का दौर था। आज करियर बदलते हैं, शहर बदलते हैं, जीवनशैली बदलती है और रिश्तों की परिभाषाएं भी बदल रही हैं। नई पीढ़ी प्रेम को किसी महंगे प्रतीक से नहीं, बल्कि साझा अनुभवों, सम्मान और समानता से जोड़कर देखती है। उनके लिए ‘फॉरएवर’ का अर्थ किसी अंगूठी से अधिक रिश्ते की गुणवत्ता है।

क्या सोना फिर बनेगा विजेता?

सोने की बढ़ती कीमतें निश्चित रूप से उपभोक्ताओं पर दबाव डाल रही हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय मानसिकता में सोने का स्थान मजबूत बना हुआ है। ग्रामीण भारत से लेकर महानगरों तक, सोना अभी भी आर्थिक सुरक्षा का पर्याय है। संभव है कि आने वाले वर्षों में भारी और पारंपरिक गहनों की जगह हल्के डिजाइन, डिजिटल गोल्ड, गोल्ड ईटीएफ और लैब-ग्रोउन डायमंड जैसे विकल्प लोकप्रिय हों, लेकिन भावनात्मक और निवेश दोनों दृष्टि से सोने की चुनौती हीरे के लिए अभी भी बड़ी है।

--- पार्थो कुनार, सीओओ,  अमृत विचार

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