इसरो में प्रतिभा पलायन का सच

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Edited By Deepak Mishra
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किसी भी वैज्ञानिक संस्था की सबसे बड़ी पूंजी उसके वैज्ञानिक, अभियंता और शोधकर्ता होते हैं। एक वैज्ञानिक को दक्ष बनने में कई वर्ष लगते हैं। यदि लोग बड़ी संख्या में संस्था छोड़ने लगें, तो उनके अनुभव की भरपाई तुरंत संभव नहीं होती।

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राजेश श्रीनेत, वरिष्ठ पत्रकार

कुछ ही माह के भीतर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो जैसी प्रतिष्ठित संस्था से 100 से अधिक वैज्ञानिकों के नौकरी छोड़ने की खबर ने देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इसरो केवल एक सरकारी संस्थान नहीं है, बल्कि भारत की वैज्ञानिक क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रतीक है। चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य एल1 और गगनयान जैसे महत्वाकांक्षी अभियानों ने इस संस्था को विश्व के अग्रणी अंतरिक्ष संगठनों की श्रेणी में पहुंचाया है। ऐसे समय में यदि बड़ी संख्या में अनुभवी वैज्ञानिक संस्था छोड़ रहे हैं, तो यह केवल मानव संसाधन का सामान्य परिवर्तन नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाता है। इस स्थिति के कारणों को समझना और समय रहते प्रभावी समाधान निकालना अत्यंत आवश्यक है।

किसी भी वैज्ञानिक संस्था की सबसे बड़ी पूंजी उसके वैज्ञानिक, अभियंता और शोधकर्ता होते हैं। आधुनिक प्रयोगशालाएं, उन्नत उपकरण और पर्याप्त बजट तभी सार्थक होते हैं, जब उनके पीछे प्रतिभाशाली और समर्पित मानव संसाधन हो। एक वैज्ञानिक को किसी विशेष क्षेत्र में दक्ष बनने में कई वर्ष लगते हैं। वह अनेक परियोजनाओं का अनुभव प्राप्त करता है और अपने ज्ञान से नई पीढ़ी के वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन भी करता है। यदि ऐसे लोग बड़ी संख्या में संस्था छोड़ने लगें, तो उनके अनुभव की भरपाई तुरंत संभव नहीं होती। इसका सीधा प्रभाव अनुसंधान की गुणवत्ता, परियोजनाओं की गति और भविष्य की योजनाओं पर पड़ता है।

इसरो वर्तमान समय में कई महत्वपूर्ण अभियानों पर कार्य कर रहा है। गगनयान मिशन के माध्यम से भारत मानव को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर रहा है। इसके अतिरिक्त चंद्रयान के अगले चरण, अंतरिक्ष स्टेशन की परिकल्पना, नए प्रक्षेपण यान, उपग्रह तकनीक तथा अंतरिक्ष विज्ञान के अनेक शोध कार्यक्रम भी प्रगति पर हैं। इन सभी परियोजनाओं के लिए अत्यधिक प्रशिक्षित और अनुभवी वैज्ञानिकों की आवश्यकता होती है। यदि विशेषज्ञ लगातार संस्था से बाहर जाते रहेंगे, तो परियोजनाओं में देरी, लागत में वृद्धि तथा तकनीकी चुनौतियों के बढ़ने की आशंका स्वाभाविक है। इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि आखिर वैज्ञानिक नौकरी क्यों छोड़ रहे हैं? इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं। निजी अंतरिक्ष कंपनियों में अधिक वेतन, बेहतर सुविधाएं, आधुनिक कार्य वातावरण और तेजी से आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध हैं। वैश्विक स्तर पर भी भारतीय वैज्ञानिकों की मांग लगातार बढ़ रही है। कई देशों और निजी संस्थाओं में शोध के लिए अधिक संसाधन तथा स्वतंत्रता मिलती है।

इसके अतिरिक्त यदि किसी संस्था में पदोन्नति की प्रक्रिया धीमी हो, प्रशासनिक दबाव अधिक हो, शोध की स्वतंत्रता सीमित हो या कार्य और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाना कठिन हो, तो प्रतिभाशाली लोग अन्य विकल्प चुनने लगते हैं, इसलिए केवल नौकरी छोड़ने की घटनाओं को देखकर चिंता व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके मूल कारणों की पहचान करना भी आवश्यक है।

सरकार ने वैज्ञानिकों के नौकरी छोड़ने के नियमों को अधिक सख्त बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं। यह माना जा सकता है कि संवेदनशील तकनीक, राष्ट्रीय सुरक्षा और महत्वपूर्ण परियोजनाओं की गोपनीयता को देखते हुए कुछ नियम आवश्यक हैं। सरकार का उद्देश्य भी संभवत यह होगा कि प्रशिक्षित वैज्ञानिक अचानक संस्था न छोड़ें और महत्वपूर्ण परियोजनाएं बाधित न हों, लेकिन केवल नियमों को कठोर बना देना किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

यदि कोई व्यक्ति संस्था में असंतुष्ट है, तो केवल कानूनी या प्रशासनिक बाधाओं के कारण उसे लंबे समय तक रोके रखना न तो संस्था के हित में होगा और न ही उस वैज्ञानिक के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। प्रतिभा को बांधकर नहीं रखा जा सकता, उसे सम्मान, अवसर और प्रेरणा देकर जोड़ा जा सकता है।

वास्तविक समाधान यह है कि इसरो जैसे संस्थानों को प्रतिभा के लिए और अधिक आकर्षक बनाया जाए। वैज्ञानिकों को उनके योगदान के अनुरूप प्रतिस्पर्धी वेतन, आधुनिक अनुसंधान सुविधाएं, उत्कृष्ट प्रयोगशालाएं तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। पदोन्नति की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और योग्यता आधारित होनी चाहिए। 

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